खूंखार माओवादी से विश्वविद्यालय अधिकारी तक का सफर, अब ग्रामसभाओं को सशक्त बना रहे मल्लोजुला वेणुगोपाल

गढ़चिरौली। कभी दंडकारण्य के जंगलों में माओवादी गतिविधियों की कमान संभालने वाले मल्लोजुला वेणुगोपाल, जिन्हें सोनू या भूपति के नाम से भी जाना जाता था, अब एक नई पहचान के साथ समाज की मुख्यधारा में काम कर रहे हैं। कभी 6 करोड़ रुपये के इनामी रहे वेणुगोपाल आज गोंडवाना विश्वविद्यालय में एकल (ग्रामसभा) केंद्र के समन्वयक के रूप में आदिवासी समुदायों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक और सशक्त बनाने में जुटे हैं।

15 अक्टूबर 2025 को उन्होंने अपने 60 सशस्त्र साथियों के साथ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के समक्ष आत्मसमर्पण किया था। दशकों तक भूमिगत रहकर सशस्त्र संघर्ष से जुड़े रहे वेणुगोपाल के जीवन में यह एक बड़ा बदलाव था। अब विश्वविद्यालय परिसर में उनका काम फाइलों, लैपटॉप और सरकारी योजनाओं के माध्यम से ग्रामीणों तक अधिकारों की जानकारी पहुंचाना है। उनकी सुरक्षा के लिए केबिन के बाहर गढ़चिरौली पुलिस के दो जवान तैनात रहते हैं।

खुली भर्ती प्रक्रिया से मिली नई जिम्मेदारी

वेणुगोपाल की विश्वविद्यालय में नियुक्ति किसी विशेष रियायत के तहत नहीं, बल्कि खुली भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से हुई। मई महीने में अखबार में प्रकाशित विज्ञापन के जरिए उन्हें इस पद की जानकारी मिली। पद के लिए न्यूनतम 12वीं पास होने के साथ पेसा कानून, वन अधिकार अधिनियम (FRA), मनरेगा और जैव विविधता कानून की जानकारी तथा दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में काम करने का अनुभव आवश्यक था।

दशकों तक आदिवासी क्षेत्रों में रहने और वहां की परिस्थितियों को करीब से समझने के कारण वेणुगोपाल इन योग्यताओं पर खरे उतरे। इसके बाद उन्हें एकल (ग्रामसभा) केंद्र का समन्वयक नियुक्त किया गया। अब वे कानूनी प्रावधानों और सरकारी योजनाओं के माध्यम से ग्रामसभाओं को मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।

जिन कानूनों का किया विरोध, अब उन्हीं से दिला रहे अधिकार

वेणुगोपाल के जीवन का यह बदलाव एक महत्वपूर्ण विरोधाभास भी सामने लाता है। जिन संवैधानिक और कानूनी व्यवस्थाओं को कभी माओवादी संगठन अधूरा बताकर विरोध करते थे, आज वेणुगोपाल उन्हीं कानूनों के जरिए आदिवासियों के अधिकारों को आगे बढ़ाने में जुटे हैं।

वे पेसा कानून और वन अधिकार अधिनियम जैसे प्रावधानों के महत्व को स्वीकार करते हुए मानते हैं कि इन जनहितकारी कानूनों का विरोध करना संगठन की ऐतिहासिक चूक थी। उनके अनुसार, यदि जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों के अधिकारों को समय रहते इन कानूनी व्यवस्थाओं के माध्यम से आगे बढ़ाया जाता, तो लोगों को पहले ही बड़ा लाभ मिल सकता था।

नियुक्ति पर उठे सवाल, अतीत को लेकर विवाद बरकरार

हालांकि, वेणुगोपाल की नई भूमिका को लेकर समाज में मतभेद भी हैं। जन संघर्ष समिति के दत्ता शिर्के जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पुनर्वास के तहत उन्हें उच्च पद दिए जाने पर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि माओवादी हिंसा में जान गंवाने वाले निर्दोष आदिवासियों और पुलिसकर्मियों की शहादत को देखते हुए ऐसी नियुक्तियों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

दूसरी ओर, वेणुगोपाल चाहते हैं कि उनके अतीत के साथ-साथ उनके वर्तमान काम और प्रतिबद्धता को भी देखा जाए। उनका आत्मसमर्पण और उसके बाद की भूमिका उनके जीवन में आए बड़े परिवर्तन को दर्शाती है।

कभी हथियारों के जरिए व्यवस्था बदलने की राह पर चले वेणुगोपाल अब कानून, शिक्षा और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से आदिवासी समुदायों को सशक्त बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उनका सफर पुनर्वास, सामाजिक स्वीकार्यता और हिंसा से मुख्यधारा की ओर लौटने की चुनौतियों पर एक नई बहस को भी जन्म देता है।

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