नई दिल्ली | बिहार के बांका जिले से जुड़े एक बहुचर्चित मामले में पटना हाईकोर्ट द्वारा दिए गए एक विवादित फैसले पर देश की सर्वोच्च अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट की उस टिप्पणी पर स्वतः संज्ञान लिया है, जिसमें अदालत ने कहा था कि “बंद कमरे में महिला का जबरन ब्रेस्ट दबाना और सलवार उतारना, रेप की कोशिश नहीं है।” सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश की कड़ी आलोचना की है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और निर्देश
इस मामले की सुनवाई CJI जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच कर रही है। लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुनवाई के दौरान CJI की बेंच ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के फैसले की कुछ बातें बेहद आपत्तिजनक हैं। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि वे आरोपी का पक्ष सुने बिना सीधे हाईकोर्ट के फैसले को रद्द नहीं कर सकते।
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नोटिस जारी करने के निर्देश: सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई में मौजूद बिहार के एडवोकेट जनरल एस डी संजय को निर्देश दिया कि वे स्थानीय पुलिस की मदद से आरोपी तक नोटिस पहुंचाना सुनिश्चित करें।
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न्यायिक दृष्टिकोण पर विस्तृत आदेश के संकेत: कोर्ट ने यह भी संकेत दिया है कि भविष्य में यौन अपराधों (Sexual Offences) के मामलों में जजों के दृष्टिकोण और संवेदनशीलता को लेकर एक विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किया जा सकता है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला 20 जनवरी 2008 का है, जो बिहार के बांका जिले से जुड़ा है:
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घटना: एक नाबालिग लड़की अपने पिता के साथ एक फोटो स्टूडियो में फोटो खिंचवाने गई थी। स्टूडियो के मालिक हिमांशु ने फोटो खींचने के बहाने लड़की को अंदर बुलाया और पिता को बाहर इंतजार करने को कहा।
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आरोप: पीड़िता का आरोप था कि अंदर जाने के बाद आरोपी ने दरवाजा बंद कर लिया, अपने कपड़े उतारे और उसकी सलवार उतारने की कोशिश की। साथ ही उसका ब्रेस्ट दबाकर बदसलूकी की।
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निचली अदालत का फैसला: साल 2013 में बांका की निचली अदालत ने आरोपी हिमांशु को बंधक बनाने और रेप के प्रयास का दोषी मानते हुए 3 साल की सजा सुनाई थी। इसी फैसले को आरोपी ने पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
पटना हाईकोर्ट का विवादित तर्क
पटना हाईकोर्ट के जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने अपील मंजूर करते हुए आरोपी को रेप के प्रयास के आरोप से बरी कर दिया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में तर्क दिया था कि हालांकि आरोपी ने बल प्रयोग किया और बदसलूकी की, लेकिन यह घटना ‘रेप के प्रयास’ की बजाय ‘मर्यादा को ठेस पहुंचाने’ (Outraging Modesty) का मामला है, क्योंकि घटना की पुष्टि के लिए पर्याप्त मेडिकल सबूत नहीं हैं।
इसके अलावा, अदालत ने गवाहों (पीड़िता के माता-पिता) की गवाही पर भी सवाल उठाए थे।
पहले भी आ चुके हैं ऐसे मामले
इसी से मिलते-जुलते एक मामले में मार्च 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी टिप्पणी की थी कि ‘नाड़ा तोड़ना और निजी अंग पकड़ना रेप की कोशिश नहीं बल्कि अपराध की तैयारी है।’ हालांकि, फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले को पलटते हुए स्पष्ट किया था कि यह सीधे तौर पर रेप की कोशिश है।
अब सुप्रीम कोर्ट के इस स्वतः संज्ञान के बाद एक बार फिर न्यायपालिका के भीतर यौन अपराधों के मामलों में संवेदनशीलता और कानूनी परिभाषाओं को लेकर गंभीर बहस छिड़ गई है।