हलचल… कुछ कलेक्टर और एसपी बदले जाएंगे

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मुस्कुराइए सब ठीक है, या बिलकुल ठीक नहीं?

आप अक्सर सुनते हैं मुस्कुराइए आप छत्तीसगढ़ में हैं। लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि यहां के कुछ नेताओं की मुस्कुराहट नकली है, बनावटी है, दिखावा है, छलावा है। दरअसल यह मुस्कुराने का ढोंग इन्हें अपने कर्तव्यों के प्रति बेईमानी के कारण करना पड रहा है। वहीं दूसरी ओर आधा कार्यकाल बीतते ही ज्यादातर मंत्रियों के ढोंग का भी पर्दापाश हो चुका है और वे जनता के सामने ही नहीं बल्कि अपनी पार्टी के बडे नेताओं के सामने भी पूरी तरह से बेनकाब हो चुके हैं। कई मंत्रियों और नेताओं के कथनी और करनी की पोल खुल चुकी है। कहते हैं कि इन दिनों मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव को जमीन विवाद में घिरते देख छत्तीसगढ के सीएम विष्णुदेव साय को भी बदनाम करने की साजिस रची जा रही हैं। साजिस के खेल में कौन-कौन शामिल है? इसका खुलासा निकट भविष्य में हो जाएगा। राज्य में फैली अराजकता, गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार, हत्या और गैंगवार सब साजिस का हिस्सा बताया जा रहा है। खैर विष्णुदेव साय का व्यक्तित्व शीशे की भांति साफ है। वह बिना बनावटी, बिना दिखावा के छत्तीसगढ़ महतारी की सेवा में जुटे हुए हैं, निश्चित ही हर बार की भांति इस बार भी उनके विरोधी फिर चारो खाने चित मिलेंगे।

धनपशु

आपने बहुत सारे पशुओं का नाम सुना होगा और शायद देखा भी होगा,  लेकिन धनपशु का नाम शायद ही सुना होगा। जी हां एक विभाग के इस खास अफसर को धनपशु कहा जाता है। जाहिर सी बात है कि अपने नाम अनुरुप धनपशु शाकाहारी और मांशाहारी न होकर भोजन में सिर्फ धन ही ग्रहण करता होगा। खैर धनपशु ने तकरीबन 8 माह पहले बडे जुगाड से एक धनबाडा हासिल किया था, कहा जा रहा है कि यहां का पूरा धन चट करने की योजना थी। लेकिन विभाग में शीर्ष स्तर पर हुए बदलाव के बाद धनपशु से धनवाडा छीन लिया गया। अब वह मुख्यालय में बैठकर खाये हुए धन को पचाने के लिए पागुर कर रहे हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि उनकी नजर दूसरे धनबााडे पर है। बहरहाल दूसरा धनवाडा उन्हें मिलेगा या नहीं यह जल्द स्पष्ट हो जाएगा।

शाह और नितिन नवीन से मुलाकात के मायने क्या?

मंत्रिमंडल में फेरबदल की अटकलों के बीच सीएम विष्णुदेव साय जब भी दिल्ली जाते हैं, छत्तीसगढ़ की राजनीति में हलचल दिखने लगती है। बीते दिनों सीएम के दिल्ली जाने सेे पहले राज्य के दो मंत्री भी दिल्ली रवाना हुए, जिसके बाद यहां कयासों का दौर शुरु हो गया, जगह- जगह मंत्रिमंडल में बदलाव की चर्चाएं छिड गई। खैर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने एक साथ केंन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की। इसी दरम्यान बस्तर में नए आईजी बद्रीनारायण मीणा की पदस्थापना भी कर दी गई। यहीं नहीं सीएम विष्णुदेव ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से भी मुलाकात की। लेकिन इस पूरे एपिसोड में दूसरेे मंत्री कहीं नजर नहीं आये? न ही उनके दौरे की कोई अधिकृत खबर बाहर छनकर आई? आखिर उन्हें दिल्ली परेड क्यों कराया गया? दूसरे मंत्री से संबंधित कोई सरकारी खबर भी समाचार पत्रों में नहीं नजर आई? इन तमाम राजनीतिक गतिविधियों को देखकर यह माना जा रहा है कि निश्चित ही अंदरखाने में सब ठीक नहीं चल रहा है। और कहीं न कहीं मंत्रिमंडल में बदलाव की अटकलें गोता मारते-मारते सच के तट पर पहुंचते दिख रही हैं।

चारागाह बना मेडिसनल प्लांट बोर्ड

छत्तीसगढ़ राज्य वन संपदा से अच्छादित राज्य है। यहां तकरीबन 44 फीसदी वन हैं। बस्तर और सरगुजा की पहाडियों तथा छत्तीसगढ़ की धरती में अनेकों औषधीय पौधे पाये जाते हैं। संभवत: इन्हीं तमाम विषयों को देखते हुए दूरगामी परिणाम की आस में राज्य औषधीय पादप बोर्ड (मेडिसनल प्लांट बोर्ड) का गठन किया गया। लेकिन आज यहां मेडिसनल प्लांट बोर्ड की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। यह बोर्ड सिर्फ उपकृत करने का अड्डा मात्र बनकर रह गया है। केरलम जैसे राज्य का अनुसरण यहां क्यों नहीं किया जाता? केरलम में छोटे-बडे हजारों की संख्या में मेडिसनल फार्म विकसित किए गए हैं। इतना नहीं इन फार्मो में हजारों की संख्या में लोगों को रोजगार मिल रहे हैं। छत्तीसगढ़ में कितने मेडिसनल फार्म हैं? कितने लोगों को इससे रोजगार मिल रहा है? इसकी स्थिति क्यों स्पष्ट नहीं की जाती? आखिर छत्तीसगढ राज्य के लिए विशेष अहमियत रखने वाला औषधीय पादप बोर्ड सिर्फ अफसरों को उपकृत करने का अड्डा बनकर क्यों रह गया है? इसका जिम्मेदार कौन है? दरअसल यहां पूर्व की कांग्रेस सरकार के कार्यकाल से ही रिटायर्ड आईएफएस जेएसीएस राव की सीईओ के पद पर तैनाती की गई है। लेकिन इतने वर्षों में इस बोर्ड में क्या काम हो रहा है? किसी को कोई खबर ही नहीं है? न ही कोई इसकी सुध लेने वाला है?

कुछ कलेक्टर और एसपी बदले जाएंगे

कुछ जिलों के कलेक्टरों के बदले जाने के संकेत हैं। वहीं आईपीएस अफसरों की बहुप्रतिक्षित लिस्ट भी जल्द जारी हो सकती है। दरअसल बस्तर आइजी की पदस्थापना के साथ यह माना जा रहा था कि कुछ जिलों के कप्तानों की भी सूची जारी हो जाएगी। लेकिन पी सुंदरराज को जल्दी रिलीव करने के चक्कर में बस्तर आईजी का सिंगल आदेश जारी कर दिया गया। जिसके कारण पुलिस अधीक्षकों की लिस्ट लटक गई है। वहीं जल्द ही कुछ जिलों के कलेक्टरों को भी बदलने की खबर है।

रेत और शराब बनी मुसीबत

भाजपा सरकार के लिए शराब और रेत बडी मुसीबत बनते दिख रही है। दरअसल शराब और रेत के कारोबार में सीधा सत्ता का दखल होता है। यहां कई मामलों में अफसर भी अपंग नजर आते है। बैंकुठपुर में हुए गैंगवार में तीन लोगों को जिंदा जला दिया गया। इसमें भी दबे जुबान सत्ताधारी दल के नाम की चर्चा हो रही है। खैर सच क्या है? यह तो जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा। लेकिन रेत के कारोबार ने सरकार की चारों ओर जमकर किरकिरी की है। राज्यपाल से लेकर सभी ने अवैध रेत खनन की चिंता की है, लेकन यह चिंता कहीं भी चरितार्थ होते नहीं दिख रही। जिसके वजह से यह माना जा रहा है कि रेत के कारोबार में अघोषित रुप से सत्ताधारी दल के नेता ही शामिल है। दरअसल रेत और शराब सिर्फ राजस्व अर्जित करने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि यह कानून व्यवस्था और सरकार की विश्वसनीयता से जुडा हुआ अहम विषय है। यहां उच्च न्यायालय के निर्देश, राज्यपाल की चिंता के बाद भी हालात नहीं बदले तो इसे क्या समझा जाए? निश्चित ही राज्य सरकार को अवैध रेत और शराब के लिए जबाबदेही तय करनी चाहिए। रेत के कारोबार की लपटें इतनी तेज हैं कि इससे कोई भी जल सकता है। बैंकुठपुर की घटना को एक चेतावनी के रुप में देखा जाना चाहिए। अवैध रेत और शराब के कारोबार पर नियंत्रण और जबाबदेही तय होनी चाहिए। क्योंकि अवैध रेत और शराब पूरे व्यवस्था, सिस्टम और सरकार की छवि को धूमिल करने का काम किया है। इसलिए रेत और शराब के कारोबार को सिर्फ राजस्व का विषय न समझकर इसमें नकेल कसने की जरुरत है।

रुपये ले लो, बोर्ड में कुर्सी दे दो

छत्तीसगढ़ राज्य इन दिनों भ्रष्टाचार का चारागाह बनते जा रहा है। यहां रिटायर्ड अफसरों को उपकृत करने का खुला खेल चल रहा है। बडे-बडे बोर्ड सिर्फ उपकृत करने का अड्डा मात्र बनकर रह गए हैं। नतीजन ज्यादातर बोर्ड में सरकारी काम सिर्फ कागजों में दिखाई देते हैं। उसके बाद भी राज्य में जैसे ही कोई अफसर रिटायर होता है, वह अपनी राजनीतिक पहुंच और रुयपे की ताकत लेकर दूसरी कुर्सी हासिल करने में जुट जाता है। इनके लिए सबसे सरल और आसान बोर्ड में कुर्सी हासिल करना होता है। मानों यहां के बोर्ड सिर्फ रिटायर अफसरों के लिए ही बनाए गए हैं। कहा तो यह भी जाता है कि अफसरों द्वारा बोर्ड की कुर्सी के लिए मुंह मांगी रकम भी दी जाती है। खैर सच क्या है? यह तो लेने और देने वाले ही जानेगें। दरअसल इन दिनों दो रिटायर्ड अफसर बोर्ड में कुर्सी हासिल करने की जुगत में जमकर परिक्रमा कर रहे हैं। इसके लिए भाजपा के कुछ नेता संगठन से दबाव डलवाकर रिटायर्ड अफसरों को मलाईदार कुर्सी दिलाने की लाबिंग कर रहे हैं। हालांकि भाजपा नेता पार्टी के कार्यकर्ताओं के लिए लाबिंग नहीं करते? यह तो वही जानेंगे। रिटायर्ड अफसरों के प्रति उनकी इतनी उदारता क्यों है?।

 

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