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कल किसी और की बारी
कहने को तो अखिल भारतीय सेवा के अफसरों का स्थान देश में प्रथम होता है। यह शासन के सबसे मजबूत अंग होते हैं, लेकिन कई बार चंद राजनीतिक लोगों और नेताओं के आगे ये बौने साबित हो जाते हैं? आखिर ऐसी क्या मजबूरी है? किसी का दर्द तक नहीं पूछ सकते? घाव पर मरहम तक नहीं लगा सकते? खैर घाव पर यदि समय पर मरहम नहीं लगाया जाता तो उसे नसूर बनने में समय नहीं लगता। दरअसल राज्य के एक मंत्री ने एक जिले के कलेक्टर को जमकर गालियां दी, मारा-पीटा, (नोट सिर्फ भौतिक रुप से मारना ही मारना नहीं होता) धमकाया और कलेक्टरी से भी हटवा दिया। आलम यह है कि 10 जुलाई से इस अफसर को बिना काम दिए मंत्रालय में बिठा दिया गया है। पर किसी आईएएस अफसर ने चूं तक नहीं की? गाली और मार खाने वाले उस आईएएस अफसर को सुना तक नहीं गया? आखिर उसके साथ हुआ क्या? यह जानने में भी किसी की रुचि नहीं दिखी? हालांकि यह कोई पहला दफा नहीं है जब नेताओं और अफसरों में ठन जाती है। लेकिन जब सत्ताधीशों में अहम इस कदर दिखने लगे तो पतन की शुरुआत हो जाती है। वहीं अफसरों की भी चुप्पी ठीक नहीं, क्योंकि इस बढ़ते दुसाहस के शिकार अन्य अफसर भी हो सकते हैं।
मंत्रियों के पीए और सौदेबाजी
राज्य के कुछ मंत्रियों के पीए की चर्चा इन दिनों सौदेबाजी को लेकर खूब हो रही है। हालांकि पूर्व की रमन सरकार में मंत्रियों के बदनाम होने का पूरा श्रेय उनके पीए को ही दिया गया था। नतीजन 2018 के विधानसभा चुनाव में रमन सरकार के ज्यादातर मंत्री चुनाव हार गए थे। 2018 की पुनरावृत्ति फिर न हो इसलिए जब विष्णुदेव सरकार ने शपथ लिया तो मंत्रियों के पीए के लिए बहुत ही संघर्ष था। बिना क्लीनचिट के मंत्रियों को पीए रखने की अनुमति नहीं थी। लेकिन कहते हैं कि वक्त के साथ सब बदल जाता है, यहां भी बदल गया। अब पीए भी मनपसंद हैं और काम भी पसंद का। जाहिर सी बात है जब सब कुछ पसंद का हो तो सौदेबाजी भी फलने-फूलने लगती है। सत्ता के तीन साल पूरे होने से पहले ही मंत्रियों के पीए फिर हावी हो चुके हैं। बारिश के इस मौसम में सिर्फ पानी का ही सैलाब नहीं उमड़ रहा बल्कि ट्रांसफर पोष्टिंग की भी खूब बरसात हो रही है। एक विभाग तो ऐसा भी है जहां अफसर ट्रांसफर की आस में बैठे हुए हैं, लेकिन अभी भी पीए साहब का मेल-मिलाप जारी है, मोल-भाव जारी है।
भाजपा में बदलाव
भारतीय जनता पार्टी फाइनली बदलाव की ओर आगे बढऩे जा रही है। दरअसल हाल ही में विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह के निवास में जुटे सत्ता-संगठन के तमाम बड़े नेताओं के बीच इस बात को लेकर मंथन हुआ, वहीं वर्तमान राजनीतिक हालातों को लेकर भी विचार-विमर्श किया गया। कहा जा रहा है कि लंबे समय से बदलाव के कायासों पर जल्द ही विराम लग सकता है। बीते दिनों भाजपा के राष्ट्रीय सह-संगठन महामंत्री शिव प्रकाश रायपुर पहुंचे थे। उनके इस दौरे और सीमित मुलाकातों से बदलाव की अटकलें फिर तेज हो गई हैं। डॉ. रमन सिंह के निवास में शिव प्रकाश, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, अजय जामवाल, पवन साय और प्रदेश अध्यक्ष किरण देव की संगठन और सत्ता को लेकर चर्चा हुई। इसके बाद शिव प्रकाश और सीएम विष्णुदेव साय की अलग से भी गुफ्तगू हुई। संगठन में बदलाव को लेकर अजय जामवाल और पवन साय से भी काफी देर तक चर्चा हुई। डॉ रमन सिंह के निवास में जुटे इन तामाम दिग्गज नेताओं के बीच विचार-विमर्श के बाद यह माना जा रहा है कि भाजपा सत्ता और संगठन में बदलाव को मूर्त रुप देने जा रही है।
30 जुलाई है खास
30 जुलाई का दिन छत्तीसगढ़ कांग्रेस के लिए अहम माना जा रहा है। पीसीसी चीफ दीपक बैज को आलाकमान ने 30 जुलाई को दिल्ली बुलाया है। दिल्ली में प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट भी मौजूद रहेंगे। हालांकि इसके पहले 28 जुलाई को पायलट छत्तीसगढ़ आ रहे हैं, यहां कई नेताओं से राय मशवरा भी करेंगे तथा राज्य सरकार के खिलाफ आंदोलन तेज करने की कार्ययोजना भी बन सकती है। दरअसल कहा जा रहा है कि दिल्ली में बैठक के बाद नए पीसीसी चीफ पर मुहर लग सकती है। दीपक बैज प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष के रुप में तीन साल का कार्यकाल पूरा कर लिए हैं। ऐसे में आगे भी अध्यक्ष की कुर्सी के लिए दीपक बैज को मौका दिया जाएगा या फिर किसी और नेता को जवाबदारी दी जाएगी, इस पर फैसला होना है। वहीं बैज के दिल्ली बुलावे के बीच एक बार फिर कांग्रेस की राजनीति में जय और वीरु की जोड़ी दिखने लगी है। दरअसल पूर्व सीएम भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल के जन्म दिन के अवसर पर पूर्व उप-मुुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव बघेल के निवास पहुंचे जिसे वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य से भी जोड़ा जा रहा है। कहा जा रहा है कि एक बार फिर सिंहदेव और भूपेश कंधे से कंधा मिलाकर चलने को तैयार हैं। अब ऐसे में कांग्रेस आलाकमान क्या निर्णय लेता है? फिलहाल यह तो आने वाले दिनों में स्पष्ट हो जाएगा।
भूपेश और देवेन्द्र में फिर ठनी
एक ओर जब पूरा देश देख रहा है कि युवा शक्ति के आगे बड़ी-बड़ी राजनीतिक शक्तियों को नतमस्तक होना पड़ रहा है, तो भला इस दौर की राजनीति में युवाओं का साथ कौन नहीं चाहेगा? दरअसल यह बात हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि युवाओं के बीच राजनीतिक पकड़ मजबूत बनाने इन दिनों पूर्व सीएम भूपेश बघेल और भिलाई विधायक देवेन्द्र यादव आमने-सामने हैं। देवेन्द्र यादव प्रदेश युवक कांग्रेस के लिए बलौदाबाजार से शैलेन्द्र बंजारे को सर्मथन कर रहे हैं। तो वहीं भूपेश बघेल सत्येन्द्र चेलक को युवाओं की कमान सौंपना चाहते हैं। ऐसे में एक बार फिर देवेन्द्र यादव और भूपेश बघेल में ठन गई हैं। एक ओर जहां देवेन्द्र के करीबी शैलेन्द्र बंजारे नामांकन दाखिल कर चुके हैं तो वहीं दूसरी ओर भूपेश बघेल के करीबी सत्येन्द्र चेलक भी ताल ठोंक रहे हैं। ऐसे में युवाओं का साथ किसे मिलेगा? इसको लेकर इन दिनों काफी गहमा-गहमी देखने को मिल रही है।
‘अति’ के बाद ‘क्षति’
नीट पेपर लीक को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के बैनर तले विद्यार्थियों के धरना-प्रदर्शन और विपक्षी दलों के दबाव के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। दरअसल नीट विवाद को लेकर पुलिस प्रशासन की ‘अति’ देश को देखने को मिली। युवाओं द्वारा शांतिपूर्ण कर रहे प्रदर्शन को बर्बरता पूर्वक रौंदा गया। छात्र-छात्राओं पर आंशूगैस के गोले दागे गए, पैलेटगन से छात्रों को निशाना बनाया गया। जिसके कारण छात्रों के साथ-साथ देश के आम नागरिकों के भीतर भी आक्रोश पनपते दिखाई देने लगा। इसी के चलते देश के विभिन्न हिस्सों में आंदोलन की चिंगारी उठने लगी। नागरिकों के बीच पनप रहे इस आक्रोश को देखकर केंद्र सरकार ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेना ही उचित समझा। हालांकि युवाओं के आक्रोश को भांपते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं रात में छात्रों को संबोधित किया था। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी अपनी तीसरी मांग धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर अड़ी रही। बढ़ते दबाव के चलते आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। कुल मिलाकर इस आंदोलन में राजनीतिक, प्रशासनिक ‘अति’ के कारण भारतीय जनता पार्टी को बड़ी ‘क्षति’ होते दिख रही है।