नई दिल्ली | देश के कई हिस्सों में आम आदमी की थाली से प्याज का स्वाद फीका पड़ता नजर आ रहा है। खुदरा बाजारों में प्याज के दाम बढ़कर 60 से 70 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। सरकार द्वारा बफर स्टॉक से सस्ते दामों पर प्याज बेचने और ‘कांदा एक्सप्रेस’ जैसी विशेष परिवहन सेवाओं के बावजूद कीमतें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं।
खुदरा और थोक कीमतों का हाल
उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 16 सितंबर को प्याज का अखिल भारतीय औसत खुदरा मूल्य 53.84 रुपये प्रति किलोग्राम दर्ज किया गया, जो एक साल पहले के 27.71 रुपये से लगभग 94% अधिक है। वहीं, इस दौरान प्याज का औसत थोक मूल्य 45.65 रुपये प्रति किलोग्राम रहा।
सरकार भले ही एनसीसीएफ, एनएएफईडी, केंद्रीय भंडार और मोबाइल वैन के जरिए 35 रुपये प्रति किलो की रियायती दर पर प्याज बेच रही है, लेकिन खुले बाजार में आम उपभोक्ताओं को इसके लिए लगभग दोगुनी कीमत चुकानी पड़ रही है।
कीमतें क्यों बढ़ रही हैं? इसके मुख्य कारण:
-
संक्रमण काल और सप्लाई की कमी: यह समय ‘संक्रमण काल’ का है, यानी पुराना रबी स्टॉक खत्म होने वाला है और नई खरीफ फसल आने में अभी समय है। इस अंतराल के दौरान सप्लाई में अस्थायी कमी आ जाती है।
-
बुवाई में देरी और मौसम की मार: महाराष्ट्र के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों (जैसे नासिक) में खरीफ की बुवाई लगभग 15 दिन देरी से हुई। इसके अलावा, कर्नाटक के कुछ हिस्सों में सामान्य से कम बुवाई और मानसून की अनिश्चितता ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।
-
सट्टेबाजी और जमाखोरी: कुछ व्यापारियों द्वारा इस स्थिति का फायदा उठाने के लिए सट्टेबाजी के तौर पर की जा रही खरीदारी भी कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बना रही है।
सरकार के प्रयास और उत्पादन का अनुमान
सरकार का कहना है कि देश में प्याज की कुल कमी नहीं है। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए प्याज का कुल उत्पादन अनुमान 307.37 लाख टन है, जो पिछले साल (307.67 लाख टन) के लगभग बराबर है।
मांग को नियंत्रित करने और आपूर्ति सुचारू रखने के लिए सरकार ने ‘कांदा एक्सप्रेस’ ट्रेन सेवा और 30 से अधिक ट्रकों की मदद से उत्पादक क्षेत्रों से 19 प्रमुख उपभोग केंद्रों तक प्याज पहुंचाना शुरू किया है। इसके बावजूद, खुले बाजार में उपभोक्ताओं को राहत मिलने में अभी कुछ और वक्त लग सकता है।