बस्तर में प्राचीन शिव मंदिर में ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ का भव्य आयोजन, विरासत और भक्ति की धारा में झूमे श्रद्धालु

बस्तर| बस्तर रियासत की पुरानी राजधानी स्थित प्राचीन शिव मंदिर के प्रांगण ने ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के भव्य आयोजन का साक्षी बनकर इतिहास के पन्नों को जीवंत कर दिया। इस अवसर पर मंदिर के अदम्य स्वाभिमान और पुनर्निर्माण की गौरवशाली गाथा ने उपस्थित श्रद्धालुओं में गहरी भावनाएँ जगाईं।

जिला पंचायत अध्यक्ष  श्रीमती वेदवती कश्यप  ने अपने उद्बोधन में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा सोमनाथ में 11 पवित्र तीर्थों के जल से किए गए अभिषेक का उल्लेख करते हुए इसे भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म के पुनरुत्थान का प्रतीक बताया। उन्होंने बताया कि लगभग एक हजार वर्ष पूर्व सोमनाथ मंदिर को कई बार आक्रमणकारियों ने क्षति पहुंचाई, लेकिन महादेव के प्रति अटूट आस्था ने इसे पुनः खड़ा किया। अंतिम बार 1951 में इस मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ था और इसी ऐतिहासिक स्मृति में यह पर्व पूरे देश में गर्व के साथ मनाया जा रहा है।

कार्यक्रम में जिला पंचायत अध्यक्ष  श्री संतोष बघेल , जिला पंचायत सदस्य श्रीमती शकुंतला कश्यप , मुख्य कार्यपालन अधिकारी  श्री प्रतीक जैन , और अपर कलेक्टर  श्री ऋषिकेश तिवारी  विशेष रूप से उपस्थित रहे।

भक्ति की इस धारा को और ऊँचाई प्रदान करते हुए कलाकार  निधि रावल  और  तरंग डांस एकेडमी की बालिकाओं ने कत्थक शैली में शिव तांडव की प्रस्तुति दी, जिसने दर्शकों में ऊर्जा और उत्साह का संचार किया। वहीं  गायत्री मानस परिवार बस्तर  के शिव भजनों ने माहौल को पूरी तरह आध्यात्मिक बना दिया।

हजार वर्षों की विरासत:
बस्तर के बाणसागर तट पर स्थित यह प्राचीन शिव मंदिर लगभग एक हजार साल पहले छिंदक नागवंशी राजाओं द्वारा बनवाया गया था। 11वीं शताब्दी की स्थापत्य कला और कलात्मक मूर्तियों से सुसज्जित यह मंदिर केंद्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के संरक्षण में है। मंदिर की प्रमुख पहचान इसके मुख्य द्वार पर उकेरी गई  मयूर आकृति  है, जो कभी मध्यप्रदेश पाठ्य पुस्तक निगम का प्रतीक रही थी।

मंदिर के समकालीन स्थलों में नारायणपाल, छिंदगांव, समलूर, भैरमगढ़, गढ़ धनोरा और बारसूर के प्राचीन मंदिर भी शामिल हैं, जिन पर आज भी भव्य मेलों का आयोजन होता है। यह स्थल आज न केवल श्रद्धालुओं बल्कि पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन गया है और बस्तर की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक समृद्धि का प्रतीक है।

विशेष अवसर: महाशिवरात्रि, कार्तिक पूर्णिमा और मकर संक्रांति पर मंदिर में भारी भीड़ उमड़ती है, जो इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाती है।

 

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