धर्म डेस्क। विजयादशमी यानी दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। वर्ष 2026 में दशहरे का पर्व 20 अक्टूबर, मंगलवार को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह दिन पूजा-पाठ, नई शुरुआत और सुख-समृद्धि की कामना के लिए विशेष माना जाता है। ज्योतिषीय परंपराओं में इस अवसर पर शमी वृक्ष की पूजा, भगवान श्रीराम और हनुमान जी का स्मरण तथा कुछ विशेष धार्मिक उपाय करने का उल्लेख मिलता है।
मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक किए गए इन उपायों से शनि की प्रतिकूल दशा और राहु-केतु से जुड़ी परेशानियों में राहत की कामना की जा सकती है। आइए जानते हैं दशहरे पर किए जाने वाले तीन पारंपरिक उपाय।
1. शमी के पेड़ के नीचे जलाएं दीपक
हिंदू धार्मिक परंपराओं में शमी वृक्ष का विशेष महत्व है। दशहरे के दिन शमी के पेड़ की पूजा करने और उसके समीप दीपक जलाने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है। ज्योतिषीय मान्यताओं में शमी वृक्ष का संबंध शनिदेव से जोड़ा जाता है।
कैसे करें उपाय?
- दशहरे की शाम शमी के पौधे या पेड़ के पास स्वच्छता रखें और श्रद्धापूर्वक प्रणाम करें।
- वृक्ष की जड़ में थोड़ा जल अर्पित करें।
- अपनी परंपरा के अनुसार रोली, अक्षत और पुष्प चढ़ाएं।
- पेड़ के पास सुरक्षित स्थान पर दीपक जलाकर परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की प्रार्थना करें।
धार्मिक विश्वास के अनुसार, यह पूजा शनिदेव की कृपा प्राप्त करने और जीवन की बाधाओं से राहत की कामना के लिए शुभ मानी जाती है। कुछ ज्योतिषीय मान्यताओं में इसे राहु-केतु की शांति की प्रार्थना से भी जोड़ा गया है।
2. पत्तों पर लिखें ‘जय श्रीराम’
विजयादशमी पर भगवान श्रीराम की पूजा का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रीराम और हनुमान जी का स्मरण करना तथा उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना शुभ माना जाता है।
कैसे करें उपाय?
- परंपरा के अनुसार तीन, पांच या सात स्वच्छ पत्ते लें।
- उन पर लाल सिंदूर से ‘जय श्रीराम’ लिखें।
- इसके बाद पत्तों को किसी हनुमान मंदिर में पुजारी के निर्देशानुसार निर्धारित स्थान पर रखें।
- पूजा के दौरान हनुमान जी का स्मरण कर परिवार की सुख-समृद्धि और जीवन में आने वाली बाधाओं से मुक्ति की प्रार्थना करें।
मान्यता है कि इस उपाय को श्रद्धापूर्वक करने से शनि दोष तथा राहु-केतु से संबंधित परेशानियों से राहत की कामना की जाती है। ध्यान रखें कि मंदिर में पत्ते रखने के स्थानीय नियमों का पालन करें और उन्हें भगवान की प्रतिमा या चरणों पर रखने से बचें, यदि वहां ऐसी परंपरा न हो।
3. रावण दहन के बाद राख से जुड़ी लोक मान्यता
दशहरे पर रावण दहन बुराई, अहंकार और अधर्म पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। कुछ लोक मान्यताओं में रावण दहन के बाद बची राख को भी धार्मिक महत्व दिया जाता है।
क्या है परंपरा?
- कुछ मान्यताओं के अनुसार, रावण दहन के बाद बची राख को लाल कपड़े में रखकर घर की पूर्व दिशा में रखने का विधान बताया जाता है।
- इस परंपरा को कुछ लोग कालसर्प दोष और शनि, राहु-केतु से जुड़ी परेशानियों से राहत की कामना के साथ जोड़ते हैं।
हालांकि, यह एक लोक मान्यता है। इस उपाय से किसी ज्योतिषीय दोष के दूर होने का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। सार्वजनिक स्थान से राख इकट्ठा करने के बजाय स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करें। गर्म राख या अधजले अवशेषों को छूने से बचें।
दशहरे का वास्तविक संदेश क्या है?
विजयादशमी केवल धार्मिक उपायों का दिन नहीं, बल्कि अपने भीतर की बुराइयों को दूर करने और अच्छे संकल्प लेने का भी अवसर है। यह पर्व हमें अहंकार, क्रोध, छल और नकारात्मकता से दूर रहकर सत्य, साहस और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
ध्यान दें: शनि, राहु-केतु या कालसर्प दोष से राहत मिलने संबंधी बातें धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं। इन्हें निश्चित परिणाम की गारंटी न मानें। अपनी पारिवारिक परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा करना उचित रहेगा।