वोट का हक छीनना संविधान पर हमला, कोई भी अथॉरिटी संविधान से ऊपर नहीं: जस्टिस भुइयां

नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने मतदान के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि भारत का संविधान नागरिकों को दो वर्गों में नहीं बांटता—एक वोट देने वाले और दूसरे वोट देने के अधिकार से वंचित नागरिक। उन्होंने कहा कि यदि किसी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप लाखों-करोड़ों भारतीय नागरिक अपने मताधिकार से वंचित होते हैं, तो ऐसी प्रक्रिया मनमानी होगी।

जस्टिस भुइयां ने कहा कि मतदान का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 326 से जुड़ा संवैधानिक अधिकार है और इसे इस तरह से खत्म नहीं किया जा सकता कि बड़ी संख्या में नागरिक अपने ही देश में मतदान के अधिकार से वंचित हो जाएं।

‘कोई भी अथॉरिटी संविधान से ऊपर नहीं’

जस्टिस भुइयां ने कहा कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया, जिसका परिणाम बड़े पैमाने पर नागरिकों के वोट काटे जाने के रूप में सामने आए, संविधान के अनुच्छेद 14 और 326 के अनुरूप नहीं हो सकती।

उन्होंने कहा कि कोई भी प्राधिकरण ऐसा नहीं कर सकता और कोई भी अदालत ऐसी प्रक्रिया को मंजूरी नहीं दे सकती। उनके मुताबिक, कोई भी संविधान से ऊपर नहीं है।

‘देश में दो तरह के नागरिक नहीं बनाए जा सकते’

जस्टिस भुइयां ने कहा कि यदि किसी प्रक्रिया के कारण लाखों-करोड़ों भारतीय नागरिकों से वोट देने का अधिकार छिन जाता है, तो वे अपने ही देश में ऐसे नागरिक बन जाएंगे जिनके पास लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार नहीं होगा।

उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति संविधान की मूल भावना के खिलाफ होगी और किसी भी प्रक्रिया को केवल प्रशासनिक आधार पर इसे उचित नहीं ठहराया जा सकता।

मतदाता सूची से नाम हटाने पर भी कही बात

जस्टिस भुइयां ने कहा कि पहले से मतदाता सूची में दर्ज किसी नागरिक का नाम उचित प्रक्रिया के बिना नहीं हटाया जाना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से कहा कि मृत मतदाता को छोड़कर किसी नागरिक का नाम हटाने से पहले उसे नोटिस और सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए।

उन्होंने मतदान के अधिकार को नागरिकों की लोकतांत्रिक भागीदारी का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए कहा कि आम नागरिक इसी अधिकार के जरिए देश की शासन व्यवस्था में अपनी भूमिका निभाता है।

अनुच्छेद 326 का किया उल्लेख

जस्टिस भुइयां ने कहा कि मतदान का अधिकार केवल कानूनी अधिकार नहीं है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 326 से प्राप्त संवैधानिक अधिकार है। यह प्रावधान लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों में वयस्क मताधिकार का आधार प्रदान करता है।

उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों में मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकार नहीं माना गया है, लेकिन इसे संविधान से प्राप्त अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है।

‘कोर्ट आंख नहीं मूंद सकता’

जस्टिस भुइयां ने कहा कि भारतीय नागरिकों का मतदान का अधिकार देश के स्वतंत्रता संघर्ष और लोकतांत्रिक व्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि इस अधिकार को प्रभावित करने वाली किसी भी प्रक्रिया की संवैधानिकता पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी प्राधिकरण या अदालत संविधान से ऊपर नहीं है और नागरिकों के मताधिकार को प्रभावित करने वाली किसी भी प्रक्रिया को संवैधानिक कसौटी पर परखा जाना जरूरी है।

18 वर्ष की उम्र में मिलता है मतदान का अधिकार

संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका भारतीय नागरिक लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मतदान कर सकता है, बशर्ते वह कानून के तहत अयोग्य घोषित न किया गया हो। संविधान में निर्धारित आधारों के अनुसार कुछ परिस्थितियों में किसी व्यक्ति को मतदाता सूची से बाहर रखा जा सकता है।

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