सरगुजा के किसान पारंपरिक धान छोड़, लाभकारी वैकल्पिक फसलों की ओर बढ़े: उड़द, मूंग, मक्का और रागी से बढ़ी आय और जल संरक्षण

सरगुजा | सरगुजा जिले के किसान अब पारंपरिक ग्रीष्मकालीन धान की खेती से आगे बढ़ते हुए वैकल्पिक और लाभकारी फसलों को अपना रहे हैं। जल संरक्षण, कम लागत और अधिक आय की संभावनाओं को देखते हुए किसान उड़द, मूंग, मूंगफली, रागी और मक्का जैसी फसलों की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं। यह बदलाव न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रहा है, बल्कि गिरते भू-जल स्तर को बचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

कृषि विभाग की पहल और परिणाम:

  • वर्ष 2026 के लिए ग्रीष्मकालीन फसलों का लक्ष्य 634 हेक्टेयर निर्धारित किया गया।
  • अब तक 209 हेक्टेयर क्षेत्र में वैकल्पिक फसलों की बुवाई की जा चुकी है।
  • जलभराव वाले क्षेत्रों में पारंपरिक धान की खेती जारी है।

किसानों का अनुभव:

  • तोलंगा गांव के किसान बनवारी ने अधिक पानी वाली धान की बजाय उड़द की फसल अपनाई। उन्होंने कहा कि दलहन फसलों में सिंचाई कम, लागत कम और बाजार में बेहतर मूल्य मिलता है।
  • परसा गांव के घासी राम ने मक्का की खेती को अपनाया। उनका कहना है कि मक्का कम पानी में अच्छी उपज देती है और लगातार मांग में रहने के कारण अधिक लाभदायक है।

कृषि विशेषज्ञों का दृष्टिकोण:

  • फसल विविधीकरण से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है, कीट और रोगों का प्रकोप कम होता है और रासायनिक दवाओं पर निर्भरता घटती है।
  • मक्का, रागी और दलहन फसलें कम सिंचाई मांगती हैं, जिससे भू-जल संरक्षण और किसानों की सिंचाई लागत घटती है।

आर्थिक सुरक्षा और स्थिरता:
फसल विविधीकरण से किसान आर्थिक रूप से सुरक्षित रहते हैं। यदि किसी फसल के बाजार भाव में गिरावट आती है, तो अन्य फसलें आय का सहारा बनती हैं। इससे खेती का जोखिम कम होता है और किसानों की आमदनी अधिक स्थिर रहती है।

कृषि विभाग लगातार किसानों को जागरूक कर रहा है कि बदलते मौसम और जल संकट के दौर में वैकल्पिक फसलों को अपनाना आवश्यक है। इससे खेती अधिक लाभकारी, टिकाऊ और भविष्य के लिए सुरक्षित बनती है।

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