नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार के लिए 2026 अब तक उतार-चढ़ाव भरा रहा है। साल की शुरुआत से NIFTY 50 करीब 13 फीसदी नीचे है। अगर दिसंबर तक यह गिरावट बरकरार रहती है, तो यह 2011 के बाद NIFTY का सबसे कमजोर साल हो सकता है। 2011 में NIFTY 50 करीब 24.6 फीसदी गिरा था।
अब 2026 के आखिरी तीन महीने बचे हैं और निवेशकों की नजर इस बात पर है कि बाजार में रिकवरी के लिए कौन से संकेत मौजूद हैं और किन जोखिमों से अभी सावधान रहना होगा।
पहले गिरावट, फिर थोड़ी रिकवरी और दोबारा दबाव
2026 के शुरुआती महीनों में NIFTY में करीब 15 फीसदी तक की गिरावट आई थी। इसके बाद अप्रैल-जून तिमाही में इंडेक्स ने करीब 7 फीसदी की रिकवरी की। हालांकि, जुलाई-सितंबर तिमाही में बाजार पर फिर दबाव आया और NIFTY करीब 5 फीसदी कमजोर हुआ।
बाजार में कमजोरी के पीछे कई वजहें बताई जा रही हैं। इनमें भारतीय शेयरों का ऊंचा वैल्यूएशन, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और कंपनियों की कमाई को लेकर बनी चिंता प्रमुख हैं।
विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी FPIs की बिकवाली इस साल बाजार के लिए प्रमुख दबाव बनी हुई है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त 2026 तक विदेशी निवेशक भारतीय शेयरों से करीब 24.6 अरब डॉलर यानी लगभग 2.36 लाख करोड़ रुपये निकाल चुके थे।
सितंबर में भी बिकवाली जारी रही। 1 से 15 सितंबर के बीच विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी से करीब 13,138 करोड़ रुपये निकाले। इस तरह 2026 की शुरुआत से अब तक विदेशी निवेशकों की कुल निकासी करीब 2.37 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है।
मोतीलाल ओसवाल के आकलन के अनुसार, पिछले दो वर्षों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से करीब 56 अरब डॉलर यानी लगभग 5.37 लाख करोड़ रुपये निकाले हैं।
घरेलू निवेशकों ने संभाला बाजार
विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बीच घरेलू संस्थागत निवेशकों यानी DIIs ने बाजार को महत्वपूर्ण समर्थन दिया है। इसी अवधि में भारतीय निवेशकों ने करीब 177 अरब डॉलर यानी लगभग 17 लाख करोड़ रुपये बाजार में लगाए हैं।
म्यूचुअल फंडों के जरिए होने वाला नियमित SIP निवेश भी बाजार को सहारा देता रहा है। विश्लेषण के मुताबिक, घरेलू निवेशकों का यह समर्थन नहीं होता तो विदेशी निकासी का असर बाजार पर और अधिक दिखाई दे सकता था।
IT शेयरों पर भी दबाव
2026 में भारतीय IT कंपनियों के शेयरों में भी बड़ी गिरावट देखने को मिली है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक NIFTY IT इंडेक्स साल की शुरुआत से अब तक 21 फीसदी से अधिक गिर चुका है।
इसके अलावा मध्य पूर्व में संघर्ष के चलते कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी ने भी भारतीय बाजार की चिंता बढ़ाई। महंगे क्रूड का असर महंगाई, चालू खाते के घाटे, कंपनियों के मार्जिन और रुपये पर पड़ सकता है।
सितंबर में ब्रेंट क्रूड करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहा, जबकि डॉलर के मुकाबले रुपया 95-96 के स्तर के आसपास कारोबार करता रहा। ऊंची तेल कीमतें और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बदलाव बाजार के लिए प्रमुख जोखिम बने हुए हैं।
क्या बाजार में रिकवरी के संकेत भी हैं?
बाजार में गिरावट के बावजूद कुछ संकेत सकारात्मक बताए जा रहे हैं। मोतीलाल ओसवाल के मुताबिक, मौजूदा गिरावट के बाद कई शेयरों का वैल्यूएशन पहले की तुलना में अधिक आकर्षक हुआ है।
NIFTY की 50 कंपनियों के मुनाफे में जून तिमाही में औसतन 18 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई, जो पिछले 10 तिमाहियों में सबसे तेज बढ़ोतरी बताई गई है। कंपनियों की कमाई में सुधार और घरेलू निवेश बाजार के लिए सकारात्मक कारक माने जा रहे हैं।
ब्रोकरेज फर्म जेफरीज के आकलन में भी भारत में विदेशी निवेशकों की रुचि में धीरे-धीरे सुधार के संकेत बताए गए हैं। वित्तीय क्षेत्र और लार्ज-कैप कंपनियों के अलावा पावर, इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग और कंज्यूमर इंटरनेट कंपनियों में भी निवेशकों की रुचि का उल्लेख किया गया है।
लेकिन जोखिम अभी खत्म नहीं हुए
दूसरी ओर, कोटक इक्विटीज ने बाजार को लेकर सतर्क रुख का उल्लेख किया है। उसके मुताबिक वैश्विक शेयर बाजारों के ऊंचे वैल्यूएशन, कच्चे तेल की कीमतों में संभावित तेजी और बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी भारतीय बाजार पर दोबारा दबाव डाल सकती है।
इन परिस्थितियों का असर कंपनियों की कमाई और निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता पर भी पड़ सकता है।
अगले तीन महीने में किन चीजों पर रहेगी नजर?
2026 की अंतिम तिमाही में भारतीय शेयर बाजार के लिए कई कारक महत्वपूर्ण रहेंगे। इनमें कंपनियों की आगामी तिमाहियों की कमाई, विदेशी निवेशकों की खरीद-बिक्री, कच्चे तेल की कीमतें, रुपये की चाल और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड प्रमुख हैं।
इसलिए बाजार के लिए अगले तीन महीने सकारात्मक और नकारात्मक दोनों संकेतों के बीच गुजर सकते हैं। कुछ ब्रोकरेज कम वैल्यूएशन और घरेलू निवेश को समर्थनकारी कारक मान रहे हैं, जबकि महंगा क्रूड, विदेशी पूंजी की निकासी और ऊंची वैश्विक वैल्यूएशन को जोखिम बताया जा रहा है।
निवेशकों के लिए इसका मतलब यह है कि बाजार की दिशा को किसी एक संकेत के बजाय इन सभी आर्थिक और वैश्विक कारकों के साथ देखकर समझना होगा।