नई दिल्ली । दिल्ली पुलिस के सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) विवेक भगत से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महिला पत्रकार को अंतरिम राहत दी है। शीर्ष अदालत ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज मामले में पत्रकार की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी है। इसके साथ ही अदालत ने हालिया विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग के दौरान महिला पत्रकारों के कथित यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच के लिए समिति गठित करने के प्रस्ताव पर भी सहमति जताई है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने 15 अक्टूबर को मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने महिला पत्रकारों की सुरक्षा और उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच का मुद्दा उठाया।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला 3 अक्टूबर को दिल्ली में हुए एक विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है। आरोपों के अनुसार, उस दौरान एक महिला पत्रकार एक कार्यकर्ता को हिरासत में लिए जाने की घटना का वीडियो रिकॉर्ड कर रही थी। पत्रकार ने आरोप लगाया कि इसी दौरान एसीपी विवेक भगत ने उसके साथ कथित तौर पर यौन दुर्व्यवहार किया और उसे धक्का दिया।
मामले को लेकर विवाद बढ़ने के बाद दिल्ली पुलिस ने निष्पक्ष जांच के उद्देश्य से संबंधित प्रकरण को अपराध शाखा (क्राइम ब्रांच) को सौंप दिया था।
दूसरी ओर, एसीपी विवेक भगत ने महिला पत्रकार के खिलाफ एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज कराई। आरोप है कि विरोध प्रदर्शन के दौरान पत्रकार और उसके साथियों ने ड्यूटी कर रहे पुलिस अधिकारी को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया तथा उनके खिलाफ जातिसूचक टिप्पणियां कीं।
इस मामले में एससी/एसटी अधिनियम के अलावा भारतीय न्याय संहिता की धारा 221, 356(2) और 3(5) के तहत भी आरोप दर्ज किए गए हैं।
गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक से पत्रकार को राहत
सुनवाई के दौरान महिला पत्रकार की ओर से पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने अदालत को बताया कि पत्रकार ने पुलिस अधिकारी पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे, लेकिन उनकी शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई। इसके बजाय संबंधित पुलिस अधिकारी की शिकायत पर पत्रकार के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया।
इन दलीलों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी। यह राहत मामले के अंतिम निपटारे के समान नहीं है और आरोपों पर अंतिम निर्णय होना अभी बाकी है।
महिला पत्रकारों के आरोपों की जांच के लिए समिति का प्रस्ताव
सुनवाई के दौरान इंदिरा जयसिंह ने हालिया विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करने वाली महिला पत्रकारों के कथित यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच के लिए स्वतंत्र समिति गठित करने की मांग की। उन्होंने सुझाव दिया कि समिति में एक सेवानिवृत्त महिला न्यायाधीश और एक सेवानिवृत्त भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी को शामिल किया जाए।
रिपोर्टों के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस प्रस्ताव पर सकारात्मक रुख दिखाया और उन महिलाओं के नाम उपलब्ध कराने को कहा जो अपने आरोपों के संबंध में सामने आने के लिए तैयार हैं।
अदालत ने पत्रकारों की सुरक्षा के लिए दिशानिर्देश तैयार करने की संभावना पर भी विचार करने के संकेत दिए।
व्यापक दिशानिर्देशों पर केंद्र सरकार ने जताई आपत्ति
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने महिला पत्रकारों की सुरक्षा की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए व्यापक दिशानिर्देश जारी करने का विरोध किया। उन्होंने कहा कि डिजिटल दौर में पत्रकारिता की पहचान और कार्यक्षेत्र को परिभाषित करना चुनौतीपूर्ण हो गया है, क्योंकि कई लोग स्वतंत्र पत्रकार या डिजिटल सामग्री निर्माता के रूप में काम करते हैं।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी महिला के साथ अनुचित व्यवहार नहीं होना चाहिए। दूसरी ओर, इंदिरा जयसिंह ने दलील दी कि महिला पत्रकारों को विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिसकर्मियों के कथित दुर्व्यवहार से विशेष सुरक्षा की आवश्यकता है। उन्होंने महिला पुलिसकर्मियों द्वारा पत्रकारों को धक्का दिए जाने के आरोपों का भी उल्लेख किया।
पत्रकारों की सुरक्षा पर व्यापक बहस
इस मामले ने विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों की सुरक्षा, पुलिस की जवाबदेही और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर बहस को तेज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अब महिला पत्रकारों की सुरक्षा के लिए संभावित दिशानिर्देशों और कथित घटनाओं की स्वतंत्र जांच से जुड़े मुद्दे महत्वपूर्ण रहेंगे।