भव्य गौरी पूजन का आयोजन संपन्न

बलौदा बाजार। महात्मा गांधी रोड स्थित सदर बाजार में ताना जी पवार शिवाजी ज्वेलर्स एवं राजाराम पवार के निवास स्थान पर गौरी पूजा का आयोजन किया गया बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने के लिए आए गौरी प्रतिमा को भव्य श्रृंगार किया गया था गौरी पूजन हेतु विवाहित महिलाएं आज के दिन अपने घर की सुख-समृद्धि और सौभाग्य प्राप्ति के व्रत रखती हैं। यह गौरी पूजन मां गौरा पार्वती से आशीर्वाद पाने के लिए रखा जाता है। मुख्य रूप से गौरी पूजन का पर्व महाराष्ट्र में मनाया जाता है। बलौदा बाजार में बहुत संख्या में महाराष्ट्र से आए हुए महाराष्ट्रीयन परिवार यहां मौजूद है उन्हीं के द्वारा गौरी पूजन का आयोजन किया जाता है गौरी पूजन हर साल गणेश चतुर्थी के चौथें व पांचवें दिन पड़ती है। इस दिन देवी का आवाहन किया जाता है। उनकी प्रतिष्ठा की जाती है। दूसरे दिन मां की मुख्य पूजा होती है और तीसरे दिन देवी की विदाई होती की गई
ज्येष्ठ गौरी आवाहन का महत्व
ज्येष्ठ गौरी आवाहन हिंदू धर्म में बहुत पूजनीय है, खासकर मराठी महिलाओं के बीच जो इस त्यौहार को बहुत श्रद्धा से मनाती हैं। गौरी की मूर्ति के आगमन के साथ अनुष्ठान शुरू होते हैं, उसके बाद उपवास और प्रार्थना की जाती है। यह व्रत अनुराधा नक्षत्र के तहत मनाया जाता है।

यह त्यौहार वैवाहिक सद्भाव और समृद्धि का प्रतीक है। विवाहित महिलाएँ अपने पति की सलामती के लिए प्रार्थना करती हैं, जबकि अविवाहित महिलाएँ अच्छे जीवनसाथी के लिए आशीर्वाद मांगती हैं। यह त्यौहार तीन दिनों तक चलता है, जिसकी शुरुआत गौरी की मूर्ति को घर में लाने से होती है, उसके बाद दूसरे दिन मुख्य पूजा होती है और तीसरे दिन मूर्ति के विसर्जन के साथ इसका समापन होता है।
माता के माथे पर हल्दी-कुमकुम और अक्षत लगाते है। ज्येष्ठ गौरी के दिन माता गौरी की प्रतिमा शुभ मुहूर्त में स्थापना की जाती है।

दूसरे दिन नैवेद्य को 16 सब्जियां, 16 सलाद, 16 चटनी, 16 व्यंजन माता गौरी को चढ़ाए जाते हैं। इसके बाद 16 दीपक के साथ मां की आरती करने की मान्यता है। भजन एवं कीर्तन किया गया उसके पश्चात प्रसाद वितरण किया गया आरती में स्वाति पवार नीतू साहू कल्पना पवार अदिति पवार रानू महेश्वरी स्वाति पवार बड़ी संख्या में महिलाएं सम्मिलित हुई महाराष्ट्र में गौरी पूजा (या गवरी/महालक्ष्मी पूजन) गणेशोत्सव के दौरान बड़ी आस्था और पारंपरिक रीति से की जाती है। यह मुख्य रूप से गणेश चतुर्थी के दूसरे या तीसरे दिन से शुरू होकर गौरी आगमन, गौरी पूजन और गौरी विसर्जन तक चलता है। इसे महाराष्ट्रीयन स्त्रियों का खास उत्सव माना जाता है।
मान्यता है कि माता गौरी (महालक्ष्मी स्वरूप) घर में सुख-समृद्धि, शांति और सौभाग्य लेकर आती हैं।

विशेष रूप से महिलाएँ अपनी सुहाग, बच्चों की लंबी उम्र और घर के सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत करती हैं।

गणेश चतुर्थी के दूसरे या तीसरे दिन गौरी माता को घर बुलाया जाता है।
कुछ घरों में गौरी की मूर्ति लाई जाती है।
कहीं पर मिट्टी के कलश/गागर को सजाकर गौरी स्वरूप माना जाता है।
गागर में जल भरकर उस पर नारियल रखा जाता है और उसे साड़ी व गहनों से सजाया जाता है।
रंगोली बनाई जाती है, सुंदर आसन पर गौरी को विराजमान किया जाता है।
सजावट – गौरी को नई साड़ी, चूड़ियाँ, बिंदी, कुमकुम, फूल-माला और आभूषण पहनाए जाते हैं।
पूजन सामग्री – हल्दी-कुमकुम, फूल, हार, पान-सुपारी, नारियल, मिठाई, पंचामृत, फल।
सबसे पहले कलश/गौरी का आवाहन किया जाता है।
नारियल, सुपारी और पान से पूजा की जाती है।
महिलाएँ आरती उतारती हैं और सोळा शृंगार (16 श्रृंगार) अर्पित करती हैं।
व्रत कथा सुनाई जाती है।
भोजन – नैवेद्य में पूरनपोली, मोदक, खीर और पारंपरिक महाराष्ट्रीय व्यंजन बनाए जाते हैं।
दो दिन पूजन के बाद, तीसरे दिन गाजे-बाजे से माता गौरी का विसर्जन किया जाता है।

घर की महिलाएँ आपस में “हल्दी-कुमकुम” का कार्यक्रम करती हैं और एक-दूसरे को सौभाग्य का आशीर्वाद देती हैं।
हर घर की अपनी परंपरा होती है – कहीं दो गौरी, कहीं तीन गौरी विराजती हैं।

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