निजता का अधिकार मजबूत: दिल्ली हाईकोर्ट ने ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ को संविधानिक दर्जा दिया

नई दिल्ली। डिजिटल युग में निजता और व्यक्तिगत सम्मान की सुरक्षा को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ (Right to be Forgotten) को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के मौलिक अधिकार का हिस्सा मान्यता दी है। न्यायालय ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति से जुड़ी पुरानी या अप्रासंगिक जानकारी उसकी गरिमा, प्रतिष्ठा या निजी जीवन को अनुचित रूप से प्रभावित कर रही है, तो उसे इंटरनेट या सर्च इंजन से हटाया या छिपाया जा सकता है।

जस्टिस सचिन दत्ता की बेंच ने अपने आदेश में यह भी माना कि डिजिटल युग में ऑनलाइन जानकारी “लगभग स्थायी” हो जाती है। इसके कारण व्यक्ति को अपने अतीत की घटनाओं से लंबे समय तक जुड़ा रहना पड़ता है, भले ही वर्तमान में उसका कोई प्रासंगिक प्रभाव न हो। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि डिजिटल दुनिया में पुरानी जानकारी व्यक्ति की प्रतिष्ठा और निजी जीवन पर लगातार असर डाल सकती है।

याचिकाकर्ताओं में ऐसे लोग शामिल थे जिन्हें आपराधिक मामलों में बरी किया गया था, वैवाहिक विवादों के पक्षकार थे या जिनका नाम केवल औपचारिक रूप से मुकदमे में दर्ज हुआ था। उनका कहना था कि गूगल सर्च और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध पुरानी जानकारी से उनकी नौकरी, व्यवसाय और सामाजिक प्रतिष्ठा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि न्यायिक फैसलों की कानूनी दलीलें और निष्कर्ष सार्वजनिक रहेंगे, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर व्यक्ति की पहचान से जुड़ी जानकारी को ऑनलाइन हटा या छिपाया जा सकता है। इसके तहत सर्च इंजन और ऑनलाइन डेटाबेस को सुनिश्चित करना होगा कि संबंधित व्यक्ति का नाम खोजने पर जानकारी सार्वजनिक रूप से दिखाई न दे। अदालत ने यह भी कहा कि मूल न्यायिक रिकॉर्ड सुरक्षित रहेंगे और केवल अदालतों और अधिकृत एजेंसियों द्वारा देखे जा सकते हैं।

यह फैसला डिजिटल युग में व्यक्तिगत गोपनीयता और सार्वजनिक सूचना के अधिकार के बीच संतुलन बनाने के प्रयास में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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