महासमुंद: सिरपुर को मिली वैश्विक पहचान की राह, यूनेस्को की विश्व धरोहर संभावित सूची में शामिल

महासमुंद । छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में महानदी के पावन तट पर स्थित ऐतिहासिक नगरी सिरपुर को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल हुई है। सिरपुर को यूनेस्को की विश्व धरोहर संभावित सूची (Tentative List) में शामिल किया गया है। इससे छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, प्राचीन स्थापत्य कला और पुरातात्विक महत्व को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलने की उम्मीद बढ़ गई है।

महासमुंद कलेक्टर श्री विनय कुमार लंगेह ने बताया कि सिरपुर को यूनेस्को की आधिकारिक वेबसाइट पर विश्व धरोहर की संभावित सूची में तीसरे क्रम पर स्थान दिया गया है। यह उपलब्धि क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण, संवर्धन और पर्यटन विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

प्राचीन दक्षिण कोसल की गौरवशाली राजधानी रहा है सिरपुर

सिरपुर प्राचीन काल में श्रीपुर के नाम से प्रसिद्ध था और पांडुवंशी शासकों के शासनकाल में दक्षिण कोसल की राजधानी होने का गौरव प्राप्त था। यहां के ताम्रपत्रों और पुरातात्विक अवशेषों से इस क्षेत्र की प्राचीनता, सांस्कृतिक समृद्धि और ऐतिहासिक महत्व का पता चलता है।

महाशिवगुप्त बालार्जुन के दीर्घ शासनकाल में सिरपुर में अनेक मंदिरों, बौद्ध विहारों, सरोवरों और उद्यानों का निर्माण हुआ। सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री एवं विद्वान ह्वेनसांग ने भी सिरपुर की यात्रा की थी। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उस समय यह क्षेत्र बौद्ध धर्म और अध्ययन-अध्यापन का प्रमुख केंद्र था। शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन परंपराओं से जुड़े अवशेष सिरपुर की धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक विविधता को दर्शाते हैं।

लक्ष्मण मंदिर स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण

सिरपुर का प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर भारतीय प्राचीन स्थापत्य कला की उत्कृष्ट धरोहरों में शामिल है। ईंटों से निर्मित यह मंदिर अपनी कलात्मक सजावट, वास्तु योजना और शिल्प कौशल के लिए विशेष पहचान रखता है। इसका निर्माण लगभग सातवीं शताब्दी में महाशिवगुप्त बालार्जुन की माता वासटा ने अपने दिवंगत पति हर्षगुप्त की स्मृति में करवाया था।

मंदिर की बाहरी दीवारों, प्रवेश द्वार और विभिन्न अलंकरणों में तत्कालीन कलाकारों की अद्भुत दक्षता दिखाई देती है। मंदिर परिसर के समीप स्थित संग्रहालय में सिरपुर से प्राप्त अनेक दुर्लभ प्रतिमाओं और स्थापत्य खंडों को संरक्षित किया गया है।

बौद्ध विहारों और पुरातात्विक अवशेषों का महत्वपूर्ण केंद्र

सिरपुर में उत्खनन के दौरान आनंदप्रभु कुटी विहार, स्वास्तिक विहार और तीवरदेव महाविहार सहित अनेक महत्वपूर्ण पुरातात्विक अवशेष सामने आए हैं। इन विहारों की संरचना प्राचीन बौद्ध स्थापत्य, धार्मिक गतिविधियों और तत्कालीन सामाजिक जीवन की जानकारी देती है।

यहां से भगवान बुद्ध, अवलोकितेश्वर, विष्णु, शिव तथा अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं, धातु कलाकृतियां, मिट्टी के खिलौने, आभूषण निर्माण के उपकरण और विभिन्न ऐतिहासिक सिक्के प्राप्त हुए हैं। सिरपुर से मिली धातु प्रतिमाएं भारतीय कला की उत्कृष्ट परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं और इनमें से कई कलाकृतियां देश-विदेश के संग्रहालयों में संरक्षित हैं।

महानदी तट पर स्थित गंधेश्वर मंदिर, राम मंदिर के अवशेष, राजमहल परिसर और अन्य पुरातात्विक स्थल भी सिरपुर की ऐतिहासिक महत्ता को और अधिक व्यापक बनाते हैं।

संरक्षण और संवर्धन को मिलेगा बढ़ावा

केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने 1 जनवरी 2026 को सिरपुर के पुरातात्विक स्थलों का अवलोकन किया था। इस दौरान उन्होंने इन ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और संवर्धन के लिए कार्य करने तथा सिरपुर को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए प्राथमिकता से प्रयास करने की बात कही थी।

इस अवसर पर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा, धर्मस्व एवं पर्यटन मंत्री श्री राजेश अग्रवाल, सांसद श्रीमती रूपकुमारी चौधरी, महासमुंद विधायक श्री योगेश्वर राजू सिन्हा सहित अन्य जनप्रतिनिधि उपस्थित थे।

पर्यटन और स्थानीय विकास की नई संभावनाएं

यूनेस्को की संभावित सूची में शामिल होना सिरपुर की वैश्विक पहचान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण, शोध, सांस्कृतिक पर्यटन और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों को प्रोत्साहन मिलने की संभावनाएं हैं।

सिरपुर की प्राचीन विरासत, स्थापत्य कला और धार्मिक-सांस्कृतिक विविधता इसे छत्तीसगढ़ के प्रमुख ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है। अब उम्मीद की जा रही है कि संरक्षण के प्रभावी प्रयासों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती पहचान के साथ सिरपुर देश-विदेश के पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनेगा।

सिरपुर की यह उपलब्धि छत्तीसगढ़ की गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत को विश्व पटल पर स्थापित करने की दिशा में एक अहम कदम है। हालांकि, संभावित सूची में शामिल होना अंतिम विश्व धरोहर दर्जा मिलने से अलग प्रक्रिया है। अंतिम मान्यता के लिए यूनेस्को की निर्धारित प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

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