पितृ पक्ष 2026 | पितृपक्ष को सनातन परंपरा में पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध जैसे कर्म किए जाते हैं। हालांकि नौकरी, पढ़ाई या अन्य कारणों से कई लोग अपने पैतृक स्थान से दूर रहते हैं और विधि-विधान से श्राद्ध नहीं कर पाते। ऐसे लोगों के लिए धार्मिक मान्यताओं में कुछ सरल उपाय बताए गए हैं।
16 दिनों तक पशु-पक्षियों को खिलाएं भोजन
मान्यता के अनुसार, पितृपक्ष के दौरान पशु-पक्षियों को भोजन और पानी देना पुण्यकारी माना जाता है। घर से दूर रहने वाले लोग अपनी छत या बालकनी में पक्षियों के लिए दाना-पानी रख सकते हैं। पशुओं को रोटी या फल खिलाकर भी पूर्वजों का स्मरण किया जा सकता है।
इसके साथ प्रतिदिन किसी खुले स्थान, पौधे या गमले के पास दक्षिण दिशा की ओर मुख करके काले तिल और जल अर्पित करने की परंपरा भी बताई जाती है।
गोसेवा और पौधारोपण का विकल्प
पितृपक्ष में गोसेवा को भी विशेष महत्व दिया जाता है। आसपास गोशाला होने पर वहां जाकर गायों को चारा या रोटी खिलाई जा सकती है।
पूर्वजों की स्मृति में पेड़ लगाना भी एक सरल विकल्प बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पेड़ लगाने के साथ उसकी नियमित देखभाल करना भी सेवा का हिस्सा माना जा सकता है।
पितरों के नाम पर जरूरतमंदों की मदद
पितृपक्ष में गरीबों और जरूरतमंद लोगों को भोजन कराने, वस्त्र देने या अपनी क्षमता के अनुसार आर्थिक सहायता करने की परंपरा भी है। ऐसे कार्यों को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम माना जाता है।
दक्षिण दिशा में दीपक जलाने की परंपरा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष के दौरान शाम के समय दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तेल का दीपक जलाकर पूर्वजों का स्मरण किया जा सकता है। कुछ परंपराओं में पीपल के पेड़ की जड़ में जल, कच्चा दूध और काले तिल अर्पित करने तथा सरसों के तेल का दीपक जलाने का भी उल्लेख मिलता है।
श्रद्धा को माना जाता है महत्वपूर्ण
पितृपक्ष में किए जाने वाले इन उपायों का आधार धार्मिक मान्यताएं और पारिवारिक परंपराएं हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में श्राद्ध तथा तर्पण की विधि अलग हो सकती है। ऐसे में घर से दूर रहने वाले लोग अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार इन कार्यों को श्रद्धा और सामर्थ्य के साथ कर सकते हैं।