बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि “नो वर्क, नो पे” का सिद्धांत हर परिस्थिति में स्वतः लागू नहीं होता, खासकर तब जब कर्मचारी की पदोन्नति विभागीय लापरवाही या प्रशासनिक निष्क्रियता के कारण रुकी हो।
यह निर्णय सेवानिवृत्त सहायक आयुक्त जी. आर. साहू द्वारा दायर याचिका पर सुनाया गया। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि वे वरिष्ठ होने के बावजूद उन्हें डिप्टी कमिश्नर पद पर समय पर पदोन्नति नहीं दी गई, जबकि उनके जूनियर अधिकारियों को वर्ष 2011 में ही प्रमोशन मिल चुका था।
मामले की सुनवाई में सामने आया कि विभागीय समीक्षा पदोन्नति समिति (DPC) ने याचिकाकर्ता को पदोन्नति के लिए उपयुक्त मानते हुए उनके जूनियर्स से ऊपर रखने की अनुशंसा की थी, लेकिन इसके बावजूद विभाग ने लंबे समय तक कार्रवाई नहीं की।
राज्य सरकार की ओर से “नो वर्क, नो पे” का तर्क दिया गया, जबकि याचिकाकर्ता का कहना था कि विभागीय गलती के कारण उन्हें पदोन्नत पद पर कार्य करने का अवसर ही नहीं मिला।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की पीठ में हुई। अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता स्वयं जिम्मेदार नहीं थे और विभागीय निष्क्रियता के कारण उन्हें पदोन्नति से वंचित रखा गया।
हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि चूंकि उन्होंने वास्तविक रूप से डिप्टी कमिश्नर के पद पर कार्य नहीं किया, इसलिए उन्हें पूरा वेतन नहीं दिया जा सकता। संतुलन बनाते हुए अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि 13 जुलाई 2011 से 31 दिसंबर 2016 तक डिप्टी कमिश्नर और सहायक आयुक्त के वेतन अंतर का 50 प्रतिशत एरियर्स चार महीने के भीतर भुगतान किया जाए। भुगतान में देरी होने पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जहां कर्मचारियों को विभागीय देरी के कारण पदोन्नति का लाभ समय पर नहीं मिल पाता।