नई दिल्ली| अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और ईरान पर प्रतिबंधों को और कड़ा करने वाले नए कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 नाम के इस कानून से रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर अमेरिका में भारी टैरिफ लगाए जाने का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पर अभी 100 फीसदी टैरिफ लागू कर दिया गया है।
भारत पर क्यों मंडरा रहा है खतरा?
भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है और दुनिया के प्रमुख रूसी क्रूड खरीदारों में शामिल है। S&P Global के अगस्त 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत ने करीब 1.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन रूसी क्रूड खरीदा, जबकि चीन करीब 1.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन के साथ दूसरे स्थान पर था |
नए अमेरिकी कानून में राष्ट्रपति को रूस के तेल या गैस के बड़े खरीदारों के अमेरिका को होने वाले निर्यात पर 100 फीसदी तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया है। प्रावधान का फोकस रूस के ऊर्जा कारोबार से जुड़े प्रमुख विदेशी खरीदारों पर है।
क्या भारत पर 100% टैरिफ लग गया?
नहीं।
यही इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात है। ट्रंप के कानून पर हस्ताक्षर करने से उन्हें 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की कानूनी शक्ति मिल गई है, लेकिन भारत पर 100 फीसदी शुल्क तत्काल लागू नहीं हुआ है। अब अमेरिकी प्रशासन को यह तय करना होगा कि किन देशों और किन परिस्थितियों में इस अधिकार का इस्तेमाल किया जाए।
यानी फिलहाल स्थिति को इस तरह समझा जा सकता है:
कानून साइन → टैरिफ लगाने की शक्ति मिली → भारत पर 100% टैरिफ अभी स्वतः लागू नहीं।
टॉप रूसी तेल खरीदारों पर नजर
कानून का एक प्रमुख प्रावधान रूस से तेल या गैस खरीदने वाले शीर्ष खरीदारों को निशाना बनाने से जुड़ा है। अगस्त के उपलब्ध क्रूड-आयात आंकड़ों में भारत और चीन के अलावा इटली, तुर्की और नीदरलैंड भी प्रमुख खरीदारों में थे। हालांकि, अलग-अलग ऊर्जा उत्पादों और गणना की अवधि के आधार पर सूची बदल सकती है।
कानून में राष्ट्रपति को राष्ट्रीय हित के आधार पर कुछ मामलों में राहत या छूट देने की शक्तियां भी दी गई हैं। इसलिए भारत पर वास्तविक प्रभाव अमेरिकी प्रशासन के अगले फैसलों पर निर्भर करेगा।
अगर 100% टैरिफ लगा तो क्या होगा?
अगर अमेरिका भारत से आने वाले किसी या सभी संबंधित उत्पादों पर 100 फीसदी टैरिफ लागू करता है, तो अमेरिकी बाजार में उन भारतीय उत्पादों की लागत काफी बढ़ सकती है। इसका असर भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति, अमेरिकी आयातकों और कुछ क्षेत्रों में कीमतों पर पड़ सकता है।
हालांकि, वास्तविक आर्थिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका:
-
कितने प्रतिशत टैरिफ लगाता है;
-
किन उत्पादों को इसके दायरे में रखता है;
-
टैरिफ कब से लागू करता है;
-
और क्या किसी तरह की छूट या अपवाद देता है।
इसी वजह से भारतीय निर्यातकों के लिए अभी सबसे बड़ा मुद्दा अनिश्चितता है। व्यापार विश्लेषकों के मुताबिक वास्तविक प्रभाव का आकलन अमेरिकी प्रशासन द्वारा टैरिफ की दर, उत्पाद कवरेज और लागू होने की समयसीमा स्पष्ट करने के बाद ही किया जा सकेगा।
रूस की ‘शैडो फ्लीट’ भी निशाने पर
नया कानून सिर्फ तेल खरीदने वाले देशों तक सीमित नहीं है। इसमें रूस से जुड़े अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों और ऊर्जा कारोबार को निशाना बनाने वाले प्रतिबंधों के साथ-साथ रूस की तथाकथित ‘शैडो फ्लीट’ पर भी कार्रवाई का प्रावधान है।
इन जहाजों पर पश्चिमी प्रतिबंधों से बचते हुए रूसी ऊर्जा उत्पादों के परिवहन में मदद करने के आरोप लगते रहे हैं।
आगे क्या होगा?
अब निगाहें ट्रंप प्रशासन के अगले कदम पर हैं। कानून लागू होने के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिका किन देशों को निशाना बनाता है और भारत से जुड़े रूसी तेल आयात को किस तरह देखता है।
इसलिए फिलहाल यह कहना सही होगा कि भारत पर 100 फीसदी अमेरिकी टैरिफ लग चुका है, ऐसा नहीं है। लेकिन नए कानून ने अमेरिकी राष्ट्रपति को ऐसा टैरिफ लगाने का स्पष्ट कानूनी रास्ता जरूर दे दिया है। भारत दुनिया के बड़े रूसी क्रूड खरीदारों में होने के कारण इस प्रावधान के संभावित असर के दायरे में आता है।