नई दिल्ली। रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर भारत और अमेरिका के बीच एक बार फिर मतभेद उभरते दिखाई दे रहे हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के हालिया बयान के बाद भारत ने स्पष्ट किया है कि देश की ऊर्जा नीति का फैसला नई दिल्ली में होगा, वॉशिंगटन में नहीं।
भारत ने कहा कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा, राष्ट्रीय हित और आर्थिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तेल आयात से जुड़े निर्णय लेता है। किसी भी विदेशी शक्ति को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि भारत किस देश से और कितनी मात्रा में तेल खरीदेगा।
दरअसल, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने सीनेट की विदेश संबंध समिति में कहा था कि ट्रंप प्रशासन रूस से तेल खरीदने वाले देशों को मिली छूट और विशेष व्यवस्थाओं को समाप्त करने पर विचार कर रहा है। इन व्यवस्थाओं के कारण भारत समेत कई देश रूस से तेल आयात कर पा रहे हैं।
फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे। हालांकि, इस दौरान भारत द्वारा रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदने को लेकर पश्चिमी देशों का रुख समय-समय पर बदलता रहा।
भारत ने एक बार फिर अपनी रणनीतिक स्वायत्तता के सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि 140 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसलिए सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक फैसले राष्ट्रीय हितों के आधार पर ही लिए जाएंगे।
इस बहस के बीच चीन का मुद्दा भी चर्चा में है। विशेषज्ञों का कहना है कि चीन अब भी रूसी ऊर्जा का बड़ा खरीदार है, लेकिन उसके प्रति अमेरिका का रवैया अपेक्षाकृत नरम दिखाई देता है। इससे भारत में दोहरे मानदंडों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।