हलचल… लाचार और लचर सिस्टम

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फ़ॉर्च्यूनर से आधी कीमत का वाहन यूज करेंगे सीएम साय

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय अपनी सादगी के लिए जाने जाते हैं। सरल और सहज व्यक्तित्व ही उनका प्रमुख आभूषण माना जाता है। इसी क्रम में अब उनके काफिले में फ़ॉर्च्यूनर की जगह ब्लैक स्कॉर्पियो एन दिखाई देगी। दरअसल पूर्व सीएम भूपेश बघेल के कार्यकाल में खरीदी गई फ़ॉर्च्यूनर अब पुरानी होने लगी हैं। जिसके चलते मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के कारकेड में स्कॉर्पियो एन को शामिल किया गया है। सीएम विष्णुदेव साय के कारकेड में अब 6 नई बुलेट प्रूफ स्कॉर्पियो एन दिखने लगी है। स्कॉर्पियो एन की कीमत फ़ॉर्च्यूनर की कीमत से आधी बताई जा रही है। हालांकि यह वाहन पूर्ण रुप से बुलेट प्रूफ है। माना जा रहा है कि सीएम विष्णुदेव साय इन वाहनों के साथ जनता के बीच अपनी सादगी की छाप छोडऩे जा रहे हैं। दरअसल इन दिनों छत्तीसगढ़ के ज्यादातर मंत्री और विधायक फ़ॉर्च्यूनर की सवारी कर रहे हैं, फ़ॉर्च्यूनर की कीमत स्कॉर्पियो से डबल है। ऐसे में यदि मुख्यमंत्री स्कॉर्पियो में नजर आयेंगे तो मंत्री और विधायकों के वाहनों में भी देर-सबेर बदलाव देखने को मिल सकता है। साथ ही ज्यादातर अफसर इन दिनों इनोवा क्रिस्टा की सवारी कर रहे है, उन्हें भी मुख्यमंत्री की सादगी से कुछ सीख तो लेना ही पड़ेगा।

एल्मा ने निरंजन और त्रिपाठी को पीछे छोड़ा

छत्तीसगढ़ राज्य में अधिक राजस्व प्राप्ति करने वाले विभागों में आबकारी विभाग का नाम प्रमुख रुप से शामिल है। यहां आबकारी विभाग को कमाऊ पूत भी कहा जाता है। संभवत: इसीलिए इस विभाग की कमान ऊर्जावान नेताओं और अफसरों को दी जाती है। पूर्व की भूपेश बघेल सरकार में कवासी लखमा उर्फ दादी इस विभाग के मंत्री रहे। वहीं राज्य के सबसे काबिल अफसर आईएएस निरंजन दास को आबकारी विभाग का आयुक्त बनाया गया था। इसके साथ ही टेलीफोन सेवा से एपी त्रिपाठी को एमडी बनाया गया था। आईएएस निरंजन दास इतने काबिल अफसर थे कि रिटायरमेंट के बाद भी उन्हें तत्कालीन सरकार ने संविदा नियुक्ति देकर पुन: आबकारी विभाग का प्रभार दे दिया था। खैर निरंजनदास और एपी त्रिपाठी के राजस्व प्राप्ति के आकड़े हजम नहीं हो पाए और वह सलाखों के पीछे पहुंच गए, संग मंत्री लखमा को भी ले गए। समय बीता अब इस विभाग की कमान मंत्री लखनलाल देवांगन को दी गई है, वह भी एक ऊर्जावान नेता के रुप में जाने जाते हैं। राजनीति का लंबा अनुभव भी उनके पास है। इसके साथ ही इस कार्यकाल में आईएएस पीएस एल्मा को सीएसबीसीएल और सीएसएमसीएल का एमडी बनाया गया है। एल्मा पूर्व आयुक्त निरंजनदास और एपी त्रिपाठी से अधिक रिजल्ट देने वाले अफसर बन गए हैं। उन्होंने राजस्व प्राप्ति के पूर्व के सभी आकड़ों को ध्वस्त कर दिया है। वर्तमान मंत्री लखनलाल देवांगन पूर्व मंत्री कवासी लखमा की भांति राजस्व प्राप्ति के रिकार्ड से काफी उत्साहित हैं।

लाचार और लचर सिस्टम

कहते हैं कि जब विभाग में पकड़ कमजोर हो जाती है, तो वहां अराजकता का माहौल दिखने लगता है। स्कूल शिक्षा विभाग में इन दिनों अराजकता शीशे की भांति एकदम साफ दिखाई दे रही है। प्राइवेट स्कूल एसोसिऐशन ने गरीब बच्चों के स्कूल प्रवेश में असहयोग करने का खुला ऐलान किया है। संगठन के द्वारा शासन के नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाने की बात मीडिया के मंच से कही गई है। लेकिन स्कूल शिक्षा मंत्री और अफसरों ने अब तक गरीब बच्चों के विषय में एक शब्द नहीं कहे हैं। स्कूल शिक्षा मंत्री और विभागीय अफसर क्यों खामोश हैं? यह छत्तीसगढ़ की जनता भली-भांति जानती है। फिलहाल इस पर कुछ कहना उचित नहीं है। लेकिन यहां सरकार और सिस्टम को पहली बार इस तरह ललकारा गया है। असहयोग के ऐलान के बाद भी विभागीय मंत्री और अफसरों का खामोश रहना लाचार और लचर सिस्टम का जीता जागता उदाहरण है। खैर विभागीय मंत्री और अफसरों की खामोशी के बीच मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने स्पष्ट किया है कि स्कूलों की किसी भी प्रकार की मनमानी बरदाश्त नहीं की जाएगी। अब देखना यह है कि इस साल आरटीई के तहत प्राइवेट स्कूलों में दाखिले के आकड़े कहां पहुंचते हैं।

तरह-तरह के भ्रष्टाचार

निश्चित तौर पर राज्य के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सरल और सहज ही हैं। जिनका चारों ओर फायदा उठाया जा रहा है। शायद इसीलिए इन दिनों छत्तीसगढ़ में कुछ अफसरों और नेताओं की गठजोड़ के कारण भ्रष्टाचार की खबरें देखने, सुनने और पढऩे को मिल रही हैं। अब यहां आंगनबाड़ी में दी गई साडिय़ों पर ही भ्रष्टाचार कर दिया गया है। इसके पहले इस तरह का भ्रष्टाचार छत्तीसगढ़ में देखने, सुनने और पढऩे को नहीं मिला था। यहां टेंडर के निर्धारित मापदंड को पूरा नहीं किया गया, कहीं छोटी साडिय़ां तो कहीं गुणवत्ताहीन साडिय़ों की सप्लाई कर दी गई है। जिसको लेकर इन दिनों चारों ओर कोहराम मचा हुआ है। कुछ माह पहले जब सीनियर आईएएस विकासशील को दिल्ली से वापस बुलाकर राज्य का सीएस बनाया गया तो एक उम्मीद की किरण दिखने लगी थी कि शायद अब भ्रष्टाचार पर कुछ हद तक नियंत्रण पा लिया जाएगा। लेकिन धरातल में भ्रष्टाचार के प्रतिदिन नए -नए किस्से उजागर हो रहे हैं। सीएस ने भी ज्वाइन करते समय भ्रष्टाचार पर प्रहार करने की बात कही थी। लेकिन समय बीतने के बाद नजारा कुछ और ही दिख रहा है। यहां भ्रष्टाचार पर लगाम तो दूर बल्कि तरह -तरह के भ्रष्टाचार देखने, सुनने और पढऩे को मिल रहे हैं। फिलहाल इस पर जल्द नियंत्रण की जरुरत है वरना भ्रष्टाचार पर सरकार को घिरने में देर नहीं लगेगी।

फाइलों में दौड़ती परियोजनाएं और विकास के दावे

निश्चित ही बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे में विष्णु सरकार को बड़ी सफलता मिली है। इसके लिए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और जवानों की जितनी भी सराहना की जाए वह कम है। बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे के साथ यहां का विकास प्रमुख केन्द्र बिन्दु है। लेकिन बस्तर का विकास और फाइलों में दौड़ती परियोजनाएं सिस्टम पर सवाल खड़े कर रहीं हैं। बस्तर मार्ग के प्रवेश में ही केशकाल घाटी पड़ती है, जो बस्तर को जोडऩे की एकमात्र कड़ी है। यहां वायपास का निर्माण किया जाना है, इसके लिए 3 माह पूर्व काम भी एलाट कर दिया गया है, लेकिन ग्राउंड में सन्नाटा पसरा हुआ है। विकास सिर्फ फाइलों में दौड़ता नजर आ रहा है। यह वायपास परियोजना कोई नई परियोजना नहीं है, वर्ष 2016 में राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने करीब 308.77 करोड़ रुपये की लागत से इसका निर्माण शुरु कराया था। जिसको पूरा करने का लक्ष्य अगस्त 2019 निर्धारित किया गया था। लेकिन प्रशासनिक दांव-पेंच में यह काम लटक गया। इसके लिए मुंबई की एक कंपनी को इसका ठेका दिया गया था। वहीं 2025 में केन्द्र सरकार ने इसे 4 लेन में अपग्रेट करने के लिए 307.96 करोड़ रुपये की नई स्वीकृति दी। लेकिन अभी तक यहां सन्नाटा है। वर्ष 2016 से वायपास मंजूर है, लेकिन आज 10 साल बीत जाने के बाद भी धरातल में सन्नाटा क्यों है ? आखिर इसका जिम्मेदार कौन है? क्या ऐसे ही बस्तर के विकास की बातें होंगी? इसके लिए एक नहीं बल्कि दो बार स्वीकृति दी जा चुकी है, तब भी हालात जस के तस हैं? क्या बस्तर को जोडऩे वाली सड़क निर्माण की गति इसी तरह चलेगी? आखिर ऐसे महत्वपूर्ण विकास कार्यों में उदासीनता क्यों हैं? इसका असली जिम्मेदार कौन है? इस पर मंथन और चिंतन की जरुरत है।

मेन धुरी में आने को बेताब नंदकुमार

छत्तीसगढ़ के प्रथम नेता प्रतिपक्ष नंदकुमार साय इन दिनों राजनीति की मेन धुरी में आने के लिए लगातार कसरत कर रहे हैं। उन्होंने हाल ही में आदिवासी समाज से अपील की है कि कम से कम पांच बच्चे पैदा करें। उनका यह बयान इन दिनों आदिवासियों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि राजनीतिक रुप से उनकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लग चुका है। जिस भाजपा ने उन्हें कभी प्रथम नेता प्रतिपक्ष बनने का गौरव दिया, सांसद बनाया, विधायक बनाया, अनुसूचित जनजाति आयोग का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया, नंदकुमार साय ने राज्य में सरकार पलटते ही उसी भाजपा के साथ दगा करके कांग्रेस का दामन थाम लिया। राष्ट्रीय स्तर पर परचम लहराने के बाद भी वह सीएसआईडीसी जैसे आयोग के चेयरमेन का पद पाकर अपने आप को गौरवान्तित महसूस कर रहे थे। फिलहाल ऐसे में उनकी बातों को आदिवासी समाज कितना गंभीरता से लेगा, इस पर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह बात स्पष्ट दिख रही है कि अब नंदकुमार साय बयानबाजी के माध्यम से मेन धुरी में आने को बेताब हैं।

सुप्रीम कोर्ट और पूर्णकालिक डीजीपी

प्रभारी डीजीपी और शीर्ष अफसरों के एक्सटेंशन का चलन इन दिनों देशभर में देखने को मिल रहा है। हालांकि 12 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने देश में प्रभारी डीजीपी की परंपरा पर रोक लगाने के निर्देश जारी किए हैं। उसके बाद से यह माना जा रहा था कि अब छत्तीसगढ़ को भी पूर्णकालिक डीजीपी मिल जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों और यूपीएससी को दो सप्ताह के भीतर इस प्रक्रिया को पूरी करने का निर्देश दिया था। लेकिन अभी तक कोर्ट के आदेश पर कोई अमल होते नहीं दिख रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य में अभी भी प्रभारी डीजीपी के रुप में अरुणदेव गौतम जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं। बिहार, तेलांगाना, आंध्र्रप्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में भी स्थिति लगभग एक जैसी है। फिलहाल छत्तीसगढ़ में पूर्णकालिक डीजीपी पर निर्णय कब होगा, इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता ।

श्वेत क्रांति और नीली क्रांति पर जोर

बस्तर में निवासरत बीपीएल परिवारों को 1 जून से छत्तीसगढ़ सरकार मुफ्त में गाय देने की योजना शुरू करने जा रही है। दरअसल सरकार आदिवासियों की आय बढ़ाने के लिए लगातार प्रयासरत है, इसलिए पशुपालन और मत्स्य पालन पर जोर दिया जा रहा है।

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