अब अड़ानी से सरकार ख़रीदेगी बिजली

25 साल का अनुबंध, दो और खदानों की मंज़ूरी

डॉ ए.एन. द्विवेदी

रायपुर। छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में एक बार फिर दो नई कोयला खदानें खुलने का रास्ता साफ हो गया है। इस फ़ैसले के बाद छत्तीसगढ़ में एक बार फिर विरोध के स्वर उठने लगे हैं।
दरअसल उत्तराखंड राज्य मंत्रिमंडल ने उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत अडानी समूह छत्तीसगढ़ में कोयला आधारित 1320 मेगावाट का बिजली संयंत्र स्थापित करेगा और यहां पैदा होने वाली बिजली उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड को बेची जाएगी। यह फैसला इसलिए भी चर्चा का केंद्र बना हुआ है, क्योंकि छत्तीसगढ़ के उन्हीं इलाकों से कोयला निकाला जाएगा, जो लंबे समय से कोयला खनन और पर्यावरणीय सवालों के केंद्रबिंदु रहे हैं। हसदेव अरण्य में हो रहे कोयला खनन का यहाँ लगातार विरोध हो रहा है। अब अड़ानी पॉवर को मिली इस स्वीकृती के बाद स्थानियों के क्या रुख़ होंगे ? फ़िलहाल इस पर कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी।

क्या है मामला?

आड़ानी पॉवर के साथ 25 साल का समझौता, 5.746 रुपये प्रति यूनिट बिजली खरीदेगी उत्तराखंड सरकार। मंजूरी के अनुसार उत्तराखंड सरकार और अडानी पावर लिमिटेड के बीच 25 वर्षों का बिजली खरीद समझौता होगा। इसके तहत 1320 मेगावाट बिजली 5.746 रुपये प्रति यूनिट की दर से खरीदी जाएगी। बिजली आपूर्ति वर्ष 2029 तक शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। इस परियोजना के लिए अडानी पावर को केंद्र सरकार द्वारा उत्तराखंड सरकार को आवंटित गिधमुरी और पातुरिया कोयला ब्लॉक से कोयला मिलेगा। दोनों ब्लॉक सरगुजा और सूरजपुर जिलों की सीमा पर स्थित हैं और हसदेव अरण्य क्षेत्र का हिस्सा हैं। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि 1320 मेगावाट का बिजली संयंत्र छत्तीसगढ़ में कोयला खदानों के पास पिटहेड पर लगाया जाएगा या उत्तराखंड में।

अलग है उत्तराखंड का मॉडल

यह समझौता दूसरे राज्यों के साथ अडानी पावर के अनुबंध से अलग भी है। उदाहरण के लिए, राजस्थान ने छत्तीसगढ़ में कोयला खनन के लिए अडानी के साथ माइन डेवलपर-कम-ऑपरेटर समझौता किया है और वहां से निकले कोयले का इस्तेमाल अपने राज्य के बिजली संयंत्रों में करता है। जबकि उत्तराखंड ने बिजली उत्पादन तक की पूरी जिम्मेदारी अडानी की कंपनी को दे दी है। यानी खनन से लेकर बिजली उत्पादन तक का काम अडानी पावर ही करेगी और उत्तराखंड सरकार सिर्फ बनी-बनाई बिजली खरीदेगी।

पर्यावरण पर सवाल बरकरार

छत्तीसगढ़ के कोयला भंडार का इस्तेमाल पहले से ही देश के कई राज्यों की ऊर्जा जरूरतें पूरी करने के लिए किया जा रहा है। राजस्थान के अलावा गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु को भी यहां कोयला ब्लॉक आवंटित किए गए हैं। हसदेव अरण्य को मध्य भारत का फेफड़ा कहा जाता है और यहां खनन को लेकर लगातार विरोध होता रहा है। उत्तराखंड की इन दोनों खदानों के खुलने से पहले पर्यावरणीय स्वीकृति, वन स्वीकृति और ग्राम सभा की अनुमति जैसी अनिवार्य प्रक्रियाएं होनी हैं। जानकारों का मानना है कि उत्तराखंड मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद अब इन प्रक्रियाओं में तेजी आ सकती है। फिलहाल इस फैसले के बाद एक बार फिर हसदेव अरण्य में पर्यावरण बनाम विकास की बहस तेज होने की उम्मीद है।

पॉवर प्लांट उत्तराखण्ड में क्यों?

कहा जा रहा है कि अड़ानी समूह कोयला तो छत्तीसगढ़ से निकलेगी, लेकिन विद्युत संयंत्र छत्तीसगढ़ में नहीं लगाये जाएँगे। जिसको लेकर स्थानियों में विरोध शुरू हो गया है। कहा जा रहा है की कोयला छत्तीसगढ़ का लेकिन रोज़गार अन्य राज्य को क्यों? यह न्यायोचित नहीं है। हालाँकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि संयंत्र कौन से राज्य में लगाये जाएँगे।

शेयर करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *