‘सम्मन सरकार का, किराया गवाह का!’ 70 किमी सफर और घंटों इंतजार, भत्ता भुगतान में देरी पर सवाल

कवर्धा। न्यायालय की प्रक्रिया में गवाह अहम कड़ी होता है, लेकिन जिला एवं सत्र न्यायालय कवर्धा में दूरदराज क्षेत्रों से गवाही देने पहुंचने वाले सरकारी और अन्य गवाहों की परेशानियां अब व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर रही हैं। आरोप है कि पंडरिया, बोड़ला और सहसपुर लोहारा जैसे इलाकों से 60 से 70 किलोमीटर तक का सफर तय कर कवर्धा पहुंचने वाले कई गवाहों को अनुमन्य यात्रा और दैनिक भत्ते का भुगतान समय पर नहीं मिल रहा है। ऐसे में उन्हें अपनी जेब से आने-जाने का खर्च उठाना पड़ रहा है।

एक पेशी में 300 से 500 रुपये तक खर्च

दूरदराज क्षेत्रों से आने वाले गवाहों के अनुसार एक पेशी में आने-जाने का खर्च करीब 300 से 500 रुपये तक पहुंच जाता है। कई मामलों में किसी कारणवश गवाही पूरी नहीं हो पाती और अगली तारीख मिल जाती है। ऐसे में गवाह को दोबारा उतनी ही दूरी तय करनी पड़ती है और उसके ऊपर अतिरिक्त खर्च का बोझ पड़ता है।

दिहाड़ी मजदूरों और सीमित आय वाले लोगों के लिए यह परेशानी और गंभीर हो जाती है। अदालत में उपस्थित होने से एक दिन की मजदूरी का नुकसान होता है, जबकि यात्रा का खर्च अलग से उठाना पड़ता है। समय पर भत्ता नहीं मिलने की स्थिति में न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग करने वाला व्यक्ति ही आर्थिक नुकसान झेलने को मजबूर हो जाता है।

नियम होने के बावजूद भुगतान में देरी क्यों?

गवाहों के उचित खर्च से संबंधित प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 में मौजूद हैं। साथ ही राज्य शासन के प्रचलित नियमों के तहत पात्र गवाहों के यात्रा व्यय, दैनिक भत्ते और अन्य अनुमन्य खर्च के भुगतान की प्रक्रिया भी निर्धारित है।

ऐसे में बड़ा सवाल उठ रहा है कि जब नियमों में भुगतान की व्यवस्था मौजूद है, तो फिर गवाहों को राशि मिलने में देरी क्यों हो रही है? कितने गवाहों के भत्ते लंबित हैं और भुगतान प्रक्रिया में आखिर किस स्तर पर परेशानी आ रही है, यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है।

गवाही से पहले घंटों इंतजार

गवाहों की परेशानी केवल यात्रा खर्च तक सीमित नहीं है। कई बार दूरदराज क्षेत्रों से सुबह अदालत पहुंचने के बाद उन्हें अपनी गवाही की बारी के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है। यदि किसी कारणवश उस दिन गवाही नहीं हो पाती, तो अगली तारीख के साथ फिर वही सफर, समय और खर्च सामने खड़ा हो जाता है।

बार-बार होने वाली ऐसी यात्रा और आर्थिक नुकसान से गवाहों की अदालत में उपस्थिति प्रभावित होने की आशंका भी बनी रहती है। इसका असर मुकदमों की गवाही और मामलों के निराकरण की गति पर पड़ सकता है।

भुगतान व्यवस्था की समीक्षा की मांग

गवाहों की परेशानी को देखते हुए अब जिला न्यायालय प्रशासन से गवाह भत्ता भुगतान व्यवस्था की स्थिति स्पष्ट करने की मांग उठ रही है। कितने गवाहों को भुगतान किया गया, कितने मामलों में राशि लंबित है और भुगतान में औसतन कितना समय लग रहा है—इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है।

न्यायिक प्रक्रिया में गवाही देने वाला व्यक्ति व्यवस्था के साथ सहयोग करता है। ऐसे में उसे अपने अनुमन्य खर्च की राशि के लिए परेशान होना पड़े, तो यह प्रशासनिक संवेदनशीलता और जवाबदेही दोनों पर सवाल खड़े करता है। जरूरत इस बात की है कि लंबित भत्तों का समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित किया जाए और देरी की स्थिति में जिम्मेदारी तय की जाए।

शेयर करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *