मक्का पैक्ट के बाद भी सऊदी के लिए नहीं उतरा पाकिस्तान, हूती हमले पर सिर्फ फोन कॉल क्यों?

सऊदी अरब | सऊदी अरब  पर हूती हमले के बाद पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए मक्का डिफेंस पैक्ट को लेकर सवाल उठने लगे हैं। समझौते के बावजूद पाकिस्तान ने अभी तक हूतियों के खिलाफ किसी सैन्य कार्रवाई का ऐलान नहीं किया है। फिलहाल इस्लामाबाद की ओर से सऊदी अरब को समर्थन का भरोसा और कूटनीतिक मदद देने की बात कही गई है।

13 सितंबर को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से फोन पर बातचीत की। पाकिस्तानी पीएम कार्यालय के मुताबिक, शरीफ ने क्षेत्र में तनाव कम करने और शांति कायम करने की कोशिशें जारी रखने का भरोसा दिया। क्राउन प्रिंस ने भी संकट के समय पाकिस्तान के समर्थन की सराहना की।

दरअसल, 7 अगस्त को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच मक्का में एक रक्षा समझौता हुआ था। इसमें किसी एक देश पर होने वाले हमले को तीनों देशों पर हमला मानने की बात कही गई थी। इसके बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक था कि सऊदी अरब पर हूती हमले की स्थिति में क्या पाकिस्तान सैन्य रूप से उसके साथ खड़ा होगा।

पाकिस्तान ने सैन्य कार्रवाई पर क्या कहा?

हूती हमलों के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि फिलहाल किसी सैन्य कार्रवाई पर चर्चा नहीं हो रही है। प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने कहा कि मक्का समझौता मुख्य रूप से रक्षात्मक प्रकृति का है।

इस्लामाबाद के मुताबिक, अगर सऊदी अरब पर बिना उकसावे के सीधा हमला होता है या यमन का संघर्ष सऊदी क्षेत्र तक फैलता है, तब समझौते के प्रावधान लागू हो सकते हैं। यानी मौजूदा हूती हमलों को लेकर पाकिस्तान तत्काल सैन्य हस्तक्षेप करने के बजाय स्थिति पर नजर रख रहा है।

यमन में क्यों बढ़ा तनाव?

यमन में ईरान समर्थित हूती बलों और सऊदी समर्थित सरकारी बलों के बीच संघर्ष तेज हुआ है। हूतियों की गतिविधियों ने लाल सागर और बाब अल-मंदेब जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों को लेकर भी चिंता बढ़ाई है।

ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय सुरक्षा पर बढ़ते दबाव के बीच सऊदी अरब को अमेरिका से भी मदद की उम्मीद थी। हालांकि अमेरिका ने हूतियों के खिलाफ सीधे सैन्य अभियान में उतरने से इनकार करते हुए खुफिया सहयोग की बात कही है।

ऐसे में पाकिस्तान के सामने भी बड़ी कूटनीतिक चुनौती है। उसे एक तरफ सऊदी अरब के साथ अपने करीबी रिश्ते निभाने हैं, वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय संघर्ष में सीधे सैन्य रूप से शामिल होने से बचना है। यही वजह है कि फिलहाल इस्लामाबाद का रुख कूटनीतिक समर्थन और हालात पर नजर रखने वाला नजर आ रहा है।

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