मुंबई । भारतीय सिनेमा के इतिहास में व्ही. शांताराम का नाम उन महान फिल्मकारों में शामिल है, जिन्होंने फिल्मों को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि समाज में बदलाव लाने का सशक्त जरिया बनाया। अपनी अनूठी फिल्म निर्माण शैली, प्रयोगधर्मिता और सामाजिक विषयों पर आधारित फिल्मों के माध्यम से उन्होंने दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई। 30 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर सिनेमा जगत उन्हें याद कर रहा है।
व्ही. शांताराम का वास्तविक नाम राजाराम वानकुदरे शांताराम था। उनका जन्म 18 नवंबर 1901 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में हुआ था। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। हालांकि, बचपन से ही फिल्मों के प्रति उनका गहरा आकर्षण था और वह फिल्मकार बनने का सपना देखते थे।
नाटकों से शुरू हुआ फिल्मी सफर
फिल्मी दुनिया में कदम रखने से पहले शांताराम ने गंधर्व नाटक मंडली में काम किया। इसके बाद उन्होंने सिनेमा की दुनिया में अपनी पहचान बनानी शुरू की। शुरुआती दौर में उन्होंने अभिनय और फिल्म निर्माण के विभिन्न पहलुओं को करीब से समझा।
वर्ष 1921 में आई मूक फिल्म ‘सुरेखा हरण’ से उन्होंने अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की। आगे चलकर वह भारतीय सिनेमा के प्रमुख निर्देशक, निर्माता और अभिनेता के रूप में स्थापित हुए।
सामाजिक मुद्दों को बनाया फिल्मों का आधार
व्ही. शांताराम की फिल्मों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनमें मनोरंजन के साथ सामाजिक संदेश भी होता था। उन्होंने जातिगत भेदभाव, महिला सशक्तिकरण, सामाजिक कुरीतियों, मानवीय संवेदनाओं और समाज सुधार जैसे विषयों को अपनी फिल्मों में प्रमुखता दी।
उनकी चर्चित फिल्मों में ‘दुनिया ना माने’, ‘आदमी’, ‘पड़ोसी’, ‘डॉ. कोटनिस की अमर कहानी’, ‘दो आंखें बारह हाथ’ और ‘नवरंग’ जैसी फिल्में शामिल हैं।
वर्ष 1937 में प्रदर्शित ‘दुनिया ना माने’ ने बाल विवाह और महिलाओं की स्थिति जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों को उठाया। वहीं ‘दो आंखें बारह हाथ’ ने सुधार और मानवीय संवेदना का संदेश देकर भारतीय सिनेमा में विशेष स्थान बनाया।
प्रभात फिल्म कंपनी और राजकमल कला मंदिर की स्थापना
शांताराम ने 1929 में अपने सहयोगियों के साथ प्रभात फिल्म कंपनी की स्थापना की। इस बैनर के तहत उन्होंने कई महत्वपूर्ण फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया।
बाद में उन्होंने मुंबई में राजकमल कला मंदिर की स्थापना की, जहां से अनेक यादगार फिल्मों का निर्माण हुआ। उन्होंने भारतीय फिल्मों में तकनीक, रंग, संगीत और छायांकन के नए प्रयोगों को भी बढ़ावा दिया।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिला सम्मान
व्ही. शांताराम की फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली। इस फिल्म को 1958 में बर्लिन अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में सिल्वर बियर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें भारतीय सिनेमा में उल्लेखनीय योगदान के लिए 1985 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार भी प्रदान किया गया।
आज भी प्रेरणा देते हैं उनके विचार
व्ही. शांताराम का निधन 30 अक्टूबर 1990 को हुआ था। हालांकि, उनके द्वारा बनाई गई फिल्में आज भी भारतीय सिनेमा की अमूल्य धरोहर मानी जाती हैं।
उन्होंने अपने रचनात्मक दृष्टिकोण से साबित किया कि सिनेमा केवल दर्शकों के मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज को सोचने, समझने और सकारात्मक बदलाव के लिए प्रेरित करने की क्षमता भी रखता है। भारतीय सिनेमा में उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा।