नासिक । शारदीय नवरात्र का पर्व नजदीक आते ही देशभर के देवी मंदिरों में तैयारियां शुरू हो गई हैं। महाराष्ट्र के नासिक जिले के वणी क्षेत्र में स्थित मां सप्तश्रृंगी देवी का मंदिर भी प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। मान्यता है कि यहां माता सती की दाहिनी भुजा गिरी थी। इसी कारण इस स्थान को शक्तिपीठों की परंपरा में विशेष महत्व प्राप्त है। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध ‘साढ़े तीन शक्तिपीठों’ में शामिल होने के कारण मां सप्तश्रृंगी के धाम को अर्धशक्तिपीठ भी कहा जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां सप्तश्रृंगी 18 भुजाओं वाले स्वरूप में विराजमान हैं। मान्यता यह भी है कि महिषासुर का वध करने के बाद देवी ने सह्याद्रि पर्वतमाला की सात चोटियों पर विश्राम किया और यहां अपने रौद्र रूप को शांत किया। नवरात्र के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां के दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पहुंचते हैं।
महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में शामिल है यह धाम
महाराष्ट्र में साढ़े तीन शक्तिपीठों की धार्मिक परंपरा प्रचलित है। इसमें कोल्हापुर की महालक्ष्मी, तुलजापुर की तुलजा भवानी और माहुर की रेणुका माता को तीन पूर्ण शक्तिपीठ माना जाता है। वहीं, नासिक के पास स्थित सप्तश्रृंगी देवी के मंदिर को अर्धशक्तिपीठ कहा जाता है।
धार्मिक परंपरा के अनुसार, मां सप्तश्रृंगी यहां देवी के कुमारी स्वरूप में पूजित हैं। इसी विशिष्ट मान्यता के कारण उन्हें महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में आधे पीठ का स्थान दिया गया है।
माता सती की दाहिनी भुजा गिरने की मान्यता
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें भगवान शिव और माता सती को आमंत्रित नहीं किया गया। इसके बावजूद माता सती यज्ञ में पहुंचीं, जहां भगवान शिव के प्रति अपमानजनक व्यवहार से आहत होकर उन्होंने यज्ञ की अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए।
माता सती की मृत्यु से भगवान शिव अत्यंत दुखी और क्रोधित हो गए। वे उनके पार्थिव शरीर को लेकर तांडव करने लगे। मान्यता है कि सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को खंडित किया। इस दौरान उनके शरीर के विभिन्न अंग अलग-अलग स्थानों पर गिरे और वे स्थल शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुए।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता सती की दाहिनी भुजा महाराष्ट्र के वणी क्षेत्र में सप्तश्रृंगी पर्वत पर गिरी थी। इसी वजह से इस मंदिर को शक्तिपीठ की परंपरा में विशेष स्थान प्राप्त है।
महिषासुर वध के बाद मां ने यहीं शांत किया था रौद्र रूप
मां सप्तश्रृंगी से जुड़ी एक अन्य मान्यता देवी दुर्गा और महिषासुर के युद्ध से संबंधित है। धार्मिक कथाओं के अनुसार, महिषासुर का वध करने के बाद देवी अत्यंत उग्र स्वरूप में थीं। इसके बाद उन्होंने सह्याद्रि की सात पर्वत चोटियों पर निवास किया और यहां विश्राम कर अपने रौद्र रूप को शांत किया।
सप्तश्रृंगी नाम भी सात पर्वत चोटियों से जुड़ा है। यहां देवी को शक्ति और करुणा के स्वरूप में पूजा जाता है। श्रद्धालु मानते हैं कि मां अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और उन्हें कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति प्रदान करती हैं।
18 भुजाओं वाली मां सप्तश्रृंगी की प्रतिमा है खास
मंदिर में स्थापित मां सप्तश्रृंगी की प्रतिमा लगभग आठ फीट ऊंची बताई जाती है। देवी का स्वरूप सिंदूर से आच्छादित होने के कारण गहरे सिंदूरी रंग में दिखाई देता है। उन्हें अष्टादशभुजा यानी 18 भुजाओं वाली देवी के रूप में पूजा जाता है।
धार्मिक वर्णनों के अनुसार, मां के हाथों में त्रिशूल, सुदर्शन चक्र, शंख, धनुष-बाण, वज्र, तलवार, ढाल, गदा और अन्य दिव्य अस्त्र-शस्त्र हैं। ये आयुध देवी की शक्ति, धर्म की रक्षा और अधर्म पर विजय के प्रतीक माने जाते हैं।
मां सप्तश्रृंगी को महालक्ष्मी के स्वरूप से भी जोड़ा जाता है। देवी की प्रतिमा की गर्दन एक ओर झुकी हुई दिखाई देती है। स्थानीय मान्यता है कि ऋषि मार्कंडेय जब देवी की स्तुति कर रहे थे, तब उनकी प्रार्थना सुनने के लिए मां ने अपना मुख उनकी ओर झुका लिया था।
ऋषि मार्कंडेय और दुर्गा सप्तशती से जुड़ी मान्यता
सप्तश्रृंगी धाम का संबंध ऋषि मार्कंडेय की तपस्या और देवी महात्म्य की परंपरा से भी जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, ऋषि मार्कंडेय ने इसी क्षेत्र में देवी की महिमा का वर्णन किया था।
मार्कंडेय पुराण में वर्णित देवी महात्म्य को दुर्गा सप्तशती के नाम से भी जाना जाता है। नवरात्र के दौरान श्रद्धालु दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं और मां दुर्गा से सुख, शांति तथा समृद्धि की कामना करते हैं।
नवरात्र में विशेष पूजा और गोद भराई की परंपरा
नवरात्र के अवसर पर सप्तश्रृंगी मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। यहां मां की पूजा-अर्चना के साथ गोद भराई की परंपरा भी प्रचलित है। भक्त नारियल, चुनरी, साड़ी, चूड़ियां, सिंदूर, फूल और मिठाई अर्पित कर देवी से आशीर्वाद मांगते हैं।
मंदिर में पूरन पोली का प्रसाद भी श्रद्धालुओं के बीच लोकप्रिय है। भक्त मां के दर्शन के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करते हैं।
पहाड़ों के बीच स्थित है मां का भव्य मंदिर
मां सप्तश्रृंगी का मंदिर नासिक से लगभग 65 किलोमीटर दूर पर्वतीय क्षेत्र में स्थित है। यह समुद्र तल से करीब 4,800 फीट की ऊंचाई पर सात पर्वत चोटियों के बीच विराजमान है। मंदिर के आसपास ऊंचे पहाड़ और गहरी खाइयां इसकी प्राकृतिक सुंदरता को विशेष बनाती हैं।
परंपरागत रूप से श्रद्धालु सीढ़ियां चढ़कर मां के दर्शन के लिए पहुंचते रहे हैं। मंदिर तक पहुंचने के लिए सड़क मार्ग की सुविधा भी उपलब्ध है, जिससे श्रद्धालुओं को यात्रा में सहूलियत मिलती है।
मां सप्तश्रृंगी का यह धाम धार्मिक आस्था, पौराणिक मान्यताओं और प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा संगम माना जाता है। नवरात्र के दौरान यहां दर्शन करने पहुंचने वाले भक्त मां से शक्ति, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद मांगते हैं।