नई दिल्ली | रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर अमेरिका के 100 फीसदी टैरिफ की तलवार फिलहाल टलती नजर आ रही है। रूस पर नए प्रतिबंध लगाने वाला लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट 2026 अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में अटक गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनाव तक इस बिल पर आगे बढ़ने की संभावना कम है।
क्या है 100% टैरिफ का पूरा मामला?
अमेरिकी सीनेट ने अगस्त में इस बिल को भारी बहुमत से मंजूरी दी थी। 86-11 के वोट से पारित कानून में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस के प्रमुख तेल और गैस खरीदार देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान है। भारत और चीन जैसे देश इस प्रावधान के दायरे में आ सकते हैं।
हालांकि, यह टैरिफ अपने आप लागू नहीं होता। बिल को प्रतिनिधि सभा से मंजूरी और राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद ही कानून का रूप मिलेगा।
अमेरिकी सदन में क्यों अटका बिल?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रतिनिधि सभा में कुछ सांसद इस बात को लेकर चिंतित हैं कि बिल से ट्रंप की टैरिफ लगाने की शक्तियां काफी बढ़ सकती हैं। इसके अलावा अमेरिकी अर्थव्यवस्था और ईंधन की कीमतों पर संभावित असर को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। इसी वजह से बिल को आगे बढ़ाने में देरी हो रही है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह मामला?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूसी कच्चे तेल का बड़ा खरीदार है। आपके दिए स्रोत के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के कुल 134.7 अरब डॉलर के कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 30.3 फीसदी, यानी करीब 40.8 अरब डॉलर रही।
रूसी तेल की खरीद में कमी आने पर भारत के ऊर्जा आयात बिल और घरेलू ईंधन कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। यही वजह है कि इस बिल के फिलहाल अटकने को भारत के लिए अस्थायी राहत के तौर पर देखा जा रहा है।
जयशंकर ने भी साफ किया भारत का रुख
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने रूस-यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में कहा है कि किसी देश द्वारा रूसी तेल या अन्य सामान खरीदना इस संघर्ष का समाधान नहीं है। उनके मुताबिक युद्ध का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए ही संभव है।
भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को भी अहम प्राथमिकता बताया है। ऐसे में अमेरिकी प्रतिबंध कानून पर आगे होने वाली चर्चा पर नई दिल्ली की नजर बनी रहेगी।
फिलहाल क्या समझें?
अभी भारत पर 100 फीसदी अमेरिकी टैरिफ लागू नहीं हुआ है। बिल सीनेट से पास हो चुका है, लेकिन प्रतिनिधि सभा में इसकी राह मुश्किल बनी हुई है। नवंबर के मिडटर्म चुनाव तक इसके अटके रहने की संभावना भारत को फिलहाल राहत देती है, लेकिन खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।