साहित्य मधुशाला द्वारा वर्चुअल काव्य संध्या कार्यक्रम का हुआ आयोजन

शक्ति-चंद घड़ियाँ चलो उनके साथ गुज़ारे,जिनके न हो माँ- बाप न कोई सहारे,देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था साहित्य मधुशाला के तत्वाधान में ऑनलाइन आयोजित काव्य संध्या में कवियों ने विभिन्न विषयों पर एक से बढ़कर एक रचना प्रस्तुत कर समा बांध दिया। अपनी कविताओं के माध्यम से कवियों ने कई सामाजिक मुद्दों को भी उजागर किया

कार्यक्रम का शुभारंभ बैंगलोर से जुड़े जैन राजेंद्र गुलेच्छा राज की माँ सरस्वती की वंदना-हे श्रुत की देवी.. हे माँ सरस्वती कुमति हटाकर हमें दे सुमति। से हुआ। दीप प्रज्ज्वलन के कवि जयप्रकाश अग्रवाल (नेपाल) ने कहा-अपने आते नहीं, मेहमान बहुत हैं,ख़्वाबों को समेटे आसमान बहुत हैं,असम से जुड़ी शमा जैन सिंघल ने सावन में मलहारों को याद करते कहा-मेघों ने मलहार सुनाया, उमड़ -घुमड़ काली घटा छाई,अपने प्रियतम से मिलने, सावन की रूत चली आई,दीपिका मिश्रा ने मित्र दिवस पर दोस्ती का महत्व बताते कहा कि-फूल की खिलती कली जैसे बहार है दोस्ती,दोपहर चैन भरी नींद की करार है दोस्ती,टाटानगर से प्रमोद खीरवाल ने बढ़ती उम्र में जवां दिल के जवां प्यार को पंख लगाते कहा–मैं मतवाला भंवरा 60 का, वो अलबेली तितली 55 की। दोनों का प्यार जवां अब भी, घंटी सुन पास आ बैठती,कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे नंदलाल सारस्वत स्वदेशी ने शहीदों के परिजनों के दर्द को बयां करते बहुत ही मार्मिक रचना पेश कर माहौल को गमगीन बना दिया। उन्होंने कहा कि-माँ चुप चुप है तब से, बात हुई क्या है,माँ पूछ रही सब से

कार्यक्रम का संचालन कर रही मंच की संचालिका उषा जैन केडिया ने कहा कि-चंद घड़ियाँ चलो उनके साथ गुज़ारे,जिनके न हो माँ- बाप न कोई सहारे,भूखे न रह जाये कोई बच्चे हमारे,प्रमोद चौहान प्रेम, बिजनौर ने कहा कि- घर आंगन को फूलों सा महकाती हैं बेटियां,चांद तारों से आसमां सा सजाती हैं बेटियां,वीणा बंका ने भ्रूण हत्या पर अपने मार्मिक भाव व्यक्त करते कहा-हे इंसान ! तुम सभ्य हो शिक्षित हो,मत बनो पाप के भागी। श्रीलाल जोशी श्री ने जातिवाद का विरोध करते कहा- अरे रोको, कोई विष घोल रहा है। जाति के नाम पर,कार्यक्रम के अंत में दीपिका मिश्रा ने सभी का आभार व्यक्त किया।

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