ओम बिरला की चाय पार्टी में कनिमोझी की मौजूदगी से सियासी हलचल, विपक्षी एकजुटता पर उठे सवाल

नई दिल्ली । संसद के मानसून सत्र के समापन के बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की ओर से आयोजित पारंपरिक चाय पार्टी में विपक्षी दलों के बहिष्कार के बीच डीएमके सांसद कनिमोझी की मौजूदगी ने सियासी चर्चाओं को तेज कर दिया है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने चाय पार्टी का बहिष्कार किया, जबकि डीएमके की ओर से कनिमोझी इसमें शामिल हुईं।

मानसून सत्र के अंतिम दिन लोकसभा की कार्यवाही महज एक मिनट चली, जबकि राज्यसभा की कार्यवाही करीब एक घंटे तक चली। वंदे मातरम के गायन के बाद दोनों सदनों की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष की ओर से चाय पार्टी का आयोजन किया गया।

विपक्ष ने किया बहिष्कार

कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने स्पीकर की चाय पार्टी में शामिल नहीं होने का फैसला किया। विपक्ष की ओर से तर्क दिया गया कि लोकसभा अध्यक्ष ने परंपरा के मुताबिक समापन भाषण नहीं दिया और न ही सदन के कामकाज को लेकर विस्तृत जानकारी साझा की। इसी वजह से विपक्ष ने कार्यक्रम का बहिष्कार किया।

हालांकि, इस बहिष्कार के बीच डीएमके सांसद कनिमोझी के चाय पार्टी में पहुंचने से राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। कार्यक्रम के दौरान कनिमोझी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ बातचीत भी हुई।

DMK के रुख को लेकर बढ़ी चर्चा

कनिमोझी की चाय पार्टी में मौजूदगी को डीएमके के राजनीतिक रुख से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के बीच इस बात की चर्चा है कि डीएमके विपक्षी दलों के साथ अपने संबंधों को लेकर अलग रणनीति अपना सकता है। हालांकि, केवल एक कार्यक्रम में शामिल होने को गठबंधन की दिशा में किसी बड़े बदलाव का निर्णायक संकेत मानना अभी जल्दबाजी होगी।

पिछले वर्ष मानसून सत्र के बाद आयोजित स्पीकर की चाय पार्टी में डीएमके भी विपक्ष के साथ शामिल नहीं हुआ था। इस बार कनिमोझी की मौजूदगी ने इस घटनाक्रम को और अधिक चर्चा में ला दिया है।

परिसीमन को लेकर भी बढ़ी राजनीतिक अहमियत

कनिमोझी के कार्यक्रम में शामिल होने के बाद परिसीमन के मुद्दे को लेकर भी राजनीतिक अटकलें तेज हो गई हैं। डीएमके लंबे समय से परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों को लेकर अपनी आपत्तियां जाहिर करता रहा है। ऐसे में केंद्र और डीएमके के बीच भविष्य में इस मुद्दे पर किसी तरह की सहमति बनती है या नहीं, इस पर राजनीतिक नजरें टिकी हैं।

डीएमके के लोकसभा में महत्वपूर्ण संख्याबल को देखते हुए उसका रुख किसी भी बड़े विधायी प्रस्ताव के लिए अहम हो सकता है। हालांकि, फिलहाल कनिमोझी की चाय पार्टी में भागीदारी को लेकर राजनीतिक अटकलें ही सामने आ रही हैं और डीएमके की ओर से गठबंधन की दिशा में किसी बदलाव की औपचारिक घोषणा नहीं हुई है।

इस घटनाक्रम ने मानसून सत्र के समापन के साथ ही विपक्षी एकजुटता और केंद्र की आगामी राजनीतिक रणनीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

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