नई दिल्ली |भारत ने अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए भारी सैन्य खर्च किया है सिर्फ 2025 में ही रक्षा बजट 92.1 बिलियन डॉलर (लगभग 7.6 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंच गया। लेकिन वहीं, देश के करीब छह लाख ट्रांसजेंडर नागरिकों के कल्याण के लिए आवंटित करोड़ों रुपये प्रशासनिक सुस्ती और जटिल प्रक्रियाओं के कारण खर्च नहीं हो पाए।
केन्द्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2023-24 में किन्नर कल्याण कोष के लिए 52.91 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, लेकिन सिर्फ 6.59 करोड़ रुपये ही जमीन पर खर्च हो पाए। 2024-25 में बजट बढ़ाकर 68.46 करोड़ रुपये किया गया, लेकिन खर्च महज 5.14 करोड़ रुपये हुआ।
विशेषज्ञों के अनुसार यह केवल बजट की कमी की समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक प्राथमिकताओं और लालफीताशाही का परिणाम है। ट्रांसजेंडर नागरिक सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए जटिल फॉर्म, पहचान प्रमाण और कई दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। डिजिटल पोर्टल का अभाव और स्थानीय अधिकारियों की संवेदनशीलता की कमी भी खर्च को प्रभावित कर रही है।
सामाजिक कार्यकर्ता रेशमा प्रसाद का कहना है कि “68 करोड़ रुपये में से केवल 5 करोड़ रुपये खर्च होना सरकारी नीतियों और प्रशासन की सुस्ती का परिचायक है। जब तक अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, यह स्थिति बदलेगी नहीं।”
विशेषज्ञ और सामरिक विश्लेषक कर्नल (रिटायर्ड) अजय शुक्ला ने कहा, “देश की सीमाओं की सुरक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन मजबूत राष्ट्र केवल हथियारों से नहीं बनता। अपने नागरिकों के कल्याण में निवेश न करना दीर्घकालीन सुरक्षा और सामाजिक विकास पर असर डालता है।”
विश्लेषकों का मानना है कि बजट लैप्स को रोकने के लिए वन-स्टॉप अटेस्टेशन सेंटर, अधिकारियों की जवाबदेही और कम्युनिटी आउटरीच प्रोग्राम जैसे कदम तुरंत उठाए जाने चाहिए।
देश की सीमाओं की सुरक्षा के साथ-साथ समाज के हाशिए पर खड़े नागरिकों के अधिकारों और कल्याण पर बराबर ध्यान देना अब समय की आवश्यकता बन गया है।