नई दिल्ली। यमुना बाढ़ क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहे अवैध निर्माण को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने ज़ोन-O में विकसित की जा रही अवैध रिहायशी कॉलोनियों पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील इलाके में इस तरह का निर्माण पूरी तरह अस्वीकार्य है। कोर्ट ने संबंधित एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए चेतावनी दी कि यदि अवैध निर्माण नहीं रुका तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
मामले की सुनवाई जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की बेंच ने की। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि एमसीडी इंजीनियरों की निगरानी में ही नए अवैध निर्माण हो रहे हैं। कोर्ट ने संबंधित एग्जीक्यूटिव इंजीनियरों के नाम अगली सुनवाई में पेश करने और उन्हें व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यमुना बाढ़ क्षेत्र जैसे संवेदनशील इलाके में किसी भी प्रकार का नया निर्माण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। साथ ही दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) को निर्देश दिया गया कि मरम्मत या रेनोवेशन के नाम पर भी कोई नया निर्माण नहीं होने दिया जाए।
सुनवाई के दौरान जगतपुर गांव, वजीराबाद, राम घाट और मजनू का टीला स्थित न्यू अरुणा नगर समेत कई इलाकों की तस्वीरें और रिपोर्ट कोर्ट में पेश की गईं। इनमें ताजा अवैध निर्माण गतिविधियां दिखाई देने पर अदालत ने नाराजगी जताई और कहा कि संबंधित एजेंसियां कार्रवाई करने में विफल रही हैं।
केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि फिलहाल ज़ोन-O की 91 अवैध कॉलोनियों को 31 दिसंबर 2026 तक अस्थायी राहत दी गई है। यह राहत ‘नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली लॉ सेकंड एक्ट 2011’ के तहत दी गई है। हालांकि सरकार ने साफ किया कि इसका मतलब वहां रहने वाले लोगों को मालिकाना हक देना नहीं है।
केंद्र के अनुसार, इन 91 कॉलोनियों में करीब 5 से 6 लाख लोग रहते हैं और लगभग एक लाख मकान बने हुए हैं। सरकार ने बताया कि केंद्र, दिल्ली सरकार और अन्य एजेंसियां इन निवासियों के पुनर्वास और भविष्य की योजना पर विचार कर रही हैं।
मामले को गंभीर मानते हुए हाई कोर्ट ने मंत्रालय, MCD और DDA अधिकारियों को 8 जून को बैठक करने का निर्देश दिया है। साथ ही अदालत ने अगली सुनवाई में अवैध कब्जों और नए निर्माण को रोकने के लिए उठाए गए कदमों की विस्तृत रिपोर्ट पेश करने को कहा है।