AI Revolution Reality Check | पिछले दो साल में टेक इंडस्ट्री में जिस AI क्रांति का शोर था, अब उसी पर सवाल उठने लगे हैं. जिन कंपनियों ने कंटेंट राइटर्स और क्रिएटिव टीम्स को हटाकर पूरा काम AI टूल्स पर शिफ्ट कर दिया था, अब वही कंपनियां दोबारा इंसानी राइटर्स और एडिटर्स की तलाश कर रही हैं. वजह साफ है — AI से तैयार कंटेंट में क्वालिटी, इमोशन और भरोसे की कमी ने कंपनियों की गूगल रैंकिंग, वेब ट्रैफिक और ब्रांड वैल्यू को नुकसान पहुंचाया है.
गार्टनर की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक कंपनियां अब Generative AI पर अंधाधुंध खर्च करने से बच रही हैं और ज्यादा “रणनीतिक” रवैया अपना रही हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि AI पर वैश्विक खर्च भले बढ़ रहा हो, लेकिन आम बिजनेस कंपनियां अब केवल प्रयोग के बजाय रिजल्ट पर फोकस कर रही हैं.
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि AI तेजी से कंटेंट बना सकता है, लेकिन उसमें इंसानी अनुभव, भावनाएं और गहराई की कमी रहती है. यही वजह है कि यूजर्स ऐसे कंटेंट पर ज्यादा देर नहीं रुकते, जिससे वेबसाइट्स की Google Ranking प्रभावित हो रही है.
बेंगलुरु और नोएडा की कई IT कंपनियों में अब AI बजट कम करने और Human Writers, Editors और Content Strategists को दोबारा हायर करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है. कंपनियां अब ऐसे प्रोफेशनल्स चाहती हैं जो AI टूल्स का इस्तेमाल तो करें, लेकिन उसमें “Human Touch” भी जोड़ सकें.
डिजिटल मार्केटिंग एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाला दौर “AI Only” नहीं बल्कि “Human-Aided AI” का होगा, जहां AI एक टूल की तरह इस्तेमाल होगा और अंतिम फैसला इंसान का ही रहेगा.