हलचल… फिर चूके महंत, भूपेश ने मारी बाजी

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फिर चूके महंत, भूपेश ने मारी बाजी

इन दिनों रायगढ़ के तमनार में जंगल की कटाई की जा रही है। कांग्रेस के दो दिग्गज नेता तमनार का दौरा कर चुके हैं। पूर्व सीएम भूपेश बघेल तकरीबन दो दर्जन विधायकों के साथ तमनार का दौरा करने पहुंचे, वहीं पीसीसी चीफ दीपक बैज के साथ तकरीबन आधा दर्जन विधायक ही नजर आये। खैर यह विषय सर्वप्रथम नेता प्रतिपक्ष का था, यदि वास्तव में भूपेश के आरोप सही है वहां प्रशासन जनता की आवाज को दबाने का काम कर रहा है, इस मामले में सरकार यदि जनता की जवाबदेही के प्रति खरी नहीं उतर रही है, तो विपक्ष का नेता होने के बदौलत डॉ. चरणदास महंत को कांग्रेसी विधायकों के साथ तमनार का दौरा करना था। लेकिन महंत चूक गए? खैर महंत को कांग्रेस की छूट है, वह किस मुददे को उठायेंगे यह वह स्वयं तय कर सकते हैं। यह बात अलग है कि लोकतंत्र में जितना ही जवाबदेही सत्तापक्ष की होती है, उतना ही जवाबदेह विपक्ष भी होता है। महंत विपक्ष के नेता है, फिर भी वह तमनार क्यों नहीं गए? या महंत तमनार गए तो उनकी आवाज जनता और शासन-प्रशासन तक क्यों नहीं पहुंची? फिलहाल इसका जवाब महंत ही दे सकते हैं। खैर महंत नहीं तो कोई और सही, महंत नहीं पहुंचे या महंत की आवाज जनता तक नहीं पहुंची, तो भूपेश ने बाजी मार ली। वह दो दर्जन विधायकों के साथ तमनार दौरा कर शक्ति प्रदर्शन करने में कामयाब हो गए। दरअसल भूपेश बघेल ने खरगे की सभा के पहले यह संदेश देने की कोशिश की है, कि वास्तव में चरणदास महंत सरकार के खिलाफ सवाल नहीं उठाते। भूपेश यह भली-भांति जानते है कि अडानी से जुडा मुददा उठाने में वह आलाकमान के नोटिस में आयेगे, तो भला वह इस मौके को कैसे गवां सकते हैं। कुल मिलाकर भूपेश अपने प्लान में सफल होते दिख रहे हैं। वह बार-बार कांग्रेस आलाकमान को यह संदेश देने की कोशिश कर रहे कि विपक्ष के नेता का जैसा तेवर होना चाहिए महंत में नहीं है।

एक फोन ने पलट दी बाजी

वर्तमान भाजपा में क्या होने वाला है, यह शायद ही दो नेताओं के अलावा किसी और को पता रहता होगा। ताजा मामला छत्तीसगढ़ का है, जहां बीते 30 जून को वर्तमान सीएस अभिताभ जैन को राजभवन में बकायदा शॉल-श्रीफल देकर विदाई दे दी गई। मंत्रिपरिषद की बैठक में भी उनके कार्यकाल के पूरा होने की बधांइयां दी गई। कहते हैं कि अभिताभ जैन की फैमिली भी उनके वेलकम के लिए पहुंच चुकी थी। वहीं वेटिंग इन सीएस मनोज पिंगुआ को संकेत मिल चुके थे। लेकिन अचानक एक घंटी बजी और बाजी पलट गई। आनन-फानन में अमिताभ जैन को एक्सटेशन देने का प्रस्ताव मंगाया गया और जैन को तीन माह का सेवा विस्तार दे दिया गया। दरअसल अमिताभ जैन को एक्सटेंशन दिया गया यह मायने नहीं रखता, लेकिन जिस नाटकीय रुप में उनके सेवा विस्तार के आर्डर हुए यह चर्चा का विषय बना हुआ है। राज्य में न ही सीनियर अफसरों की कमी है और न ही अमिताभ जैन ने एक्सटेशन में रुचि ली थी। फिर भी उन्हें तीन माह का एक्सटेंशन दे दिया गया, जो कई सवालों को जन्म देता है। क्या यह एक्सटेंशन मनोज पिंगुआ को सीएस की कुर्सी तक पहुंचने से रोकने का प्रयास है? तीन महीने में ऐसा क्या होने वाला है कि अभिताभ जैन को एक्सटेंशन दे दिया गया? क्या सुब्रत साहू का दांव चल गया? ऐसे अनेकों सवाल इन दिनों आम जनता के बीच चर्चा के विषय बने हुए हैं। खैर कारण जो भी लेकिन 30 जून को यह बात सामने आ चुकी है कि छत्तीसगढ़ के नए सीएस की रेस में फिलहाल सुब्रत साहू और मनोज पिंगुआ ही हैं। अब आगामी तीन माह में पिंगुआ और सुब्रत के बीच प्रतिद्वंदता बढऩा स्वाभाविक है। दरअसल एक फोन और अमिताभ जैन के एक्सटेंशन ने एसीएस सुब्रत साहू को एक बड़ा अवसर दे दिया है। अब आगे क्या होगा फिलहाल कुछ कहा नहीं जा सकता।

गुरु भक्ति ने अपराध से नाता जोड़ा

रिटायर्ड आईएफएस रेरा के वर्तमान चेयरमेन संजय शुक्ला अपनी पूरी सर्विस में बेदाग रहे। राज्य में कांग्रेस की सरकार रही हो या भाजपा की संजय की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही। वह किसी दल के न होकर एक बेहतर प्रशासक साबित हुए। लेकिन आखिरी-आखिरी भक्ति ने उनका नाता अपराध से जोड़ दिया। दरअसल हाल ही में सीबीआई ने रावतपुरा ग्रुप में दबिश दी और यहां रविशंकर महराज समेत 35 लोगों के खिलाफ अपराध दर्ज किए गए, जिसमें रेरा के चेयरमेन संजय शुक्ला का नाम भी शामिल है। कहते हैं कि संजय के हवन करते ही हाथ जल गए। दरअसल संजय शुक्ला को हाल ही में बोला गया था कि वह संस्थान को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से कुछ समय दें, भला कोई शिष्य गुरु की आज्ञा को कैसे टाल सकता है। संजय शुक्ला ने भी नहीं टाला और वह अपराध के भागीदार बन गए। सीबीआई अब मामले में अपराध दर्ज कर पड़ताल शुरु कर दी है, इस मामले में फिलहाल रावतपुरा ग्रुप के एक पदाधिकारी की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। संजय का क्या होगा, यह तो निकट भविष्य में ही स्पष्ट होगा।

बेनकाब लखमा

खुद को गरीब आदिवासियों का हमदर्द बताने वाले पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा कई करोड़ रुपये की मिठाई खाकर बेनकाब हो चुके हैं। उनके कथित सरल और सहज मुखौटा को राज्य तथा केन्द्र की जांच एजेंसियों ने उतार कर जनता के सामने फेंक दिया है। जांच एजेंसियों की चालानी कार्रवाई में लखमा के खिलाफ जो तथ्य और बातें सामने आई है, उसके बाद लखमा का अब सलाखों से बाहर निकल पाना कठिन हो गया है। दरअसल लखमा की रुपयों की चाहत ने उन्हें राजनीति से दूर कर दिया है। चालानी कार्रवाई में जो बात सामने आई है वह हैरान करने वाली है, और लखमा को परेशान करने वाली है। जांच एजेसिंयों की माने तो हर माह लखमा को दो करोड़ रुपये घर पहुंचाकर दिए जाते थे और यह सिलसिला 2019 से 2023 तक चलता रहा। लखमा ने शराब घोटाले की राशि से अनेक संपत्तियां बनाई। इस मामले में 1100 पेज का चालान और 87 पेज के पूरक चालान में 79 गवाहों से पूछताछ कर उनके बयान भी दर्ज किए गए हैं, जो कवासी लखमा के गले का फांस बन चुका है। बहरहाल अब इस मामले का फैसला न्यायालय को करना है, लेकिन लखमा अब पूरी तरह से बेनकाब हो चुके हैं।

राडार पर नेताम

सीनियर आदिवासी नेता कृषि मंत्री रामविचार नेताम इन दिनों राडार पर हैं। भ्रष्टाचार को लेकर उनकी शिकायत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत हर बड़े नेता और हर फोरम में की गई है। इससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि यह शिकायत भी संघ के हवाले सेे और एक पदाधिकारी के लेटरहेड में की गई है। घटना के तकरीबन एक माह बीत जाने के बाद यह मामला सुर्खियों में आया। जिसको लेकर शिकायतकर्ता भी सामने आये और उन्होंने मीडिया के सामने कहा कि जो भी शिकायत उनके नाम से की गई है वह गलत है। लेटरहेड का दुरुपयोग किया गया है, साथ ही उसमें जो हस्ताक्षर हैं वह भी उनके नहीं हैं। कुल मिलाकार मंत्री नेताम की किरकिरी के बाद इस मामले में सफाई सामने आई है। यह शिकायत किसने की है? यह तो जांच का विषय है। शिकायतकर्ता ने तो मीडिया के समक्ष आकर यह कह दिया कि वह शिकायत उनके द्वारा नहीं की गई है, नेताम पर लगे आरोप निराधार हैं। लेकिन कोई यह कहने को तैयार नहीं है कि शिकायत में जो दस्तावेज संलग्न किए गए हैं वह सच है, या झूठ?

दर्द कौन सुने

पिछले दो साल से राज्य में मुख्य सूचना आयुक्त का पद रिक्त पड़ा हुआ है। जब इस आयोग को ही भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है, तो सूचना मांगने और पाने वालों का दर्द भला कौन सुनेगा। शायद यही कारण है कि राज्य में सूचना का अधिकार अधिनियम की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। दर्द से कहराते एक्टिविस्ट अपना दर्द बयां करें तो करें किससे? शायद यहां उनकी पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं है। दरअसल यह बात हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि राज्य के एक वन्यजीव प्रेमी ने सूचना के अधिकार के अधिनियम के तहत जानकारी मांगी कि ‘7 मई को पकड़े गए तेन्दुए को कहां छोड़ा गया है?’ जिस पर जनसूचना अधिकारी ने सूचना का अधिकार अधिनियम 8 (1) (ए) का हवाला देकर सूचना देने से इनकार कर दिया। अब इस धारा के क्या नियम है। इसको सुनकर आप हैरान हो जाएंगे। दरअसल इस धारा के तहत वह सूचना नहीं दी जानी है ‘जिससे भारत की प्रभुता और अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े, वहीं जिसके प्रकटन से राज्य की सुरक्षा पर प्रभाव पड़े, जिसके प्रकटन से राज्य के वैज्ञानिक या आर्थिक हित में प्रतिकूल प्रभाव पड़े, वहीं जिसके प्रकटन से विदेश से संबंध पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े अथवा जिसके प्रकटन से किसी अपराध को करने का उद्दीपन होता है। अब वन्यजीव प्रेमी दर्द किससे कहें भला बेचारे तेन्दूएं का उपरोक्त धारा से क्या लेना-देना। खैर राज्य सूचना आयोग बिना मुखिया के दो साल से चल रहा है, ऐसे में सूचना के अधिकार अधिनियम की ऐसी ही दशा होगी।

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