नई दिल्ली । पुलिस हिरासत में हुई मौतों को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने अहम और सख्त टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि हिरासत में किसी व्यक्ति की अप्राकृतिक मृत्यु, चाहे वह आत्महत्या ही क्यों न हो, केवल निजी घटना नहीं मानी जा सकती।
अदालत ने कहा कि हिरासत में रखे गए व्यक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है और ऐसे मामलों में सरकार अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकती।
मामला वर्ष 2018 में करावल नगर थाने में हिरासत के दौरान हुई एक युवक दीपक की मौत से जुड़ा है। याचिका में मृतक के पिता श्याम सुंदर ने आरोप लगाया था कि पुलिस ने हिरासत के दौरान मारपीट की और कथित रूप से रिश्वत की मांग भी की गई थी।
सुनवाई के बाद अदालत ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह आठ सप्ताह के भीतर मृतक के पिता को ₹18.44 लाख रुपये मुआवजा प्रदान करे। मुआवजे की गणना मृतक की अनुमानित आय, भविष्य की संभावित आय, अंतिम संस्कार खर्च और अन्य मदों को जोड़कर की गई।
अदालत ने अपने फैसले में दोहराया कि पुलिस हिरासत में किसी भी व्यक्ति की सुरक्षा और जीवन की जिम्मेदारी पूरी तरह राज्य पर होती है, और इस तरह की घटनाओं में जवाबदेही तय होना आवश्यक है।