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अफ़सरशाही का दर्द, कराह रहे भाजपा विधायक और कार्यकर्ता
भाजपा और कांग्रेस के शासन चलाने में फर्क साफ दिखता है। भाजपा के शासनकाल में अफ़सरशाही सर चढ़कर बोलती है । तो वहीं कांग्रेस सरकार में एक छोटा कार्यकर्ता भी अफ़सरों पर भारी पड़ता है। इस सरकार में आलम यह है कि कार्यकर्ता तो दूर अब भाजपा विधायक भी अफसरशाही के दर्द से कराहते नजऱ आ रहे हैं । वैसे तो एक विधायक का प्रोटोकॉल मुख्य सचिव से उपर होता है, लेकिन उन्हें एसडीएम, तहसीलदार तक तवज्जो ना दे, तो इसे अफसरशाही का दर्द ही कहा जाएगा। ऐसे में राजनेताओं की क़द्र भला क्यों होगी? जनप्रतिनिधि होने का दायित्व वह भला कैसे निभायेंगे? जनता लाचार और बेवस जनप्रतिनिधियों के पास क्यों जाएगी?
दरअसल सामरी विधायक उद्धेश्वरी पैकरा का एक वीडियो सामने आया है जिसमें राजपुर एसडीएम को लेकर नाराज विधायक ने सीधे कलेक्टर राजेंद्र कुमार कटारा को फोन पर 24 घंटे का अल्टीमेटम दे दिया, अगर एसडीएम नहीं हटे तो कार्यकर्ताओं के साथ धरना प्रदर्शन करेंगी। फिलहाल 24 घंटे बीत चुके हैं, विधायक एसडीएम को हटवा पाईं कि नहीं इस पर कुछ नहीं कहना। सीसी सड़क और नाली निर्माण के भूमिपूजन के लिए विधायक उद्धेश्वरी पैकरा पहुंची थीं। कार्यक्रम में शामिल होने के लिए एसडीएम देवेंद्र प्रधान और तहसीलदार कावेरी मुखर्जी को भी सूचना दी गई थी, लेकिन एसडीएम कार्यक्रम में नहीं पहुंचे। बताया गया कि एसडीएम फ़ील्ड में हैं, लेकिन जब विधायक ने पास स्थित तहसील कार्यालय का रुख किया तो वहां एसडीएम और तहसीलदार मौजूद मिले। यहीं से विवाद ने तूल पकड़ लिया। विधायक ने कार्यक्रम में अनुपस्थिति पर नाराजगी जताई, जिस पर एसडीएम ने कथित तौर पर कहा कि कार्यक्रम में आना या न आना उनकी मर्जी है। इसके बाद दोनों के बीच तीखी बहस हो गई। विवाद के तुरंत बाद विधायक ने कलेक्टर राजेंद्र कुमार कटारा को फोन कर पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी और साफ कहा कि 24 घंटे के भीतर एसडीएम का ट्रांसफर किया जाए, अन्यथा वे कार्यकर्ताओं के साथ दरी बिछाकर धरने पर बैठेंगी। करवाई क्या हुई, यह तो सरकार को तय करना है। लेकिन इस तरह हावी अफ़सरशाही कतई हितकर नहीं।
अनिल अग्रवाल पर अपराध दर्ज करने के मायने क्या?
छत्तीसगढ़ में निजी क्षेत्र के सबसे बड़े कारोबारी वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल के ऊपर छत्तीसगढ़ पुलिस ने अपराध दर्ज किया है। दरअसल सक्ति जिले में संचालित वेदांता ग्रुप के प्लांट में वायलर में हुए विस्फोट से तकऱीबन दो दर्जन अधिक लोगो की मौत हो गई। निश्चित ही घटना बेहद ही संवेदनशील और दुखद है । लेकिन अब तक ऐसे मामलों में मालिकों पर एफ़आईआर दर्ज नहीं किए जाते थे। यह पहली दफा है जब किसी कंपनी के मालिक पर अपराध दर्ज किया गया है। हालाँकि पुलिस ने अभी तक एफ़आईआर की कॉपी पब्लिक डोमेन में नहीं डाली है। पर यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि बिना ऊपर की सहमति के अनिल अग्रवाल पर एफआईआर दर्ज नहीं हो सकता। हालाँकि कुछ लोगों का मानना है कि अनिल अग्रवाल पर लगाम कसने की यह रणनीति है। दरअसल एक बड़े मामले में वेंदांता ग्रुप के चेयरमैन अग्रवाल ने हाल ही में कोर्ट का दरवाज़ा ख़टखटाया है। जिसके बाद से वह रडार पर हैं। बहरहाल सच क्या है? यह तो जांच का विषय है। क्योंकि हादसों के यहाँ अनेकों उदाहरण हैं जिसमें किसी कंपनी के मालिक पर एफआईआर दर्ज नहीं की गई है, प्रबंधन और संबंधित के ऊपर ही कार्रवाई की जाती रही है। उद्योगपति नवीन जिंदल समेत कुछ संगठनों ने इस कार्रवाई का विरोध किया है। आम तौर पर अनिल अग्रवाल की इमेज एक अच्छे उद्योगपति की रही है। लेकिन सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने ही अग्रवाल पर नकेल क्यों कसना उचित समझा फिलहाल इस पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी।
सुशासन वाली विष्णु सरकार किसी मामले में भूपेश और रमन से कम नहीं
विपक्षी दल के नेता अक्सर यह कहते नजऱ आते है कि आखिर यह सरकार चला कौन रहा है, हालाँकि सरकार कौन चलाता है विपक्ष के नेता यह भली भाँति जानते है। विपक्ष यह भी जानता है कि इस समय सरकार चलाने वाले लोग रणनीतिक मामलों में उनसे कहीं आगे हैं। दरअसल डॉ रमन सिंह की सरकार में सीएम के अहम विभाग जनसंपर्क विभाग में चुनावी वर्ष के ठीक दो साल पहले काबिल आईएएस अफ़सर राजेश सुकुमार टोप्पो की तैनाती की गई। राजेश टोप्पो एक रिज़ल्ट ओरियेनटेड अफसर के रूप में जाने जाते हैं । तो वहीं पूर्व सीएम भूपेश बघेल को आईएएस अफसरों पर ऐतवार न रहा। भूपेश बघेल ने चुनाव के ठीक दो साल पहले जनसंपर्क आयुक्त की जि़म्मेदारी आईपीएस दीपांशु काबरा को सौंपी। अब सीएम विष्णुदेव साय के रणनीतिकार भूपेश और रमन के रणनीतिकारों से दस कदम आगे निकलते दिख रहे हैं। यहां पर टू इन वन पर विचार किया गया और रजत पर मुहर लगा दी गई। मतलब ऐसे अफसर की तैनाती जनसंपर्क में की गई है जो पहले आईपीएस बने फिर बाद में आईएएस अफसर बनकर सेवाएं दे रहे हैं। यहां भी विधानसभा चुनाव के ठीक दो साल पहले यह प्रभावी रास्ता निकाला गया है । दरअसल वर्तमान जनसंपर्क आयुक्त रजत बंसल का आईएएस से पहले आईपीएस में सेलेक्शन हो चुका था उन्हें बंगाल कैडर आलाट हुआ था, उसके बाद रजत बंसल का सेलेक्शन आईएएस में हुआ। कुल मिलाकर रजत टू इन वन अफ़सर है! मतलब उनके अन्दर आईपीएस अफसर के भी गुण हैं और आईएएस अफसर तो वह हैं ही। संभवत: इसीलिए इन दिनों जनसंपर्क विभाग में आईपीएस की भाँति सख़्ती और आईएएस की भाँति दिमाग़ का प्रयोग किया जा रहा है। अब तो विपक्ष को पता होना चाहिए की सरकार जो भी चला रहा है, रणनीति के मामले में रमन सरकार और भूपेश सरकार से कहीं आगे हैं।
डीएसपी ने बॉस पर लगाया प्रताड़ना का आरोप
सूबे का पुलिस महकमा इन दिनों लगातार चर्चा का केंद्र बना हुआ है। निलंबित आईपीएस अफ़सर रतनलाल डांगी का मामला ठंडा नहीं हुआ था कि अब एक और डीएसपी ने अपने बॉस पर प्रताड़ना का आरोप लगाया है। हालाँकि आरोप डांगी से बिल्कुल जुदा है। प्रताडऩा का मामला इतना बढ़ गया कि डीएसपी एक माह की छुट्टी में चल दी हैं। ख़ैर अभी तक इसकी कोई आधिकारिक खबर बाहर नहीं आई है, न ही लिखित शिकायत उजागर हुई है। लेकिन कहते हैं कि महिला डीएसपी ने आईजी से शिकायत की है। कहा जा रहा है कि डीएएसपी ने आरोप लगाया है कि बैठक के दौरान उनके साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया जाता, उनके लिए कप्तान अपशब्दों का प्रयोग करते हैं, नीचा दिखाते हैं। ख़ैर सच क्या है, यह तो जाँच का विषय है । कहा तो यह भी जा रहा है कि आईजी साहब ने कप्तान साहब को चेतावनी भी दी है। फि़लहाल डीएसपी मैडम के छुट्टी में जाने के बाद मामला ठंडा होते दिख रहा है। शिकायत के बाद मामले को इंटरनल रूप से सुलझाने का प्रयास जारी है।
महिलाओ के साथ दोहरा चरित्र क्यों?
भारतीय जनता पार्टी एकमात्र ऐसी पार्टी है जो देश की महिलाओं को उनका वास्तविक हक़ देने का लगातार प्रयास कर रही है। हाल ही में केंद्र की भाजपा सरकार ने महिलाओं के विशेष आरक्षण के लिए विधेयक भी लाया, ख़ैर इस विधेयक पर मुहर नहीं लग पाई। इस बीच बंगाल में विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने महिलाओं को 3000 रुपये प्रतिमाह देने का वादा किया है। वहीं भाजपा शासित राज्य महाराष्ट्र में महिलाओं को 1500 रुपये प्रतिमाह दिया जा रहा है। पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश में महिलाओं को 1200 रुपये दिया जा रहा है। लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य की महिलाओं को मात्र 1000 रुपये प्रतिमाह दिया जा रहा है, मतलब इन तमाम राज्यों से कम राशि। देश की महिलाओं के लिए अलग-अलग मापदंड क्यों निर्धारित किए गये हैं, फिलहाल इस पर कुछ कहना उचित नहीं है। छत्तीसगढ़ की महिलाओं को न्यूनतम दायरे पर क्यों रखा गया है, इस पर भी कोई सवाल नहीं उठा रहा। सवाल उठे या ना उठे लेकिन अब अंदरखाने में चर्चा होने लगी है कि आखिऱ यहां इतनी कम राशि क्यों, बंगाल चुनाव में भाजपा के द्वारा महिलाओं को 3000 रुपये प्रतिमाह देने का वादा सुनकर छत्तीसगढ़ में भी इसकी चिंगारी उठते दिख रही है। ख़ैर यह तो चुनावी दाँव है जहां जितना कंपटीशन वहाँ उतना दाम।
मंत्री का गिरता ग्राफ, रणनीतिकारों की प्लानिंग फेल
कुछ रणनीतिकारों ने सूबे के एक मंत्री को मुख्यमंत्री पद का सपना दिखाया। और शांति से काम करने का रोड मैप तैयार किया, विवादों से दूर रहने की सलाह दी गई। भ्रष्टाचार से भी परहेज़ करने की सलाह थी। मंत्री जी ने दो साल तक सलाहकारों की सलाह पर अमल किया। ‘सोबर’ मंत्री का तबका हासिल किया। उन्हीं के विभाग के अफ़सर यह कहते नहीं थकते थे कि मंत्री जी को बहुत जादा एक्सपेक्टेशन नहीं है। लेकिन दो साल से अधिक का समय बीत गयाए ना रणनीतिकारों की रणनीति धरातल पर दिखी न ही मुख्यमंत्री बनने का सपना पूरा होते दिख रहा। समय के साथ अब एक्सपेक्टेशन के चर्चे भी दूर – दूर तक हो रहे। राजनीतिक ग्राफ़ भी तेज़ी से गिरता दिख रहा। शायद मंत्री जी भी यह मान बैठे थे कि एक बेहद सहज और सरल नेता कैसे अपने पाँच साल के मुख्यमंत्री कार्यकाल को पूरा कर पाएगा। अगर गलती से
फ़ुलटॉस बॉल डाली जाएगी तो बड़ा शॉट खेला जाएगा। पर अब मंसूबे में पानी फिरते दिख रहा है। सलाहकारों की सलाह पर भी अमल नहीं दिख रहा, उनके विभागों में भ्रष्टाचार पर दो साल तक जितनी खामोशी थी अब उतना ही शोर-शराबा है। कहा तो यह भी जा रहा है कि सीएम भी अब उनके निर्णय पर रुचि नहीं लेते। बहरहाल राजनीति में कब किसकी कि़स्मत चमक जाये कुछ कहा नहीं जा सकता।