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निधि छिब्बर और रितु सेन की वापसी?
1994 बैच की आईएएस अफसर निधि छिब्बर और 2003 बैच की आईएएस अफसर रितु सेन की छत्तीसगढ़ वापसी हो सकती है। यह दोनों अफसर वर्तमान में प्रतिनियुक्ति में हैं। निधि छिब्बर वर्ष 2017 से केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर हैं। निधि छत्तीसगढ़ के वर्तमान मुख्य सचिव विकासशील की पत्नी हैं। लंबे समय से प्रतिनियुक्ति में सेवाएं दे रही निधि छिब्बर की छत्तीसगढ़ वापसी की चर्चाएं हो रही हैं। वहीं रितु सेन की वापसी पर भी मुहर लग सकती है। रितु सेन के पति 2002 बैच के आईएएस अफसर डॉ. रोहित यादव वर्तमान में जनसंपर्क विभाग के सचिव के साथ-साथ और भी कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी सम्भाल रहे हैं। वहीं 2005 बैच की आईएएस अफसर आर. संगीथा 6 माह की छुट्टी पर जा रही हैं। सरकार ने आर.संगीथा की छुट्टी मंजूर कर दी है। जिसके बाद यह माना जा रहा है कि निधि छिब्बर और रितु सेन की छत्तीसगढ़ वापसी हो सकती है।
गठजोड़
इन दिनों एक कारोबारी और नेता तथा एक आईएएस अफसर के गठजोड़ की जमकर चर्चाएं हो रही हैं। दरअसल यह चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि नई राजधानी में इस कपंनी का बोलबाला है। सरकारी बिल्डिंग के निर्माण से लेकर प्राइेवट रेसीडेंस, कामर्शियल कॉम्पलेक्स के निर्माण में भी यह कंपनी नित-नई उचांइयां छू रही हैं। कहा तो यह भी जाता है कि इस कंपनी से एक आईएएस अफसर का गहरा लगाव है। शायद इसी लगाव के चलते कभी आचार संहिता के दौरान भी करोड़ों रुपये का वर्क आर्डर इस कंपनी को जारी कर दिया गया था। हालांकि वर्क आर्डर जारी करने की वजह से साहब को कलेक्टरी से ही हाथ धोना पड़ा था। खैर वक्त बदला अब साहब का रुतबा जिले में ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में हैं। कहते हैं जब ‘सैंया भले कोतवाल तो डर काहे का‘ बात बिलकुल सही है जब नेताजी का पैसा लग रहा हो, अफसर रखवाली कर रहा हो, तो फिर डरने की क्या बात है। शायद यही वजह है कि अब यह कंपनी इंड्रस्ट्री से लेकर रियल एस्टेट तक के कारोबार में धूम मचा रही है।
नशे में झूमता बोतल
पूर्व की कांग्रेस सरकार के दौरान राज्य में कथित शराब घोटाला हुआ। ओवर रेटिंग, बिना लेवल, दो कांउटर और न जाने कितनी-कितनी बातें शराब घोटाले को लेकर उजागर हुईं। हालांकि वर्षों पहले ही इस शराब को गटक कर पचा लिया गया है। पीने वालों को इससे कोई मतलब नहीं कि शराब दूसरे कांउटर की थी अथवा नकली है या फिर बिना लेवल की है। शराब तो कब की खत्म हो चुकी है, भ्रष्टाचार के रुपये भी हजम हो गए हैं, लेकिन बोतल बेचारी आज भी नशे में झूम रही है। दरअसल कहने का आशय यह है कि इस घोटाले में कारोबारी, शराब निर्माता कंपनियां, प्लेसमेंट एजेंसियां और अफसरों की मिली भगत उजागर हुई है, सिंडिकेट की बात सामने आई। लेकिन अब कारोबारी जमानत पर रिहा हो गए हैं, नेता भी राजनीति के मैदान में उतर गए है, शराब निर्माता कंपनियां जिनका स्टॉक दूसरे कांउटर में खपाया जाता था उन तक तो जांच एजेंसियां कभी पहुंच ही नहीं पाई, प्लेसमेंट एजेन्सी की कोई खबर ही नहीं। लेकिन बेचारे अफसर आज भी उस बोतल की तरह नशे में झूम रहे हैं। जवाब नहीं दे पा रहे, लडख़ड़ा रहे हैं, आखिर ओवर टाइम के नाम पर कई करोड़ रुपये का भुगतान कौन से नियम के तहत प्लेंसमेंट कंपनी को किए गए हैं? भ्रष्टाचार का रुपया कहां-कहां खपाया गया है। कुल मिलाकर भ्रष्टाचार की शराब तो खत्म हो चुकी है, लेकिन अफसर उस बोतल की तरह आज भी झूमते नजर आ रहे हैं।
डीएफओ के बाद अब कलेक्टरों की बारी
हलचल के पिछले अंक में आईएफएस अफसरों के तबादले के संकेत दिए गये थे जिस पर मुहर लग चुकी है। वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने तकरीबन डेढ़ दर्जन आईएफएस अफसरों के तबादले किए हैं। इस सूची के बाद अब जिले के कलेक्टरों के लिए आदेश 15 अगस्त के आस-पास जारी हो सकते हैं। जिसमें तकरीबन आधा दर्जन कलेक्टर बदले जा सकते हैं। वहीं कुछ सचिवों के प्रभार भी बदले जाएंगे। बस्तर संभाग से एक तथा बिलासपुर संभाग से तीन, दुर्ग संभाग से दो एवं रायपुर तथा सरगुजा संभाग से एक-एक कलेक्टर के बदलने के संकेत हैं। दरअसल इस बहुप्रतीक्षित ट्रांसफर लिस्ट का लंबे समय से इंतजार है। और कहीं न कहीं ट्रांसफर की खबर बाहर आने के कारण सरकारी कार्यो की गति भी प्रभावित हो रही है। इसलिए अब यह लिस्ट कभी भी जारी की जा सकती है।
मंत्री-सांसद और आईएएस अफसरों के बीच खिंची तलवारें?
राज्य में इन दिनों भाजपा नेताओं और आईएएस अफसरों के बीच तलवारें खिंची हुई हैं। यह तनातनी क्यों है? फिलहाल इसे कोई समझ नहीं पा रहा है। जीपीएम कलेक्टर और मंत्री का विवाद ठंडा नहीं हुआ था कि अब रायपुर सांसद कद्दावर नेता बृजमोहन अग्रवाल और आईएएस अफसर अमित कटारिया के बीच विवाद तूल पकड़ रहा है। वैसे तो अमित कटारिया इस विवाद के पहले भी कई दफा चर्चा में रहे हैं। हालांकि उनकी छवि एक ईमानदार अफसर की है, लेकिन बृजमोहन अग्रवाल से वह क्यों जा भिड़े? फिलहाल इसका वास्वविक कारण जनता के सामने नहीं आ सका है। लेकिन बृजमोहन अग्रवाल भी अमित कटारिया की ईमानदारी की भांति अपनी संसदीय विद्वता तथा राजनीति पकड़ के लिए जाने जाते हैं। कटारिया से हुए विवाद के बाद बृजमोहन अग्रवाल हर फोरम पर अपनी बात रख रहे हैं। अमित कटारिया ईमानदार अफसर है, तो बृजमोहन अग्रवाल को संसदीय मामलों तथा राजनीतिक दांव-पेंच में महारथ हासिल है। ऐसे में इस भिडंत में पदाक्षेप होगा या फिर किसी एक को सरेंडर करना पड़ेगा। फिलहाल यह तो आने वाले दिनों में ही स्पष्ट हो पाएगा।
कलेक्टर का विवादों से नाता?
एक महिला कलेक्टर एक बार फिर विवादों से घिरती नजर आ रही हैं। दरअसल कुछ दिन पहले विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने एक कार्यक्रम की व्यवस्था को लेकर खुले मंच में जिला प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया था। अब कलेक्टर साहिबा के आधिन अफसर ने उन पर प्रताडऩा का आरोप लगाते हुए न्याय की गुहार लगाई है। मामला यहीं नहीं रुका, अपर कलेक्टर ने मानसिक प्रताडऩा का आरोप लगाते हुए अनुसचित जनजाति आयोग का दरवाजा खटखटाया है। आरोप में यह कहा गया है कि उन्हें सार्वजनिक रुप से अपमानित किया जा रहा है, प्रशासनिक स्तर पर भी दबाव बनाया जा रहा है। अपर कलेक्टर ने शिकायत में कहा है कि भविष्य में कोई अप्रिय घटना होती है अथवा मृत्यु होती है तो इसके लिए कलेक्टर जिम्मेदार होंगी। फिलहाल घटना का वास्तविक सच क्या है? यह तो जांच के बाद ही उजागर होगा, लेकिन एक माह के भीतर कलेक्टर साहिबा का नाता दूसरी बार विवादों से जुड़ते दिख रहा है।
2549 करोड़ रुपये के टेंडर का सच क्या?
वैसे तो टेंडर में गड़बड़ी को लेकर राज्य में लगातार सवाल उठ रहे हैं। लेकिन इन दिनों एक विभाग में हुए 2549 करोड़ रुपये के टेंडर प्रक्रिया की जमकर चर्चा हो रही है। कहा जाता है कि मध्यप्रदेश की राजनीति से ताल्लुक रखने वाली इस कंपनी को नियम विरुद्ध यह टेंडर दे दिया गया है। जिस कंपनी को टेंडर दिया गया है, उसके पास कागजी अनुभव की कमी है। वहीं फायनेंशियल कोरम भी यह कंपनी पूरा नहीं कर पा रही है। नियम शर्तोंं में जोड़-तोड़ की भी बात उजागर हुई है। ऐसे में मामला कहीं हाईकोर्ट चल दिया तो आशंका है कि चरण पादुका की भांति यह टेंडर भी रद्द न हो जाए। हालांकि यह महज एक संयोग है कि चरण पादुका के टेंडर लिए जिस नेता का दबाव था, उन्हीं से संबंध इस कंपनी का भी है, जिसे 2549 करोड़ रुपये का टेंडर दिया गया है। बहरहाल वास्तविक सच क्या है? यह तो पूरी पड़ताल के बाद ही उजागर होगा।
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