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चुनाव दो साल बाद, चुनावी हलचल अभी से शुरू

वैसे तो छत्तीसगढ़ राज्य में विधानसभा चुनाव दो साल बाद होने हैं। लेकिन यहां हालातों को देखते हुए समय से पहले ही राजनीतिक उठा-पटक शुरु हो गई है। सतनामी समाज के धर्मगुरु बालदास साहेब के बडे सुपुत्र गुरु ढालदास साहेब ने कांग्रेस का गमछा पहन लिया है। बालदास साहेब के छोटे सुपुत्र गुरु खुशवंत साहेब वर्तमान में भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। निश्चित तौर यह निर्णय अचानक नहीं बल्कि बहुत ही सोच समझकर लिया गया है। इस फैसले से गुरु बालदास साहेब और उनके परिवार ने दोनों दलों में अपनी पकड मजबूत कर ली है। आगामी विधानसभा चुनाव में गुरु बालदास साहेब अब अपने दोनों बेटों को टिकट दिलाने में सफल हो सकते हैं। एक बेटे की कांग्रेस से टिकट पक्की है, तो दूसरी की भाजपा से। हालांकि इस फैसले के बाद पूर्व मंत्री द्वय डॉ शिवकुमार डहरिया और गुरु रुद्र कुमार जैसे नेताओं के सामने राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई छिड़ गई है। वहीं दूसरी ओर यह फैसला वर्तमान राजनीतिक हालातों को भी चीख-चीख कर बयां कर रहा हैं। राज्य और केन्द्र में सत्ता भाजपा की है और सेंध कांग्रेस लगाए तो सवाल उठना लाजमी है। दरअसल सतनामी समाज के धर्मगुरु बालदास साहेब और भाजपा के कद्दावर नेता डॉ. रमन सिंह की नजदीकी किसी से छिपी नहीं है। गुरू बालदास साहेब के छोटे बेटे खुशवंत गुरु को विष्णु मंत्रिमंडल में जगह दिलवाने में डॉ. रमन सिंह की महती भूमिका रही है। उसके बाद भी गुरु ढालदास साहेब ने कांग्रेस में जाना क्यों उचित समझा? उनके पिता धर्म गुरु बालदास साहेब और छोटे भाई गुरु खुशवंत साहेब ने उन्हें क्यों नहीं रोका? क्या राज्य भाजपा की स्थित ठीक नहीं है? या फिर सतनामी समाज का भाजपा से मोह भंग होने लगा है? आखिर इस फैसले का असली सच क्या है?
बदहाल सड़क, बगल झांकते मंत्री
ऐसा नहीं है कि राज्य सरकार ने बीते तीन साल में कोई काम नहीं किया है। नक्सलवाद के खात्मे से लेकर किसान, महिलाओं, युवाओं के आर्थिक विकास के लिए यहां अनेकों योजनाएं संचालित हैं। सरकार ने खूब काम किया, सराहनीय काम किया। लेकिन मूलभूत सुविधाओं सड़क, पानी, बिजली की पूर्ति में सरकार हांफते नजर आ रही है? इन तीनों प्रमुख दायित्वों के निर्वहन में कंजूसी क्यों की जा रही है? विभागों की नाकामी के कारण इन दिनों बदहाल सड़कों को लेकर सरकार बुरी तरह घिरी हुई है। जगह-जगह आम जनता मंत्रियों के निवास का घेराव कर रही है, काले झंडे दिखा रही है। आलम यह है कि खस्ताहाल-बदहाल सड़कों की स्थिति देखकर राज्य सरकार के मंत्री इन दिनों बगल झांकते नजर आते हैं। राज्य सरकार के तीन साल पूरे होने जा रहे हैं, लेकिन सडकों की बदहाली की तस्वीर किसी से छिपी नहीं है। जनता की छोड़ दीजिए संगठन के ताकतवर और जिम्मेदार लोग भी मंत्रियों को आइना दिखा रहे हैं। आइने में सड़कें बदसूरत और कीचडयुक्त दिख रही हैं। सडकों के कीचड से सरकार का दामन भी कहीं न कहीं मटमैला होते दिख रहा है।
ईडी की राडार में एक और अफसर
ईडी ने पूर्व सीएम भूपेश बघेल के ओएसडी रहे राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसर चेतन बोरझरिया को गिरफ्तार कर लिया है। चेतन का नाता सीजीपीएससी घोटाले से जुडता दिख रहा है। दरअसल उत्कर्ष चंद्राकर ने नौकरी दिलाने के नाम पर 3 करोड रुपये से अधिक की राशि की वसूली की थी। कहा जाता है वसूली के लिए चेतन बोरझरिया के नाम का उपयोग किया जाता था। अब ईडी ने चेतन को रिमांड पर लिया है उनसे मामले की पूछताछ होगी। वहीं चेतन बोरझारिया की गिरफ्तारी के बाद एक और अफसर ईडी की राडार में है। कहा जा रहा है कि उक्त अफसर ने अपनी धर्मपत्नि को इसी दौरान नियुक्ति कराने में सफलता हासिल की है, जो कि जांच के दायरे में है। बहरहाल वास्तविक स्थित का खुलासा तो ईडी के पडताल के बाद ही संभव है।
अडानी समूह ने सिखा दी ABCD..?
वैसे तो अडानी समूह जो बोले वही सच है, जो करे वही नियम है। लेकिन इन दिनों अडानी समूह की एक लाइन पूरे राज्य में किसी को हजम नहीं हो रही है। दरअसल अडानी समूह के द्वारा जारी किए गए विज्ञापन का इन दिनों खुलकर विरोध हो रहा है। अडानी समूह के द्वारा जारी किए गए विज्ञापन में लिखा गया है कि “यहां के बच्चे ABCD नहीं जानते थे, आज आईआईटी कोचिंग ले रहे हैं।” वास्वत में क्या यही सच है? यहां के बच्चे ABCD नहीं जानते थे? या फिर अडानी समूह छत्तीसगढ़ का देशभर में दुस्प्रचार कर रहा है? आखिर सच क्या है? यहां के बच्चों को अनपढ क्यों बताया जा रहा है? दरअसल यह विज्ञापन मात्र नहीं है बल्कि बीते 26 वर्षो में छत्तीसगढ की सभी निर्वाचित सरकारों पर जोरदार तमाचा है। आखिर सरकारों ने 26 साल में क्या किया? जो बच्चों को ABCD भी नहीं सिखा पाये। शिक्षा के लिए इतने शिक्षक क्यों रखे गए? स्कूल भवन क्यों बनवाये गए? कई हजार करोड रुपये बजट क्यों खर्च किए गए? पहले ही अडानी समूह को हसदेव अरण्य सौंप देना था, कम से कम यहां के बच्चे ABCD सीख जाते।
रायपुर की सुध कौन लेगा?

नवा रायपुर इन दिनों गुलजार हो रहा है, होना भी चाहिए। प्लेसमेंट एजंसियों से लेकर तमाम बड़े कार्यालय इन दिनों नवा रायपुर का रुख कर रहे हैं। यहां रुपयों और बजट की कोई कमी नहीं है, शायद इसीलिए सड़क के उपर एक और सकड बना दी जा रही है। सरकारी रुपया दोनों हाथ से खर्च किया जा रहा है। लेकिन आम लोगों के शहर रायपुर की सुध कौन लेगा? यहां की चिंता कौन करेगा? घनी आबादी वाला रायपुर शहर बजट भाषण की ओर टकटकी लगाकर देख रहा है। आखिर रायपुर की सुध कब ली जाएगी? यहां कब वजट भाषण पर अमल किया जाएगा? दरअसल इस बजट सत्र में रायपुर शहर के भीतर कई फ्लाई ओवर और ब्रिज निर्माण करने का प्रावधान है। रायपुर शहर की तमाम घोषणाओं के लिए विधानसभा के अंदर बजट भाषण के दौरान खूब मेजें थपथपाई गई थीं, वाहवाही लूटी गई थीं, लच्छेदार भाषण दिये गए थे। लेकिन आज बजट सत्र का आधा से भी अधिक समय बीत चुका है। रायपुर के कितने फ्लाई ओवर के भूमिपूजन हो गये है? कितने ब्रिज की नींव रख दी गई है? कितने सडकों का निर्माण पूरा कर लिया गया है? इसकी खबर किसी को नहीं है। सबसे व्यस्ततम इलाके जयस्तंभ चौक से लेकर तात्यापारा चौक का ट्राफि क दबाव कब खत्म होगा? इसकी जवाबदेही लेने वाला कोई नहीं है। आखिर रायपुर की सुध कौन लेगा?
लौट आया पीए साहब का दौर….2 ?
हलचल के पिछले कॉलम में हमने लिखा था कि राज्य में एक बार फिर पीए साहब का दौर लौट आया है। बड़े-बड़े मंत्रियों को भी अब पीए साहब चलाने लगे हैं। इस पर अलम होना शुरु हो गया है, खराब रिपोर्ट वाले मंत्री के पीए और ओएसडियों की रवानगी शुरु कर दी गई है। सरकार और सरकार के मंत्रियों पर निगरानी रखने वाले लोग भी इस बात को भली-भांति जानते हैं कि पीए जब साहब बन जाते हैं तो आम जनता से दूरी और नाराजगी बढऩे लगती है। यहां भी शायद यही हो रहा है, इसलिए कार्रवाई का दौर शुरू हो गया है। पहली कड़ी में खाद्य मंत्री दयालदास बघेल ने अपने पीए संतोष अग्रवाल की छुट्टी कर दी है। दरअसल खरीदी और सप्लाई के खेल में मंत्री बघेल के पीए का नाम तेजी से उछला था, जिसके बाद संतोष अग्रवाल मीडिया की सुर्खियों में बने रहे। आखिरकार मंत्री दयालदास बघेल ने अपनी और सरकार की बदनामी पर विराम लगाते हुए पीए साहब की छुट्टी कर दी।
दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है
छत्तीसगढ़ कांग्रेस की राजनीति में इन दिनों नया दृश्य देखने को मिल रहा है। राज्य कांग्रेस में इन दिनों वर्चस्व की लड़ाई छिड़ी हुई है। युवक कांग्रेस के चुनाव को लेकर पूर्व सीएम भूपेश बघेल और देवेन्द्र यादव की राजनीतिक लड़ाई खुलकर सामने आ चुकी है। वहीं इसी बीच पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव का साथ भिलाई विधायक देवेन्द्र यादव को मिलते दिख रहा है। कहते हैं कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, यहां भी कुछ इसी तरह का राजनीतिक दृश्य दिख रहा है। चूंकि भूपेश बघेल और देवेन्द्र यादव के बीच इन दिनों ठनी हुई है, इसी बीच सिंहदेव ने देवेन्द का अपनी ओर खींच लिया है। वहीं इस बीच पार्टी और राहुल गांधी ने भी भूपेश बघेल को पंजाब प्रभारी के पद से हटाकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। दरअसल कुछ माह बाद पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं ऐसे में भूपेश बघेल को हटाना अपने आप में एक बडा राजनीतिक संदेश है। कहतें हैं कि पंजाब में भी भूपेश बघेल ने पार्टी के अंदर गुटबाजी पैदा कर दी थी जो आलाकमान को कतई स्वीकार नहीं है।
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