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सचिव समेत कांकेर, सक्ति, जांजगीर, दुर्ग,
गरियाबंद कलेक्टर बदले जाएंगे
कलेक्टरों की संभावित ट्रांसफर लिस्ट विधानसभा सत्र के बाद आ सकती है। हालांकि इस लिस्ट में से एक नाम जीपीएम (गौरेला-पेंड्रा-मारवाही) कलेक्टर का भी था, लेकिन स्वास्थ्य मंत्री से तना-तनी की वजह से लिस्ट आने तक भी इंतजार नहीं किया गया और जीपीएम के कलेक्टर डॉ संतोष कुमार देवांगन को हटा दिया गया है। उनकी जगह 2015 बैच के आईएएस अफसर विजय दयाराम को जीपीएम का नया कलेक्टर बनाया गया है। वहीं अगली लिस्ट में कांकेर कलेक्टर नीलेश क्षीरसागर, सक्ति कलेक्टर अमृत विकास तोपनो, जांजगीर-चांपा कलेक्टर जन्मेजय महोबे, गरियाबंद कलेक्टर भगवान सिंह उईके, दुर्ग कलेक्टर अभिजीत सिंह, बालोद कलेक्टर दिव्या उमेश मिश्रा बदले जा सकते हैं। दुर्ग कलेक्टर को दुर्ग से बड़ा जिला दिया जा सकता है। वहीं दुर्ग में भी किसी बड़े जिले के कलेक्टर को शिफ्ट किया जा सकता है। महोबे को अब फील्ड से हटाकर मुख्यालय लाया जा सकता है। कांकेर कलेक्टर नीलेश क्षीरसागर को भी हटाने के संकेत हैं। इसके साथ ही सक्ति जिले में नये कलेक्टर को भेजा जा सकता है। गरियाबंद कलेक्टर भगवान दास उईके इसी साल दिसंबर में रिटायर हो रहे हैं। संभवत उन्हें मुख्यालय लाया जा सकता है। इसके अलावा भी कुछ चौकाने वाले नाम भी इस लिस्ट में सामने आ सकते हैं। वहीं इसी लिस्ट में कुछ सचिवों के विभाग भी बदलने की संभावना है।
10 हजार से अधिक शिक्षकों पर विभाग की तिरछी नजर
छत्तीसगढ़ में शिक्षा के स्तर को सुधारने की जमकर कवायद हो रही है। इंफ्रास्ट्रक्चर की बात छोड़ दें (स्कूल और भवन निर्माण) तो विभाग में कसावट लाने मंत्री और सिक्रेटरी जमकर पसीने बहा रहे हैं। विभाग के सचिव डॉ के.पी. सिंह शिक्षकों की डिजिटल अटेंडेंट की लगातार मॉनिटरिंग कर रहे हैं। अटेंडेंट का यह आंकड़ा 82 प्रतिशत तक पहुँच गया है। वहीं विभाग के तकरीबन 10 हजार कर्मचारी और अधिकारी (शिक्षक समेत) संलग्नीकरण में सेवाएं दे रहे है, जिसके चलते कहीं न कहीं सरकारी स्कूलों में शिक्षा प्रभावित हो रही है। इसके लिए भी प्रभावी कार्ययोजना बनाई जा रही है। संभव है संलग्नीकरण में काम कर रहे ज्यादातर शिक्षकों को उनके मूल विभाग भेजा जा सकता है। निश्चित ही स्कूल शिक्षा विभाग के लिए यह दोनों काम टेढ़ी खीर है। लेकिन इन दोनों कामों में कुछ हद तक सफलता मिल चुकी है। खैर सरकार चाह ले तो असंभव जैसा कोई विषय ही नहीं होता। सरकार की इच्छाशक्ति ही है, जिसके बदौलत यह सोचा जा रहा है कि सरकारी स्कूल के बच्चे भी सिलेबस से पीछे ना हों इसलिए अब आगामी वर्ष से 1 अप्रैल से ही स्कूल शुरू कर दिए जाएंगे। वहीं सरकारी स्कूलों में पढ़ाई कर रहे बच्चों की अटेंडेंस पर भी अब नजर रहेगी। इसके साथ ही बच्चों को समुचित भोजन मिल सके, इसके लिए सेंट्रल कैंटीन का संचालन किया जायेगा। कुल मिलाकर शिक्षा का स्तर ऊपर उठे इसको लेकर जमकर कसरत की जा रही है।
सिर में बर्फ, जुबान में मिश्री, पैर में चक्र
और “झूठ मत बोलिये” का क्या?
राज्य की जनता इन दिनों मंत्रियों की कार्यप्रणाली से काफी खफा है। मंत्रियों की विश्वसनीयता पर संकट के गहरे बादल छाये हुए हैं। इस बीच मुख्यमन्त्री विष्णुदेव साय और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंहदेव ने 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारियाँ शुरू कर दी हैं। इसके लिए हाल ही में सभी प्रकोष्ठों की बैठक रखी गई। भले ही मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का स्वभाव सरल है, लेकिन उनके पास राजनीति का लंबा तजुर्बा है, उनके पास मंत्रियों और विधायकों के रिपोर्ट कार्ड मौजूद है। शायद यही कारण है कि इस बैठक के माध्यम से मुख्यमंत्री विष्णुदेव ने कार्यकर्ताओं को स्पष्ट संदेश दिया और कहा कि सिर पर बर्फ, जुबान में मिश्री, और पैर चक्र की तरह चलने चाहिए। मतलब ठंडे दिमाग से काम करिए, जनता से अच्छा व्यवहार करिए और घर में मत बैठिए, पैर को चक्र की तरह चलाइए, जितना ज़्यादा हो सके लोगो से मिलिए। एक मुखिया के नाते मुख्यमंत्री साय ने सभी को सही सलाह दी। वह बहुत ज़्यादा कूटनीतिज्ञ नहीं हैं, इसलिए इतनी ही नसीहत देकर सुधारने का स्पष्ट संदेश दिया। लेकिन इसमें मंत्रियों लिये एक और नसीहत जोडऩे की जरूरत है ”झूठ मत बोलिये”, क्योंकि विष्णुदेव साय के ज्यादातर मंत्री जनता के सामने खुलेआम झूठ बोल रहे हैं, जिसके कारण उनके मंत्री लबरा साबित हो रहे हैं, और कहीं ना कहीं इससे सरकार की छबि में भी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। नकटी गाँव का मामला सबके सामने है। यहाँ मंत्री कुछ और कह रहे है और उनके अफसर तथा विभागीय दस्तावेज कुछ और बयान कर रहे हैं। नकटी कांड में एक मंत्री ने सबके सामने खुलेआम झूठ परोसा। सच्चाई शीशे की तरह स्पष्ट दिख रही है, लेकिन मंत्री शुतुरमुर्ग की भूमिका में नजर आये। कभी वह अपने पार्टी के कार्यकर्ताओं से अपना ही पीए बनकर झूठ बोलते नजर आये, तो कभी जनता के सामने अपने विभाग के अधीन बोर्ड के चेयरमैन से झूठ बुलवाया। कभी विधानसभा में खुद कहा कि नकटी गाँव में विधायकों के लिए आवास की जगह चिह्नांकित कर ली गई है, तो कभी यह कहा गया कि कोई योजना नहीं है। सवाल यह उठता है कि जनता जनार्दन से मंत्रियों को इतना झूठ क्यों बोलना पड़ रहा है? क्या मंत्रियों को जनता पर विश्वास नहीं रहा? या फिर जनता मंत्रियों पर विश्वास नहीं कर रही? खैर यह सोशल मीडिया का दौर है, यहाँ सब उजागर हो जाता है। नकटी गाँव का सच सबके सामने है। अब चक्र की बात करते हैं। मुख्यमंत्री जी का कहना बिलकुल सही है, कि चलायमान रहिए, लोगो से मिलिए। लेकिन जरा सोचिए जो मंत्री कार्यकर्ताओं से फोन पर अपना पीए बनकर झूठ बोले, मीडिया के सामने जनता को गुमराह करे। उसका पैर चक्र के समान कैसे चलता होगा? वह कार्यकर्ताओं से कैसे मिलता होगा? उसके जुबान में मिश्री कहाँ से आएगी? खैर जो जैसा करेगा, वह वैसा भरेगा। फिलहाल भाजपा 2028 में होने वाले विधानसभा के चुनाव की तैयारी में जुट गई है। पार्टी में बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। मंत्री क्या कर रहे हैं? यह तो वही जाने।
साड़ी के बाद जूता-चप्पल में भी खेल
छत्तीसगढ़ में जितनी भी बाँटने वाली योजनाएँ है उसमेें से ज़्यादातर भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी की भेंट चढ़ जाती हैं। बीते माह महिला एवं बाल विकास द्वारा बाँटीं जाने वाली साड़ी में धांधली कर दी गई। हल्ला हुआ साडिय़ों को वापस किया गया। अब साड़ी न देकर सीधा राशि दिये जाने का फैसला लिया गया है। तो वहीं यह मामला ठंडा नहीं हुआ था कि अब तेंदूपत्ता संग्राहकों को जूता-चप्पल बाँटने में कमीशनखोरी की बिसात बिछा दी गई, जिसके चलते हाईकोर्ट ने चरणपादुका के टेंडर को ही निरस्त कर दिया। नतीजन मई माह में बंटने वाली चरणपादुका जुलाई माह में भी नहीं बंट पाई। दरअसल यहाँ जूता-चप्पल में खेल पिछले साल भी किया गया था। पिछले साल एल-1 को टेंडर ना देकर एल-2 को कार्य सौंप दिया गया था। अब आप समझ सकते हैं ऐसा क्यों किया गया था? इस बार भी कमीशनखोरी के चक्कर में नियम-शर्त बदल दी गई। लेकिन हाईकोर्ट ने कमीशनखोरों के इरादे पर पानी फेर दिया। लेकिन इस कमीशनखोरी के चक्कर में आजतक चरणपादुका नहीं बाँटा गया है। आखिर कमीशन का खुला खेल कौंन खेल रहा है? जो गरीबों के पैर में चप्पल-जूता तक नहीं देख सकता? आखिर कब बटेंगी चरण पादुका। इस कमीशाखोरी के लिए जवाबदेही क्यों तय नहीं की जा रही? अब कारण जो भी हो लेकिन साड़ी के बाद जूता-चप्पल में कमीशनखोरी की जमकर चर्चा हो रही है।
अजय और प्रशांत की वापसी, रायपुर कमिश्नरेट का दबदबा
2004 बैच के आईपीएस अफसर अजय कुमार यादव की एक बार फिर वापसी हुई है। अजय कुमार यादव को पुलिस अकादमी चंदखुरी से बाहर निकालकर राज्य सरकार ने राजनांदगाँव रेंज का नया पुलिस महानिरीक्षक बनाया है। इसके साथ ही आईजी प्रशांत अग्रवाल को बस्तर से पुलिस मुख्यालय लाया गया है। दरअसल प्रशांत अग्रवाल का कांग्रेस की सरकार जाने के बाद बस्तर ट्रांसफर कर दिया गया था, अब एक बार फिर प्रशांत की रायपुर वापसी हो चुकी है। वहीं आईपीएस लिस्ट में सबसे ज़्यादा दबदबा रायपुर पुलिस कमिश्नरेट का रहा, रायपुर के तीन डीसीपी एसपी बनाये गये हैं। मयंक गुर्जर, उमेश कुमार गुप्ता और संदीप पटेल तीनों अफसरों को एसपी बनाकर जिलों की कमान सौंपी गई है। कुल मिलाकर इस लिस्ट में रायपुर कमिश्नरेट का दबदबा दिखा। वहीं कांग्रेस सरकार में अच्छी पोस्टिंग के चलते जिन अफसरों को लूप लाइन में डाला गया था, उन्हें लंबे समय के बाद मेन धुरी में लाया गया है।
रामगोपाल का सरेंडर, मायने?
ईडी की हिट लिस्ट में रहे कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल ने आखिरकार 3 साल बाद ईओडब्ल्यू के समक्ष सरेंडर कर दिया। जो बड़ी-बड़ी जाँच एजेंसियां नहीं कर पायी वह काम राज्य की जांच एजेंसी ने कर दिखलाया। फिलहाल रामगोपाल ने प्लानिंग के साथ सरेंडर किया या वास्तव में जाँच एजेंसियों ने ताकत लगाई, और उन्हें गिरफतार किया, इसका खुलासा तो निकट भविष्य में हो जाएगा। दरअसल रामगोपाल अग्रवाल पर आरोप है कि उन्होंने पार्टी फंड के लिए 800 करोड़ रुपये जुटाए। आरोप यह भी है कि यह राशि कोल लेवी से जुटाई गई है। कहा तो यह भी जाता है कि रकम बोरियों में भरकर कांग्रेस भवन लाई जाती थी, और हवाला नेटवर्क के द्वारा दिल्ली भेजी जाती थी। हालांकि कोषाध्यक्ष का काम तो रकम इकट्ठा करना ही होता है। अब रामगोपाल ने रकम किस तरीके से एकत्रित किए इस पर फैसला न्यायालय को करना है। वहीं फरारी के दौरान रामगोपाल अग्रवाल ने पुरी, बनारस, प्रयागराज जैसे धार्मिक स्थलों में पूजा भी करवाई। इस दौरान वह आठ राज्यों के आश्रय में रहे। लेकिन पुलिस तकरीबन 3 साल बाद उन तक पहुँच पायी? अब उन्होंने खुद विशेष प्रयोजन के तहत सरेंडर किया? या फिर जाँच एजेंसियाँ के प्रेशर में सरेंडर किया गया? यह तो जल्द स्पष्ट हो जाएगा।
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