CJI सूर्यकांत की दो टूक: ‘न्यायपालिका के फैसले आलोचना और जांच के दायरे से ऊपर नहीं, जनता का भरोसा जरूरी’

नई दिल्ली | भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत ने नई दिल्ली में आयोजित छठे राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर के दौरान न्यायपालिका की पारदर्शिता, जवाबदेही और जनता के भरोसे पर एक महत्वपूर्ण भाषण दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायपालिका खुद को किसी भी प्रकार की जांच, सुधार और निष्पक्ष आलोचना से ऊपर नहीं रख सकती।

इस संबोधन और व्याख्या के मुख्य बिंदु:

  • आलोचना और जवाबदेही जरूरी: CJI सूर्यकांत ने ‘Justice Seen to Be Done: Transparency and Public Trust as Pillars of the Legal System’ विषय पर बोलते हुए कहा कि कोई भी संस्था खुद को आलोचना से परे रखकर जनता का विश्वास हासिल नहीं कर सकती। संस्थागत सुधार के लिए न्यायिक कामकाज की निष्पक्ष समीक्षा और आलोचना का स्वागत किया जाना चाहिए।

  • फैसलों के पीछे की वजहों की जांच: पारदर्शिता को केवल खुली अदालतों तक सीमित न बताते हुए सीजेआई ने कहा कि न्यायिक फैसलों के पीछे के तर्कों और कारणों की भी जांच की जा सके, यह बेहद जरूरी है। जिन पक्षों के खिलाफ फैसला आया हो, उन्हें भी यह अधिकार होना चाहिए कि वे फैसलों के आधार की पड़ताल कर सकें।

  • ‘न्याय होता हुआ दिखना चाहिए’: 1924 के प्रसिद्ध ‘R v. Sussex Justices’ मामले का हवाला देते हुए CJI ने दोहराया कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि वह होता हुआ दिखना भी चाहिए। उन्होंने हितों के टकराव (conflict of interest) की आशंका को भी जनता का विश्वास डिगाने वाला अहम कारक बताया।

  • मीडिया ट्रायल पर चेतावनी: अपनी बात रखते हुए उन्होंने यह भी आगाह किया कि पारदर्शिता का यह अर्थ नहीं होना चाहिए कि अदालती कार्यवाहियों का अत्यधिक मीडिया कवरेज हो, क्योंकि कई बार जरूरत से ज्यादा जन-ध्यान या मीडिया ट्रायल के कारण जनता की राय भी भ्रामक हो सकती है।

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