राज्योत्सव के दूसरे दिन सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बांधा समां, भक्ति संगीत और छत्तीसगढ़ी लोककलाओं से झूमे दर्शक

रायपुर । छत्तीसगढ़ राज्योत्सव 2026 के दूसरे दिन नवा रायपुर स्थित राज्योत्सव मैदान में कला, संस्कृति, संगीत और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। मुख्य मंच पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने दर्शकों को भारतीय संस्कृति की गौरवशाली विरासत से रूबरू कराया। वहीं भक्ति संगीत, छत्तीसगढ़ी लोकगीत और शास्त्रीय नृत्यों की मनमोहक प्रस्तुतियों ने उत्सव की शाम को यादगार बना दिया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राज्यपाल श्री रमेन डेका ने कलाकारों का सम्मान कर उनकी प्रस्तुतियों की सराहना की।

‘मैं अयोध्या हूं’ नाट्य प्रस्तुति ने किया मंत्रमुग्ध

मुख्य मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत विशेष नाट्य प्रस्तुति ‘मैं अयोध्या हूं’ से हुई। लगभग एक घंटे की इस प्रस्तुति में अयोध्या की ऐतिहासिक, धार्मिक और आध्यात्मिक विरासत को प्रभावशाली अभिनय एवं कलात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से जीवंत किया गया।

नाट्य मंचन में भारतीय संस्कृति, आस्था, परंपराओं और गौरवशाली इतिहास की सुंदर झलक देखने को मिली। कलाकारों ने राम मंदिर निर्माण के ऐतिहासिक प्रसंगों और भारतीय सांस्कृतिक चेतना को सशक्त अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया। इस प्रस्तुति ने दर्शकों को आध्यात्मिक भावनाओं और सांस्कृतिक गौरव से जोड़ दिया।

स्वास्ति मेहुल के भजनों से भक्तिमय हुई शाम

राज्योत्सव की सांस्कृतिक संध्या का विशेष आकर्षण प्रसिद्ध पार्श्व गायिका एवं ‘राम आएंगे’ फेम सुश्री स्वास्ति मेहुल की प्रस्तुति रही। उनकी सुरीली आवाज और भक्तिमय गीतों ने पूरे वातावरण को रामभक्ति और कृष्णभक्ति के रंग में रंग दिया।

उन्होंने लोकप्रिय भजन ‘राम आएंगे’ की प्रस्तुति दी, जिस पर दर्शक भक्तिरस में डूबे नजर आए। वहीं ‘कान्हा आन बसो वृंदावन’ की मधुर प्रस्तुति ने श्रोताओं को कृष्ण भक्ति की भावधारा में सराबोर कर दिया।

कंचन जोशी के छत्तीसगढ़ी गीतों पर झूमे दर्शक

कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ी पार्श्व गायिका सुश्री कंचन जोशी ने अपनी शानदार गायकी से दर्शकों का मन मोह लिया। उन्होंने ‘मोला ले दे ना राजा सोन के नथनी’, ‘मोर मन झूमे’ और ‘कर ले तै मया के चिन्हारी’ जैसे लोकप्रिय छत्तीसगढ़ी गीतों की प्रस्तुति दी।

उनके गीतों की मधुर धुन और छत्तीसगढ़ी संगीत की मिठास ने दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया। स्थानीय लोकसंगीत की इस प्रस्तुति ने राज्योत्सव के मंच पर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को विशेष रूप से प्रदर्शित किया।

शिल्पग्राम में बिखरी लोककला और शास्त्रीय नृत्यों की छटा

राज्योत्सव के मुख्य मंच के साथ शिल्पग्राम में भी सांस्कृतिक गतिविधियों की शानदार छटा देखने को मिली। यहां आयोजित 11 प्रस्तुतियों में छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत, पंडवानी, सुआ नृत्य, ओडिसी, कथक, सूफी संगीत, गजल और लोकमंच जैसी विविध कलाओं का संगम देखने को मिला।

श्रीमती प्रसन्ना अवस्थी ने लोकसंगीत एवं नृत्य की प्रस्तुति दी, जबकि सुश्री सुष्मिता दास ने ओडिसी नृत्य से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। दुर्ग की सुश्री समप्रिया पूजा निषाद ने छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पंडवानी गायन परंपरा को जीवंत किया। वहीं बिलासपुर के श्री अंकित निर्मलकर ने सूफी, गजल और सुगम गायन के माध्यम से संगीत के विविध रंग प्रस्तुत किए।

गरियाबंद की सुश्री मिलवंतीन बाई ने पारंपरिक सुआ नृत्य के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की सुंदर झलक दिखाई। रायपुर की सुश्री मेघा बोस ताम्रकार ने लोकसंगीत की प्रस्तुति दी। सुश्री आंचल पाण्डेय और श्रीमती विनीता त्रिपाठी ने कथक नृत्य के जरिए भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा की मनमोहक अभिव्यक्ति की।

इसके अलावा धमतरी की सुश्री रुखमनी दीवान और श्री तेजराम साहू ने लोकमंच के माध्यम से छत्तीसगढ़ी लोकजीवन, परंपराओं और सामाजिक संस्कृति को प्रस्तुत किया। श्री आदित्य मिश्रा बैंड की संगीतमय प्रस्तुति ने भी आयोजन में विशेष रंग भर दिए।

पंडवानी और सुआ नृत्य ने दिखाई छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान

शिल्पग्राम की प्रस्तुतियों में पंडवानी और सुआ नृत्य विशेष आकर्षण का केंद्र रहे। पंडवानी गायन के माध्यम से महाभारत की कथाओं को पारंपरिक गायन और अभिनय शैली में प्रस्तुत किया गया। वहीं सुआ नृत्य ने छत्तीसगढ़ के सामूहिक जीवन, लोकआस्था और ग्रामीण परंपराओं की जीवंत तस्वीर पेश की।

ओडिसी और कथक की प्रस्तुतियों ने शास्त्रीय कला की समृद्ध परंपरा को दर्शाया, जबकि सूफी संगीत, गजल और सुगम गायन ने सांस्कृतिक संध्या को विविधतापूर्ण बनाया।

स्थानीय कलाकारों को मिला प्रतिभा प्रदर्शन का बड़ा मंच

राज्योत्सव के दूसरे दिन की प्रस्तुतियों में छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों से आए कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर मिला। लोककलाओं से लेकर शास्त्रीय नृत्य और आधुनिक संगीत तक की प्रस्तुतियों ने प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता को एक ही मंच पर साकार किया।

राज्योत्सव के माध्यम से प्रदेश की पारंपरिक लोककलाओं के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार को प्रोत्साहन मिल रहा है। साथ ही नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों, लोकपरंपराओं और गौरवशाली विरासत से जुड़ने का अवसर मिल रहा है।

छत्तीसगढ़ राज्योत्सव का दूसरा दिन इस बात का सशक्त उदाहरण बना कि प्रदेश की लोकसंस्कृति, कला, संगीत और आध्यात्मिक परंपराएं आज भी जनमानस में गहराई से रची-बसी हैं। कलाकारों की शानदार प्रस्तुतियों ने राज्योत्सव की सांस्कृतिक गरिमा को और अधिक समृद्ध किया।

शेयर करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *