मणिपुर HC के पूर्व CJ पर व्यावसायिक संबंधों का आरोप, LPG एजेंसी रद्द होने से बढ़ा विवाद

नई दिल्ली |  मणिपुर हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस (सेवानिवृत्त) सिद्धार्थ मृदुल से जुड़ा एक विवाद सामने आया है। आरोप है कि न्यायिक पद पर रहते हुए उनका नाम एक LPG डिस्ट्रीब्यूशन एजेंसी से जुड़ा रहा। मामले के सामने आने के बाद भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (BPCL) ने संबंधित डीलरशिप रद्द कर दी है।

आरोपों के अनुसार, सिद्धार्थ मृदुल अपने करीब 16 साल के न्यायिक कार्यकाल के दौरान ‘किचन फ्लेम’ नाम की LPG डिस्ट्रीब्यूटर्शिप से जुड़े रहे। शिकायत मिलने के बाद BPCL ने मामले की जांच की और कारण बताओ नोटिस जारी किया था।

संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर रद्द हुई डीलरशिप

BPCL के अनुसार, संवैधानिक पद पर रहते हुए किसी न्यायाधीश का किसी व्यावसायिक गतिविधि से जुड़ा होना न्यायिक आचार मानकों के अनुरूप नहीं है। कंपनी ने बताया कि नोटिस के जवाब से संतुष्ट नहीं होने के बाद 6 जुलाई को डीलरशिप रद्द करने का फैसला लिया गया।

शिकायत के बाद शुरू हुई जांच

बताया जा रहा है कि यह मामला एजेंसी के पूर्व मैनेजर की पत्नी मोनिका यादव की ओर से उठाए गए मालिकाना अधिकार विवाद के बाद सामने आया। इसके बाद BPCL को शिकायत मिली और कंपनी ने इस मामले की जांच शुरू की।

न्यायिक आचार संहिता में व्यापार से दूरी का प्रावधान

रीस्टेटमेंट ऑफ वैल्यूज ऑफ ज्यूडिशियल लाइफ’ यानी न्यायिक जीवन के मूल्यों के पुनर्कथन के तहत न्यायाधीशों से अपेक्षा की जाती है कि वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी व्यापारिक गतिविधि में शामिल न हों।

न्यायिक आचार नियमों के अनुसार, संवैधानिक अदालतों के न्यायाधीशों को सरकार, निजी कंपनियों या अन्य संस्थाओं के साथ ऐसे आर्थिक संबंधों से बचना होता है, जिससे पद की निष्पक्षता पर सवाल उठे।

आचार उल्लंघन पर हो सकती है कार्रवाई

जानकारी के मुताबिक, यदि कोई न्यायाधीश न्यायिक आचार संहिता का उल्लंघन करता है तो मामले की जांच की जा सकती है। हालांकि, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के मामले में कार्रवाई की प्रकृति सीमित होती है और चेतावनी या सलाह जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।

फिलहाल BPCL की कार्रवाई के बाद यह मामला न्यायिक आचरण और संवैधानिक पदों की गरिमा को लेकर चर्चा में है।

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