किरंदुल। नगर में बंगाली कल्चरल एसोसिएशन द्वारा पिछले 60 वर्षों से लगातार दुर्गा पूजा का आयोजन किया जा रहा है। छह दशकों से चली आ रही यह परंपरा धार्मिक आस्था के साथ-साथ नगर की सांस्कृतिक एकता और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक बन चुकी है। दुर्गा पूजा के अंतिम दिन विजयादशमी के अवसर पर आयोजित पारंपरिक सिंदूर खेला में महिलाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और मां दुर्गा को भावपूर्ण विदाई दी।
सिंदूर खेला में दिखी बंगाली संस्कृति की झलक
दशमी के अवसर पर मातृशक्ति ने विधि-विधान से मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित किया। इसके बाद पारंपरिक सिंदूर खेला का आयोजन हुआ, जिसमें विवाहित महिलाओं ने एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुख-समृद्धि, खुशहाली और अखंड सौभाग्य की कामना की।
ढाक की गूंजती थाप और शंख ध्वनि के बीच पूरा पूजा पंडाल भक्तिमय वातावरण से सराबोर हो गया। महिलाओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए इस अनुष्ठान में हिस्सा लिया। सिंदूर खेला बंगाली संस्कृति की एक विशिष्ट परंपरा है, जो मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा, प्रेम और पारिवारिक मंगलकामना को अभिव्यक्त करती है।
छह दशकों से सहेजी जा रही सांस्कृतिक विरासत
बंगाली कल्चरल एसोसिएशन, किरंदुल द्वारा छह दशकों से दुर्गा पूजा का निरंतर आयोजन किया जाना नगर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है। यह आयोजन विभिन्न पीढ़ियों को अपनी परंपराओं से जोड़ने के साथ सामाजिक मेल-मिलाप और आपसी भाईचारे को भी मजबूत करता है।
एसोसिएशन के पदाधिकारियों का रहा विशेष योगदान
इस आयोजन को सफल बनाने में बंगाली कल्चरल एसोसिएशन के अध्यक्ष सुमित धर, सचिव अटन सरकार सहित एसोसिएशन के सभी पदाधिकारियों और सदस्यों का विशेष योगदान रहा। सामूहिक सहयोग और श्रद्धालुओं की सहभागिता से दुर्गा पूजा का यह आयोजन उत्साह एवं पारंपरिक उल्लास के साथ संपन्न हुआ।
किरंदुल में छह दशकों से निभाई जा रही दुर्गा पूजा की परंपरा धार्मिक आस्था के संरक्षण के साथ बंगाली संस्कृति की जीवंतता और सामाजिक एकजुटता का संदेश दे रही है।