नई दिल्ली । किराये की संपत्ति पर लंबे समय तक कब्जा बनाए रखना, भले ही किराया नियमित रूप से दिया जा रहा हो, कानूनी विवाद का कारण बन सकता है। दिल्ली हाई कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) को करीब 3.27 करोड़ रुपये ‘मीस्न प्रॉफिट’ (Mesne Profits) के तौर पर मकान मालकिन को भुगतान करने का निर्देश दिया है। इस रकम पर 6 प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा।
यह मामला दिल्ली के पॉश डिफेंस कॉलोनी मार्केट स्थित करीब 2,800 वर्गफुट की संपत्ति से जुड़ा है।
2002 में SBI को किराये पर दी थी संपत्ति
मामले के अनुसार, मकान मालकिन राज कुमारी गर्ग ने वर्ष 2002 में अपनी संपत्ति की पहली और दूसरी मंजिल SBI को तीन साल के लिए किराये पर दी थी। इसके लिए रेंट एग्रीमेंट किया गया था और शुरुआती मासिक किराया 62 हजार रुपये तय किया गया था। समझौते में नवीनीकरण की स्थिति में किराये में 20 प्रतिशत वृद्धि की शर्त भी थी।
यह एग्रीमेंट 31 दिसंबर 2004 को समाप्त हो गया। इसके बाद बैंक ने नया रेंट एग्रीमेंट नहीं कराया और संपत्ति खाली भी नहीं की। हालांकि, बैंक पहले से तय शर्तों के अनुसार बढ़ा हुआ किराया देता रहा।
2008 में भेजा गया था खाली करने का नोटिस
मकान मालकिन ने 9 मई 2008 को बैंक को कानूनी नोटिस भेजकर संपत्ति खाली करने की मांग की। साथ ही जून 2008 से करीब 4 लाख रुपये प्रति माह मीस्न प्रॉफिट की मांग की गई।
इसके बावजूद बैंक संपत्ति में बना रहा। बाद में विवाद अदालत पहुंचा। SBI ने आखिरकार 31 दिसंबर 2017 को संपत्ति खाली कर दी, लेकिन तब तक मामले से जुड़ा कानूनी विवाद जारी रहा।
मई 2012 को क्यों माना गया अहम?
मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य वर्ष 2007 का भी था। राज कुमारी गर्ग ने बैंक से 25 लाख रुपये का लोन लिया था। इसके लिए उन्होंने एक नोटरीकृत अंडरटेकिंग दी थी, जिसके तहत लोन पूरी तरह चुकाए जाने तक बैंक को संपत्ति में रहने देने पर सहमति बनी थी।
यह भी तय हुआ था कि लोन की EMI मकान मालकिन को दिए जाने वाले किराये में समायोजित की जाएगी। लोन मई 2012 में पूरी तरह चुका दिया गया।
इसी वजह से अदालत ने मई 2012 के बाद की अवधि को महत्वपूर्ण माना और इस अवधि से कब्जे को अनधिकृत माने जाने के आधार पर मीस्न प्रॉफिट की गणना की।
3.27 करोड़ रुपये का मीस्न प्रॉफिट
9 जुलाई 2026 के अपने फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट ने मई 2012 से दिसंबर 2015 तक की अवधि के लिए 163 रुपये प्रति वर्गफुट प्रति माह की दर से मीस्न प्रॉफिट निर्धारित किया।
इसके बाद जनवरी 2016 से 31 दिसंबर 2017 तक की अवधि के लिए रकम की गणना निर्धारित किराये में 15 प्रतिशत की वृद्धि के आधार पर करने का निर्देश दिया गया। अदालत ने कुल मिलाकर करीब 3.27 करोड़ रुपये की राशि का भुगतान करने का आदेश दिया और इस पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी लगाया।
क्या होता है Mesne Profits?
कानूनी भाषा में Mesne Profits यानी मध्यवर्ती लाभ उस मुआवजे या लाभ को कहा जाता है, जो किसी संपत्ति पर गलत या अनधिकृत कब्जा रखने वाले व्यक्ति से वास्तविक मालिक को मिल सकता है।
इस मामले में विवाद का मुख्य पहलू यह था कि रेंट एग्रीमेंट समाप्त होने के बाद किस समय से बैंक का कब्जा अनधिकृत माना जाए। अदालत के फैसले में मई 2012 के बाद की अवधि को इस संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया।
किराया देना ही पर्याप्त नहीं
मामले से यह कानूनी सबक सामने आता है कि किरायेदार द्वारा किराया देते रहने से हर स्थिति में समाप्त हो चुके रेंट एग्रीमेंट की अवधि स्वतः जारी नहीं मानी जा सकती। यदि किरायेदारी की अवधि समाप्त हो गई है, तो मकान मालिक और किरायेदार दोनों के लिए नया समझौता, उसकी शर्तें और कब्जे की कानूनी स्थिति स्पष्ट रखना महत्वपूर्ण है।
हालांकि, किसी विशेष किरायेदारी विवाद में अधिकार और देनदारी संबंधित अनुबंध, भुगतान, नोटिस और अदालत के निष्कर्षों पर निर्भर करते हैं।