हलचल… कलेक्टरों की ट्रांसफर लिस्ट जल्द, उद्योग जरुरी, लेकिन मनमानी कितनी जरुरी?, मंत्रियों से कार्यकर्ता इतने खफा क्यों?, सत्ता की चाबी सरगुजा, जोगी परिवार की कांग्रेस वापसी?, ना विजय शर्मा जीते, ना भूपेश बघेल हारे

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कलेक्टरों की ट्रांसफर लिस्ट जल्द

राज्य सरकार जल्द ही कलेक्टरों की एक ट्रांसफर लिस्ट जारी कर सकती है। कहा जा रहा है कि इस लिस्ट में तकरीबन 5 से 6 कलेक्टर बदले जाएंगे। दरअसल महासमुंद, दुर्ग और रायपुर में कलेक्टरों को तकरीबन ढाई साल से बदला नहीं गया है। हालांकि महासमुंद को छोड दें तो रायपुर और दुर्ग के कलेक्टरों ने अपने कार्यकाल को बेहतर तरीके से बिना विवाद के चलाया है। इसलिए इन दो कलेक्टरों को सरकार इनाम दे सकती है। वहीं महासमुंद कलेक्टर जिले में स्थापित हो रहे बड़े-बड़े उद्योगों और अनियमितताओं को लेकर इन दिनों सुर्खियों में हैं। हालांकि महासमुंद के कलेक्टर को भी तकरीबन ढ़ाई साल से अधिक हो चुके हैं। ऐसे में पूरी संभावना है कि इस लिस्ट में महासमुंद, दुर्ग, रायपुर, बालोद और बिलासपुर संभाग से दो कलेक्टरों को बदल दिया जाए। बताया जा रहा है कि इसके लिए प्राथमिक रुप से सहमति मिल चुकी है, लिस्ट कभी भी जारी हो सकती है।

ना विजय शर्मा जीते, ना भूपेश बघेल हारे

पूर्व सीएम भूपेश बघेल और उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा के बीच जितनी कड़वाहट सोशल मीडिया में देखने को मिलती है, एैसा कुछ प्रेस क्लब में नहीं दिखा। भूपेश बघेल और विजय शर्मा ने लोकतंत्र के स्वच्छ परंपरा संवाद पर ज़ोर दिया। अमूमन इस दौर की राजनीति में दोतरफा संवाद से परहेज किया जाता है। लेकिन इन दोनों नेताओं ने संवाद की स्वच्छ परंपरा को जीवित रखा। दोनों नेताओं ने अपने-अपने तर्क रखे, प्रधानमंत्री आवास के अकड़े रखे और अपने निजी स्वभाव के विपरीत शालीनता से एक-दूसरे को सुना। यही भारतीय लोकतंत्र का असली चेहरा है। इसके इतर सोशल मीडिया राजनीतिक कड़वाहट से अटी पड़ी हुई है। एक-दूसरे के समर्थक रेस लगाये हुए है, ‘आखिर कौन हारा, कौन जीता’ लेकिन सच यह है कि इस संवाद में ‘ना ही भूपेश हारे, ना ही विजय शर्मा जीते’ जीता तो सिर्फ लोकतंत्र है, क्योंकि भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संवाद है। निश्चित तौर पर ऐसी संवाद की परंपरा दिल्ली की राजनीति में भी होनी चाहिये। भूपेश बघेल और विजय शर्मा में जिस तरह से सीधा डीबेट हुआ, वैसा ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बीच भी खुला डीबेट होना चाहिए। शायद सोशल मीडिया में राजनीतिक कड़वाहट कुछ कम हो जाये!

उद्योग जरुरी, लेकिन मनमानी कितनी जरुरी?

राज्य के विकास के लिए उद्योग जरुरी है, लेकिन उद्योगों की मनमानी भी जरुरी है? दरअसल यह बात हम नहीं कह रहे, बल्कि प्रशासनिक अफसरों की ग्राउंड रिपोर्ट कह रही हैं। कुछ माह पहले महासमुंद के जंगलबेड़ा में गोदावरी पॉवर इस्पात लिमिटेड को सोलर प्लांट स्थापित करने के लिए उद्योग विभाग ने तकरीबन 250 एकड़ जमीन आवंटित की, जिसके आवंटन को लेकर विधानसभा में खूब हंगामा हुआ। लेकिन उद्योगपति भली-भांति जानते हैं कि आप ज्यादा दिन शोर-गुल नहीं कर सकते, इसीलिए मामला जैसे शांत होता है, मनमानियां शुरु हो जाती है। यहां भी कुछ ऐसा ही हो रहा है, खूब मनमानी चल रही है। जंगलबेड़ा में बिना परमिशन के फलदार पौंधों को काट दिया गया है, तालाबों के अस्तित्व को समाप्त कर दिया गया है, इतना ही नहीं ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि तकरीबन 10 से 15 एकड़ अतिरिक्त जमीन कब्जा कर लिया गया है। इसमें कई बिन्दुओं की रिपोर्ट में खुलासा भी हो चुका है। ग्रामीण गोदावरी सोलर प्लांट के खिलाफ लगातार धरना दे रहे हैं, लेकिन प्रशासन जस के तस है। कुल मिलाकर उद्योगों के साथ-साथ उद्योगों की मनमानी भी जरुरी हो गई है?

सत्ता की चाबी सरगुजा, जोगी परिवार की कांग्रेस वापसी?

छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव दो साल बाद होने है, लेकिन राजनीतिक दांव-पेंच अभी से शुरु कर दिये गए हैं। विपक्षी दल कांग्रेस एक बार फिर सरगुजा में अपनी पकड़ को मजबूत कर रही है। प्रशिक्षण कार्यक्रम में जुटे कांग्रेसी बहुत गद-गद नजर आये। उन्होने इशारों में ही सही लेकिन यह बता दिया कि 2028 के विधानसभा चुनाव में सत्ता की चाबी सरगुजा ही है। दरअसल वर्तमान में सरगुजा संभाग की सभी 14 सीटों पर भाजपा का कब्जा है, जिस पर कांग्रेस बड़ी रणनीति बना रही है। वहीं दूसरी ओर जोगी परिवार की कांग्रेस वासपी पर भी प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज और कमेटी ने मंथन किया, हालांकि अभी इस पर कोई फैसला नहीं लिया गया है। लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस सभी गिले-शिकवे दूर कर जोगी परिवार समेत बृहस्पति सिंग जैसे नेताओं के लिए दरवाजे खोल दे।

मंत्रियों से कार्यकर्ता इतने खफा क्यों?

गांव अथवा स्थानीय निकायों की कमान संभालने वाले नेताओं और भाजपा के अंतिम छोर के कार्यकर्ताओं के बीच इन दिनों मंत्रियों के खिलाफ जमकर आक्रोश पनप रहा है। राज्य में भाजपा की सरकार है उसके बाद भी भगदड़ क्यों मची है? हाल ही में एक नहीं 2 नहीं बल्कि 8 भाजपा पार्षदों ने इस्तीफे की पेशकश कर दी, अब इसे क्या समझा जाना चाहिए? यह स्थानीय नेताओं के खिलाफ नाराजगी नहीं तो क्या है? प्रशासनिक दृष्टिकोण से यह कोई सामान्य घटना हो सकती है, लेकिन राजनीतिक दृष्टिकोण से इस घटना के कुछ और मायने निकलते हैं। दरअसल रायगढ़ जिले के पुसौर नगर पंचायत में भाजपा के 8 पार्षदों के सामूहिक इस्तीफा देने की खबर मीडिया में उजागर हुई है। पार्षदों ने इसके लिए जिलाध्यक्ष को आवेदन दिया है, हालांकि जिलाध्यक्ष ऐसे किसी आवेदन पर पल्ला झाड़ते नजर आये। लेकिन क्या पल्ला झाडऩे से स्थानीय आक्रोश को कम किया जा सकता है? इस पर मंथन और चिंतन की आवश्यकता है।

editor.pioneerraipur@gmail.com

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