पितृपक्ष | पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण के दौरान पूजा-विधि के साथ बर्तनों के चयन को लेकर भी धार्मिक परंपराएं बताई गई हैं। मान्यताओं के अनुसार, इन कर्मों के लिए कुछ धातुओं को शुभ माना जाता है, जबकि स्टील, लोहे, कांच और प्लास्टिक के बर्तनों से परहेज करने की सलाह दी जाती है।
चांदी को माना गया है शुभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोज के लिए चांदी के बर्तन का इस्तेमाल शुभ माना जाता है। चांदी उपलब्ध न होने पर तांबा, पीतल या कांसे के पात्रों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
इन धातुओं के पीछे धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताएं भी जुड़ी हुई हैं। वहीं, इन बर्तनों की उपलब्धता न होने पर दोने या पत्तल का इस्तेमाल करने की परंपरा कई जगहों पर देखी जाती है।
स्टील और लोहे के बर्तनों से परहेज
पितृपक्ष के श्राद्ध कर्म और तर्पण में स्टील और लोहे के बर्तनों का इस्तेमाल नहीं करने की धार्मिक मान्यता बताई गई है। इसी तरह कांच और प्लास्टिक के पात्रों से भी परहेज करने की सलाह दी जाती है।
हालांकि, ये नियम धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में श्राद्ध की विधि तथा बर्तनों को लेकर परंपराएं अलग हो सकती हैं।
ऐसे किया जाता है तर्पण
परंपरा के अनुसार तर्पण के लिए सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। इसके बाद पितरों का स्मरण करते हुए स्वच्छ पात्र में जल और काले तिल लिए जाते हैं। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों के नाम और गोत्र का स्मरण करते हुए जल अर्पित करने की परंपरा है।
तर्पण के बाद पितरों के निमित्त भोजन, अन्न, वस्त्र या सामर्थ्य के अनुसार दान करने की परंपरा भी है।
कब से शुरू होगा पितृपक्ष?
दिए गए विवरण के अनुसार, पितृपक्ष 2026 की शुरुआत 27 सितंबर से होगी और 10 अक्टूबर को पितृपक्ष का समापन होगा। इन दिनों में परिवार अपनी परंपरा के अनुसार श्राद्ध, तर्पण और पितरों का स्मरण करते हैं।