अबूझमाड़ की पारंपरिक स्वास्थ्य-भोजन परंपरा की दुनियाभर में बढ़ी पहचान, विदेशों से शोध के लिए पहुंच रहे विशेषज्ञ

रायपुर । छत्तीसगढ़ की समृद्ध पारंपरिक स्वास्थ्य परंपरा और वनौषधीय ज्ञान को संरक्षित करने के लिए राज्य सरकार के प्रयासों के बीच अबूझमाड़ की पारंपरिक स्वास्थ्य एवं भोजन परंपरा ने देश-विदेश के शोधकर्ताओं का ध्यान आकर्षित किया है। विदेशों से भी शोधकर्ता अबूझमाड़ की पारंपरिक ज्ञान परंपरा और जीवनशैली से जुड़े पहलुओं पर अध्ययन के लिए पहुंच रहे हैं।

पारंपरिक स्वास्थ्य ज्ञान और वनौषधियों के संरक्षण को लेकर छत्तीसगढ़ आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड द्वारा लगातार कार्य किया जा रहा है। इसी क्रम में 14 अगस्त को नारायणपुर वनमंडल कार्यालय सभागार में जिला स्तरीय वैद्य सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में पारंपरिक उपचार पद्धतियों के संरक्षण, वैद्यों के प्रमाणीकरण और वनौषधियों के संवर्धन पर विशेष जोर दिया गया।

बोर्ड के अध्यक्ष विकास मरकाम ने दीप प्रज्ज्वलित कर सम्मेलन का शुभारंभ किया। इस दौरान वैद्य रतन रंजन धर, कज्जाराम गोटा, रूपसिंह, सुखदेव, सोमनाथ, फूलसिंह, अमृतलाल और हरिचंद सहित अन्य वैद्यों ने पारंपरिक जड़ी-बूटियों और उपचार पद्धतियों से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। वैद्यों ने नारायणपुर में वनौषधियों के संरक्षण और लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लिए हर्बल गार्डन विकसित करने की मांग रखी।

वैद्यों को मिल रहा आर्थिक और तकनीकी सहयोग

बोर्ड के कंसल्टेंट अमित गुप्ता ने वैद्यों के लिए संचालित योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि आर्थिक रूप से कमजोर वैद्य समूहों को जड़ी-बूटियों को उच्च गुणवत्ता के साथ पीसने के लिए निःशुल्क पल्वराइजर मशीन उपलब्ध कराई जा रही है। वहीं हीलर हर्बल गार्डन योजना के तहत वैद्यों को अपनी बाड़ी में उपयोगी वनौषधियों का उद्यान विकसित करने के लिए आर्थिक एवं तकनीकी सहायता दी जाती है।

वैद्यों के गांवों में संचालित स्कूलों में स्कूल हर्बल गार्डन विकसित करने और उसके रखरखाव के लिए भी सहयोग दिया जा रहा है। पारंपरिक उपचार पद्धतियों के प्रमाणीकरण की प्रक्रिया भी संचालित की जा रही है, जिससे स्थानीय चिकित्सा ज्ञान को व्यवस्थित रूप से संरक्षित और प्रमाणित किया जा सके।

3 हजार हेक्टेयर में वनौषधियों का रोपण

नारायणपुर वनमंडल के वनमंडल अधिकारी वेंकटेश एम.जी. ने बताया कि वनौषधियों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए लगभग 3 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में रोपण किया जा रहा है। साथ ही वनौषधियों की रिपॉजिटरी तैयार करने और वैद्यों के पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण करने की दिशा में भी काम किया जाएगा। वैद्यों की मांग पर नारायणपुर में हर्बल गार्डन विकसित करने का आश्वासन भी दिया गया।

दुर्लभ वनौषधियों के संरक्षण पर जोर

बोर्ड अध्यक्ष विकास मरकाम ने कहा कि नारायणपुर क्षेत्र में कई दुर्लभ वनौषधियां पाई जाती हैं। रसना जड़ी छोटे डोंगर और बेनूर क्षेत्र के जंगलों में उपलब्ध है, जबकि लगभग विलुप्तप्राय दहीमन भी यहां पाया जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसी दुर्लभ वनौषधियों का संरक्षण सरकार और स्थानीय वैद्यों की साझा जिम्मेदारी है। बोर्ड द्वारा विलुप्तप्राय 50 दुर्लभ वनौषधियों की पहचान कर उनके संरक्षण एवं संवर्धन का कार्य किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि अबूझमाड़ की पारंपरिक स्वास्थ्य और भोजन परंपरा पर विदेशों से शोधकर्ताओं का आना छत्तीसगढ़ की समृद्ध पारंपरिक ज्ञान विरासत की वैश्विक पहचान को दर्शाता है। इस ज्ञान और वनौषधीय विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने में स्थानीय वैद्यों की भूमिका महत्वपूर्ण है।

वैद्यों की समस्याएं सुनीं

सम्मेलन के दौरान विकास मरकाम ने वैद्यों से सीधे संवाद कर उनकी समस्याएं सुनीं और स्थानीय स्तर पर छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान के लिए वनमंडल अधिकारी को आवश्यक निर्देश दिए। कार्यक्रम के अंत में सम्मेलन में शामिल वैद्यों को सहभागिता प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए।

सम्मेलन में नारायणपुर जिले के 25 वैद्यों सहित करीब 60 से 70 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इस अवसर पर उपवनमंडल अधिकारी हीरे सिंह उइके, प्रीति यादव, राजेश कश्यप, परिक्षेत्र अधिकारी इंद्र कुमार यादव, भोगनाथ नायक, वर्षा कश्यप, भूषण सिंह ठाकुर सहित नारायणपुर वनमंडल एवं बोर्ड के अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित रहे।

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