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जितेन्द्र शुक्ला को एक और कलेक्टरी
2011 बैच के आईएएस अफसर जितेन्द्र शुक्ला को एक और कलेक्टरी मिल सकती है। वैसे तो जितेन्द्र शुक्ला जांजगीर जिले में कलेक्टरी कर चुके हैं। वह टूरिज्म बोर्ड के एमडी भी रह चुके हैं, वर्तमान में जितेन्द्र शुक्ला मार्कफेड की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। लेकिन उन्हें अभी तक कोई बड़े जिले में कलेक्टरी करने का अवसर नहीं मिला है। जबकि जितेन्द्र शुक्ला की इमेज एक रिजल्ट देने वाले अफसर के रुप में रही है। इसलिए माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में आईएएस जितेन्द्र शुक्ला को रायपुर, दुर्ग अथवा बिलासपुर जिले की कमान सौंपी जा सकती है।
मंत्री के आदेश को ठेंगा
बीते माह वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने कई वनमंडलाधिकारियों के तबादले किए। उसमें से सभी ने अपनी ज्वाइनिंग दे दी है और सरकारी काम-काज भी शुरु कर दिया है। लेकिन एक डीएफओ ने मंत्री के आदेश को ठेंगा दिखाते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। हालांकि जानकारों का कहना है कि अगर अफसर शासन के आदेश के खिलाफ ऐसे न्यायालय का दरवाजा खटखटाने लगे तो तबादला आदेश की कोई वैल्यू ही नहीं बचेगी। बहरहाल इस मामले में आगे क्या दिशा तय होती है? इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन मंत्री के आदेशों को ठेंगा दिखाने वाले इस आईएफएस अफसर की जमकर चर्चा हो रही है।
मंत्रिमंडल में फेरबदल तय
राज्य के वर्तमान हालातों को देखते हुए विष्णु मंत्रिमंडल में फेरबदल लगभग तय है। यह बात अलग है कि इसके लिए समय और तिथि निर्धारित नहीं की गई है। दरअसल भाजपा को यह पता है कि राज्य के मंत्रियों के प्रति जनता का आक्रोश दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहा है। यह आक्रोश ठीक उसी तरह है जिसके चलते 2018 के विधानसभा चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह चुनाव जीतकर भी सत्ता गवां दिए थे। क्योंकि डॉ. रमन सिंह तो चुनाव जीत गए लेकिन उनके मंत्रिमंडल का सफाया हो गया। उस दौर में मंत्रियों के खिलाफ आक्रोश इतना ज्यादा था की उनके आस-पास की सीट के विधायक भी चुनाव हार गये। ठीक वही हाल 2023 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल तो चुनाव जीत गए, लेकिन उनके मंत्रिमंडल के ज्यादातर सदस्य चुनाव हार गए। यहां भी भूपेश बघेल को सत्ता गवांनी पड़ी। अब विष्णु सरकार के तीन साल पूरा होते-होते 2028 के विधानसभा चुनाव की तस्वीर धुंधली सी ही सही, लेकिन नजर आने लगी है। यह तस्वीर आम जनता के साथ-साथ भाजपा के तमाम बड़े नेताओं को भी दिखने लगी है। इसलिए भाजपा 2018 के विधानसभा चुनाव की तरह अब दोबारा जोखिम नहीं उठायेगी। आंतरिक सर्वे के आधार पर यह निर्धारित किया जाएगा कि आने वाले दिनों में किन-किन मंत्रियों की छुट्टी होगी।
टिकट का खतरा
राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी को एक बार फिर युवा बनाने में जुट गए हैं। नीट पेपर लीक और केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद राहुल गांधी का युवाओं के प्रति विश्वास और बढ़ गया है। इसलिए वह अब पार्टी को युवा बनाने में जुट गए हैं। सूत्र बताते हैं कि आगामी विधानसभा चुनाव में 65 साल से अधिक उम्र के नेताओं को विधानसभा टिकट नहीं दी जाएगी। वहीं 15 हजार से अधिक मतों से चुनाव हारने वाले नेताओं पर भी खतरा मंडरा सकता है। इसके साथ ही कांग्रेस में टिकट अब भाई-भतीजावाद और बड़े नेताओं के परिक्रमा से नहीं बल्कि जिला अध्यक्ष और सर्वे के आधार पर मिलेगा। यही नहीं संभावित नाम की गोपनीय रिर्पोट और निष्ठा को भी मापदंड के खांचे पर खरा उतरना होगा। हालांकि यह चुनावी फार्मुला अभी मध्यप्रदेश के लिए तय किया जा रहा है। लेकिन यदि यही फार्मुला छत्तीसगढ़ में लागू हुआ तो नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत, पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव, पूर्व गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू समेत अनेक दिग्गज विधानसभा चुनाव की रेस से बाहर हो सकते है।
महिला मोर्चा और प्रभारी पुरुष,
आदिवासी मोर्चा और प्रभारी अग्रवाल?
छत्तीसगढ़ भाजपा एक बार फिर अपने निर्णय को लेकर सुर्खियों में है। दरअसल भाजपा ने महिला मोर्चा प्रभारी की जिम्मेदारी एक पुरुष नेता को सौंपी है। वहीं आदिवासी मोर्चा का प्रभारी अग्रवाल समाज के व्यक्ति को बनाया गया है। पार्टी का इसके पीछे क्या तर्क है? क्या रणनीति है? यह तो वही जानेंगे, लेकिन इस नियुक्ति के बाद कई सवाल उठने लगे हैं। क्या 26 साल में भाजपा राज्य में एक भी महिला नेत्री तैयार नहीं कर पाई? जिसे महिला मोर्चा का प्रभारी बनाया जा सके? और अग्रवाल समाज का व्यक्ति आदिवासी समाज से कितना न्याय कर पाएगा? यह भी सवाल उठ रहा है। भाजपा को 33 प्रतिशत जनसंख्या वाले आदिवासी समाज में कोई ऐसा व्यक्ति नजर नहीं आया जिसे अनुसूचित जनजाति मोर्चा का प्रभारी बनाया जा सके? इस नियुक्ति के पीछे भाजपा की जो भी मंशा हो, लेकिन नियुक्ति कटघरे में है।
नरागजी या कुछ और?
कहा जा रहा है कि राज्य सरकार के एक मंत्री अपने क्षेत्र में जाते हैं तो छिप-छिप कर जाना पड़ता है। हालात यह हो गए हैं कि प्रोटोकाल भी जारी करने से परहेज किया जाता है। अब मंत्री जी का प्रोटोकाल क्यों जारी नहीं किया जाता? यह तो वही जानेंगे। लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि प्रोटोकाल इसलिए जारी नहीं किया जाता क्योंकि क्षेत्र की जनता को पता चल जाता है कि मंत्री जी अमुक क्षेत्र में हैं। जनता को पता चलने से अपनी शिकायत, पीड़ा अथवा काम लेकर स्थानीय लोग मंत्री जी को घेर लेते हैं। वास्तव में यदि प्रोटोकाल जारी न करने का यही तर्क सच है तो हालात निश्चित रुप से बिगड़ चुके हैं। जनता जनार्दन से यदि इस कदर छिपकर भागना पड़े तो आगे राम ही मालिक हैं।
लौट आया पीए साहब का दौर
तकरीबन आठ साल बाद एक बार फिर मंत्रियों के पीए का दौर लौट आया है। हालांकि सत्ता में वापसी के बाद भाजपा ने मंत्रियों को पीए रखने और उन पर नजर रखने की बात पर जोर दिया था। लेकिन समय के साथ सब बदल जाता है, यहां भी बदल गया। आलम यह है कि अब मंत्रियों से ज्यादा उनके पीए की चल रही है। पीए साहब की क्यों चलती है? यह बात सत्ता और राजकाज में रुचि रखने वाले सभी व्यक्तियों को पता होता है। कहीं मंत्री के पीए किसी गरीब को खुलेआम धुन देते हैं, पिटाई कर देते है, तो कहीं बड़े-बड़े आईएएस को हांकते नजर आ रहे हैं। आलम यह है कि सीनियर से सीनियर आईएएस अफसर सुबह-शाम मंत्रियों के पीए के पास हाजिरी लगाने बंगले पहुंचने लगे हैं। कुल मिलाकर एक बार फिर पीए साहब का दौर लौट आया है।
6 करोड़ का बंगला और 28 लाख का कपड़ा, अफवाह या सच?
छत्तीसगढ़ की राजनीति में बीते कुछ दिनों से तरह-तरह की खबरें सुनने और पढऩे को मिल रही हैं। कभी एक मंत्री के द्वारा अपनी गर्ल फें्रड को 6 करोड़ का बंगला भेंट करने की खबर सुनने और पढऩे को मिलती है, तो कभी 28 लाख का कपड़ा खरीदने की बात सुनने और पढऩे को मिलती है। आखिर यह हो क्या रहा है? गर्ल फ्रेंड को बंगला और २८ लाख के कपड़े वाली खबर सच है या झूठ? खैर यह तो जांच का विषय है, लेकिन मंत्री जी इन दिनों जमकर चर्चा में है।
हसदेव अरण्य में फिर संकट के बादल
हसदेव अरण्य में दो और खदानें खुलने जा रही हैं। कोयला छत्तीसगढ़ के हसदेव से निकाला जाएगा लेकिन संयंत्र कहां लगाया जाएगा, यह अभी किसी को पता नहीं है। दरअसल उत्तराखंड सरकार ने एक प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जिसके तहत अडानी समूह कोयला आधारित बिजली संयंत्र स्थापित करेगा। यहां उत्पादन किए गए बिजली को अडानी समूह के द्वारा उत्तराखण्ड पॉवर कार्पोरेशन को बेचा जाएगा। इसके लिए भी कोयला हसदेव क्षेत्र से ही निकाला जाएगा। कहा जा रहा है कि उत्तराखंड सरकार और अडानी समूह के बीच बिजली खरीदी के लिए 25 साल का समझौता किया जाएगा। समझौते के तहत 1320 मेगावाट बिजली 5.746 रुपये प्रति यूनिट की दर से खरीदी जाएगी। इस प्लांट से विद्युत उत्पादन शुरु करने का लक्ष्य 2029 निर्धारित की गई है। कुल मिलाकर अभी तक अडानी समूह छत्तीसगढ़ में कोयला खनन का काम कर रहा था, अब बिजली भी बनाएगा, जिसे उत्तराखंड सरकार खरीदेगी। इस खबर के सामने आने के बाद एक बार फिर हसदेव में संकट के बादल छाने लगे है।
धन्यवाद बिलासपुर….
कलेक्टर संजय अग्रवाल और पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह की सूझ-बूझ ने न्यायधानी को जलने से बचा लिया है। दरअसल कुछ आसामाजिक तत्व छत्तीसगढ़ प्रदेश की शांति को भंग करने का लगातार प्रयास कर रहे हैं। जिसको बिलासपुर पुलिस ने असफल कर दिखाया है। कवर्धा कांड की भांति बिलासपुर को भी आग में झोकने की तैयारी थी, लेकिन कलेक्टर और एसपी ने घटना को गंभीरता से लेते हुए खुद मोर्चा संभाला, फील्ड में उतरे और दंगाईयों के मंसूबे में पानी फेर दिया। जिसके बदौलत बिलासपुर हिंसा की आग से बच गया। जिला प्रशासन की इस तत्परता को देखकर राज्य की जनता उनकी सराहना करने से परहेज नहीं कर रही। निश्चित ही शांति के इस गढ़ में अशांति के तूफान को रोकने वाले कलेक्टर संजय अग्रवाल और एसपी रजनेश सिंह धनयवाद के पात्र हैं।
धन्यवाद बिलासपुर…
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