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सरगुजा और बस्तर से मोह भंग? रायगढ़ पर फोकस
भाजपा के राष्टीय अध्यक्ष की कुर्सी संभालने के बाद नितिन नवीन 15 नवंबर को पहली बार छत्तीसगढ़ आने वाले हैं। इसके पहले प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी 11 नवंबर को छत्तीसगढ़ आ सकती हैं। लेकिन मंत्रियों को परेशान होने की जरुरत नहीं है। यह दौरा मंत्रिमंडल में बदलाव के लिए नहीं बल्कि कांग्रेस का किला ढ़हाने के लिए आयोजित किया जा रहा है। दरअसल इस साल जनजातीय गौरव दिवस का कार्यक्रम धरमजयगढ़ में आयोजित किया गया है। इस कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन शामिल हो सकते हैं। इस योजना का मकसद कांग्रेस के गढ़ में भाजपा को मजबूत करना है। क्योंकि रायगढ़ जिले की चार सीटों में से तीन में कांग्रेस का कब्जा है। धरमजयगढ, लैलुंगा और खरसिया में कांग्रेस के विधायक हैं। वहीं इस जिले की एकमात्र सीट रायगढ़ में भाजपा के विधायक ने जीत हासिल की थी। रायगढ़ विधायक ओपी चौधरी वर्तमान में मंत्री हैं। लेकिन पार्टी के आंतरिक सर्वे में ओपी चौधरी की स्थिति बहुत खराब बताई जा रही है। ऐसे में भाजपा ने रायगढ़ में फोकस करने की योजना बनाई है। रायगढ़ जिले में बड़े आयोजनों के माध्यम से भाजपा के पक्ष में महौल बनाने की कवायद अभी से शुरु कर दी गई है। खैर नितिन नवीन का यह दौरा राजनीतिक रुप से कितना लाभ देने वाला है, यह तो आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा। लेकिन जनजातीय गौरव दिवस का धमरजयगढ़ ़में यह आयोजन बता रहा है कि भाजपा अब सिर्फ सरगुजा और बस्तर के भरोसे चुनाव नहीं लड़ेगी बल्कि कांग्रेस के गढ़ों को भी ढ़हाने की कोशिश की जाएगी।
मंत्री का पीए लापता
एक मंत्री के पीए इन दिनों अघोषित रुप से लापता हैं। पिछले कुछ महीनों से पीए साहब को लेकर जमकर शोर-शराबा हो रहा है, उनके एक से एक कारनामे उजागर हो रहे हैं। जिसके कारण पीए साहब को अंडरग्राउंड होना पड़ा। दरअसल पीए साहब की वसूली की खबरें मीडिया में अटी पड़ी हुई हैं। पीए साहब इतने ताकतवर हैं कि एसीएस से लेकर विभागाध्यक्ष की भी उनके विभाग में नहीं चलती। हालांकि जब छूट उपर से मिली हो तो फिर एसीएस की क्या हैसीयत। कहते तो यह भी हंै कि पीए साहब ने एसीएस से बत्तमीजी भी की है, जिसकी मौखिक शिकायत की गई है। खैर सच क्या है? यह तो लापता पीए साहब ही जांनेगे। दूसरी ओर खबर यह भी है कि पीए साहब लापता होकर भी धन वसूली का काम कर रहे हैं। लापता की कहानी तो सिर्फ मीडिया और लोगों की ध्यान भटकाने की कोशिश मात्र है।
ओपी चौधरी की भद्द पिट गई
राज्य के स्थापना दिवस के अवसर पर केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह छत्तीसगढ़ पहुंचे थे। यहां धरातल में जमीन खोने के बाद, भाजपा नेताओं के पास अमित शाह के सामने नंबर बढ़ाने के अलावा कुछ खास बचा नहीं है। संभवत: यही कारण है कि यहां का हर एक नेता अमित शाह से चिपकना चाहता है, अपने आप को उनका खास बताना चाहता है। खैर कहते हैं कि बड़े लोगों के ज्यादा नजदीक रहना घातक होता है और दूर रहना भी। यहां एक तस्वीर ने इस लाइन पर मुहर लगा दी है। दरअसल वित्त मंत्री ओपी चौधरी और उनकी पीआर टीम उन्हें अमित शाह का सबसे करीबी नेता बताने में जुटी हुई है। राज्योत्सव के दौरान चौधरी को उनकी पीआर टीम ने बढ़-चढ़ प्रस्तुत भी किया। जनता के सामने अनेकों ऐसी तस्वीरें साझा की गई कि मानों ओपी चौधरी अमित शाह के इशारे के बिना एक कदम नहीं रखते। लेकिन असली तस्वीर आप खुद देख लीजिए, जो कुछ और ही बयां कर रही है। अमित शाह से नजदीकी तो दूर ओपी चौधरी को शाह के पास खड़े तक नहीं होने दिया जा रहा है। यह वीडियो पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने साझा किया है, जिसे ओपी चौधरी की पीआर टीम ने जनता को नहीं दिखाया। इस वीडियो में ओपी चौधरी को अमित शाह के आस-पास भटकने नहीं दिया जा रहा है। चौधरी अमित शाह के करीब जाने को आतुर दिख रहे हैं, लेकिन शाह के सुरक्षा अधिकारी ने ओपी को पकडकर दूर खड़ा कर दिया। अब ओपी शाह के कितने करीब हैं यह तो भूपेश बघेल और खुद ओपी चौधरी ही जानते हैं।
सुनील मिश्रा की संविदा बढ़ाई गई
रिटायर्ड आईएफएस सुनील मिश्रा बड़े ही काबिल अफसर हैं। संभवत: इसीलिए सरकार उन्हें रिटायरमेंट के बाद भी छोडऩा नहीं चाहती। दरअसल राज्य में पीसीसीएफ स्तर के अफसरों की कमी के कारण रिटायर्ड आईएफएस सुनील मिश्रा को सरकार ने एक साल की संविदा दी थी, जिसकी समयावधि समाप्त होने से पहले उनकी संविदा सेवा वृद्वि का प्रस्ताव एक बार फिर मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंच चुका है। वैसे भी सुनील मिश्रा को लैंड मैनेजमेन्ट का खासा अनुभव है, ऐसे में सरकार उन्हें किसी भी हाल में छोडना उचित नहीं समझ रही। संभव है जल्द ही सुनील मिश्रा की संविदा अवधि वृद्धि से संबंधित आदेश जारी कर दिए जाएं।
डीएमएफ में फिर बंदरबांट, जांच एजेंसियां खामोश क्यों?
कांग्रेस सरकार के दौरान डीएमएफ घोटाले में कई अफसर ईडी, सीबीआई और ईओडब्ल्यू की चंगुल में फंस चुके हैं। कई अभी भी राडार पर है, कुछ के खिलाफ और भी सबूत एजेंसियों को मिले हैं। लेकिन डीएमएफ में धांधली का मामला थमने का नाम नहीं ले रहा है। दरअसल कांग्रेस सरकार में हुए डीएमएफ घोटाले के बाद विष्णु सरकार के अधिकतर कलेक्टर डीएमएफ को लेकर बड़ी ही सावधानी बरत रहे थे। यह सिलसिला विष्णु सरकार के एक साल बीतने तक चला, कोई भी कलेक्टर डीएमएफ में हाथ नहीं डालना चाहता था। लेकिन एक साल बीतने के बाद फिर डीएमएफ की राशि में धांधली की खबरें सामने आने लगी हैं। अफसर फिर डीएमएफ की राशि में कमीशनखोरी पर लग गए हैं। शायद यही कारण है कि कहीं कलेक्टर ट्रांसफर आदेश जारी होने के बाद भी करोड़ों रुपये के चेक साइन करके निकल जाती हैं, तो कहीं भवन विहीन स्कूलों में भवन न बनाकर टीने के प्रार्थना शेड का निर्माण कराया जा रहा है। कहा जा रहा है कि टीना शेड का प्रकरण प्रदेशभर में उजागर हो रहा है। अब बूझने वाली बात यह है कि यह काम कौन से खास व्यक्ति के द्वारा कराया जा रहा है? क्या सभी जिलों में टीना शेड निर्माण के स्वरुप में समानता हैं? क्या निर्माण करने वाले कुछ चहेते लोग ही हैं? क्या ओवर इस्टीमेट करके करोड़ों की राशि डकारी जा रही है? आखिर इसका हिस्सा किस-किस को जा रहा है? आज नहीं तो कल डीएमएफ का यह कांड बड़ा धमाका करेगा।
काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती
रमन सरकार के तीसरे कार्यकाल में भाजपा के अंदर राजनीतिक अराजकता सिर चढ़कर बोलने लगी थी। जनता तो दूर भाजपा कार्यकताओं ने ही अपने नेताओं को हराने के लिए बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। वह दौर ऐसा था कि नेताओं-मंत्रियों के अंदर कूट-कूट कर भरे अहम को आम जनता बड़ी असानी से महसूस करने लगी थी। अहम इतना था कि 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के सारे वहम टूट गए। भाजपा मात्र 14 सीटों पर सिमट गई। यह छत्तीसगढ़ के इतिहास में भाजपा का सबसे कमजोर प्रदर्शन साबित हुआ। लेकिन अब कहा जा रहा है, 2028 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के पूरे विधायक एक इनोवा में सिमट जाएंगे। मतलब की ड्राइवर को छोड दें तो मात्र सात एमएलए। क्या वास्तव में ऐसा होने जा रहा है? या फिर कांग्रेस पार्टी के विधायक एक इनोवा की सवारी करेंगे फिलहाल इसके लिए अभी टाइम है। दरअसल भूपेश बघेल ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा था कि आने वाले चुनाव में भाजपा विधायक एक इनोवा में सिमट जांएगे। खैर यह तो वक्त बताएगा कि भूपेश की बात सच होती है? या फिर भाजपा की रणनीति काम आती है। क्योंकि धरातल पर दोनों ही पार्टियां जनता के मापदंड में खरी नहीं उतर रही हैं। रही बात बांटने की तो भूपेश बघेल ने राज्य के किसानों को धान की रिकार्ड कीमत दी, जिसके बदौलत भाजपा में कंपटीशन आया। डॉ. रमन सिंह 2 रुपये किलो चावल देकर चाऊर वाले बाबा बन गए। अब विष्णु सरकार महिलाओं को 1000 रुपये प्रतिमाह देकर महतारी वंदन कर रही है। लेकिन काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। क्योंकि छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और डॉ रमन सिंह की बांटने वाली सभी स्कीमें 2018 और 2023 के विधानसभा चुनाव में खारिज हो चुकी हैं। डॉ रमन सिंह को जनता न अब चाऊर वाले बाबा के रुप में याद करती है न ही भूपेश बघेल किसानों के मसीहा हैं। ऐसे में विष्णु सरकार की महिलाओं को 2000 रुपये प्रतिमाह देने की अगामी स्कीम कितना काम आयेगी? फिलहाल इस पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी।
सौरभ और आईपीएस अफसर
महादेव सट्टा एप का मास्टरमंाइड सीबीआई की हिरासत में है। सौरभ चंद्राकर से दिल्ली में सीबाीआई पूछताछ कर रही है। सौरभ क्या राज खोलता है इसकी सभी को प्रतीक्षा है। दरअसल महादेव सट्टा मामले में कई आईपीएस अफसरों और नेताओं के भी नाम सामने आये हैं। ऐसे में सौरभ चंद्राकर क्या राज खोलगा, इस पर कई नेताओं और अफसरों की किस्मत का फैसला इन आठ दिनों में होने वाला है। हालांकि सौरभ चंद्राकर के तेवर में काफी कांन्फीडेंस दिख रहा था। सोशल मीडिया में पुष्पा झुकेगा नहीं का दृष्य भी सौरभ ने जनता के माध्यम से उन लोगों तक पहुंचाया जो सौरभ चंन्द्राकर को झुकाना चाहते हैं। अब यह कौन लोग हैं जिन्हे गिरफतारी के वक्त सौरभ चंद्राकर संदेश दे रहा है, इसका खुलासा जल्द होने जा रहा है। वहीं इस मामले में नेताओं से पहले अफसरों पर गाज गिरने की संभावना है।
दीवाली से पहले कलेक्टरों की परेड

पहली बार ऐसा हो रहा है कि दीवाली से पहले राज्यपाल ने कलेक्टरों की परेड करा दी। दरअसल डीएमएफ की राशि के खर्च को लेकर राज्यपाल ने बीते दिनों बैठक ली। यह बैठक तब ली गई जब राज्योत्सव का माहौल था, हिन्दुओं की प्रमुख त्योहार दीवाली को तीन दिन शेष बचे हुए हैं। आखिर राज्यपाल ने इतनी तत्परता क्यों दिखाई? जो राज्योत्सव और दिवाली के बीच ही कलेक्टरों को परेड करानी पड़ी। हालांकि इसके पहले भी राज्यपाल माइनिंग विभाग की समीक्षा कर चुके हैं। यह बात अलग है कि माइनिंग विभाग के भारसाधक मंत्री स्वयं मुख्यमंत्री हैं। खैर कारण जो भी हो लेकिन इस परेड की जमकर चर्चा है। और यह सवाल भी है कि आखिर जिला कलेक्टर प्राथमिकता वाली जगहों पर डीएमएफ की राशि क्यों खर्च नहीं कर रहे हैं? आखिर क्या कारण है कि राज्यपाल को सही जगह अथवा प्राथमिकता वाली जगहों पर डीएमएफ की राशि खर्च करने की बात कहनी पड़ रही है। क्या वास्तव में डीएमएफ की राशि में कलेक्टरों ने फिर मनमानी शुरु कर दी है?
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