छत्तीसगढ़ | छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में ‘रविशंकर महाराज बनाम सीबीआई’ मामले की अहम सुनवाई हुई, जिसमें फोन इंटरसेप्शन (कॉल रिकॉर्डिंग/टैपिंग) से जुड़े सबूतों की कानूनी वैधता पर सवाल उठाए गए। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने दोनों पक्षों को शपथ पत्र के साथ विस्तृत जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 24 जून को निर्धारित की गई है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनु शर्मा सहित अन्य वकीलों ने दलील दी कि ‘दूरसंचार नियम, 2024’ के तहत सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी इंटरसेप्शन आदेश को 7 कार्य दिवसों के भीतर समीक्षा समिति से अनुमोदन मिलना जरूरी है। ऐसा न होने पर आदेश स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है। याचिकाकर्ता पक्ष का कहना है कि ऐसी स्थिति में टैपिंग के आधार पर जुटाए गए साक्ष्य न्यायालय में मान्य नहीं हो सकते।
हाईकोर्ट ने पाया कि मुख्य याचिका में 28 जून 2025 के इंटरसेप्शन आदेश को सीधे चुनौती नहीं दी गई थी, बल्कि बाद में अतिरिक्त आधार जोड़ने के लिए आवेदन दिया गया था। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह सभी मौखिक दलीलों को शामिल करते हुए 24 घंटे के भीतर नया और स्पष्ट शपथ पत्र दाखिल करे तथा उसकी प्रति सीबीआई के अधिवक्ता को उपलब्ध कराए।
सीबीआई पक्ष ने अदालत को बताया कि इसी FIR से जुड़े एक अन्य सह-आरोपी की याचिका पहले से विचाराधीन है, जिसे 24 जून को सूचीबद्ध किया गया है। अदालत ने सीबीआई को भी निर्देश दिया कि वह केंद्र सरकार और सक्षम प्राधिकारी से आवश्यक निर्देश प्राप्त कर 24 जून 2026 तक विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करे।
मामले में अब सभी की नजरें आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां फोन टैपिंग से जुड़े कानूनी पहलुओं पर अहम स्थिति स्पष्ट हो सकती है।