रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की आंगनबाड़ियों में इन दिनों बच्चों के लिए सीखने का माहौल पूरी तरह बदलता नजर आ रहा है। महिला एवं बाल विकास विभाग और स्वयंसेवी संस्था ‘तितली’ के सहयोग से चल रही रचनात्मक गतिविधियों ने आंगनबाड़ी केंद्रों को बच्चों के लिए जिज्ञासा, विज्ञान और रचनात्मकता का केंद्र बना दिया है।
मिट्टी के दीये बनाते छोटे-छोटे हाथ अब सिर्फ खेल नहीं रहे, बल्कि कल्पनाओं को आकार देना सीख रहे हैं। बच्चों ने गीली मिट्टी से दीये तैयार करते हुए स्पर्श, संतुलन और रचनात्मक सोच को महसूस किया। इस गतिविधि ने उन्हें अपनी सांस्कृतिक परंपराओं से भी सहज रूप से जोड़ा।
वहीं पेपर कप और धागे से बनाए गए ‘पेपर कप फोन’ ने बच्चों के बीच खास उत्साह पैदा किया। जब एक कप से बोली गई आवाज दूसरे कप तक पहुंची तो बच्चों की खुशी देखते ही बन रही थी। इस छोटे से प्रयोग के जरिए बच्चों को विज्ञान की बुनियादी अवधारणाओं को बेहद सरल और रोचक तरीके से समझाया गया।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के अनुसार इन गतिविधियों के बाद बच्चों में सवाल पूछने, नई चीजें बनाने और खुद प्रयोग करने की रुचि तेजी से बढ़ी है। साथ ही उनमें संवाद कौशल, ध्यान से सुनने और मिलकर काम करने की आदत भी विकसित हो रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रारंभिक अवस्था में खेल आधारित शिक्षा बच्चों के मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास के लिए बेहद प्रभावी होती है। बस्तर की आंगनबाड़ियों में हो रहे ये प्रयास इस बात का उदाहरण हैं कि सीखने का माहौल आनंददायक हो तो बच्चे कम उम्र में ही वैज्ञानिक सोच और रचनात्मक दृष्टिकोण विकसित कर सकते हैं।
अब बस्तर की आंगनबाड़ियां केवल पोषण केंद्र नहीं रह गई हैं, बल्कि बच्चों के सपनों, आत्मविश्वास और उज्ज्वल भविष्य को आकार देने वाले सशक्त सीख केंद्र बनती जा रही हैं।