बाब-अल-मंदेब पर हूतियों का कब्जा बढ़ा तो भारत के तेल कारोबार पर गहराएगा संकट, 3000 KM दूर तक असर

नई दिल्ली। यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों की लाल सागर के तट पर बढ़ती पकड़ ने वैश्विक तेल और समुद्री व्यापार को लेकर चिंता बढ़ा दी है। हूती बलों ने रणनीतिक मायून (पेरिम) द्वीप और मोखा बंदरगाह पर कब्जा कर बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास अपनी स्थिति मजबूत की है। यह जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी और आगे हिंद महासागर से जोड़ता है।

भारत के लिए क्यों अहम है बाब-अल-मंदेब?

बाब-अल-मंदेब भारत और पश्चिम एशिया के बीच समुद्री व्यापार के महत्वपूर्ण रास्तों में से एक है। इस मार्ग में किसी भी तरह की असुरक्षा बढ़ने पर तेल टैंकरों और अन्य मालवाहक जहाजों को लंबा वैकल्पिक रास्ता अपनाना पड़ सकता है। इससे परिवहन लागत, बीमा खर्च और डिलीवरी का समय बढ़ सकता है।

पहले से ही हूती हमलों के कारण लाल सागर के रास्ते जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। कई कंपनियों ने जोखिम से बचने के लिए अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते को चुना है, जिससे यात्रा और महंगी तथा लंबी हो जाती है।

तेल सप्लाई पर बढ़ सकता है दबाव

इस घटनाक्रम का असर सिर्फ शिपिंग पर नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है। सऊदी अरब ने हूती दबाव और अन्य हमलों के बीच अपनी महत्वपूर्ण ईस्ट-वेस्ट तेल पाइपलाइन को अस्थायी रूप से बंद किया है। यह पाइपलाइन सऊदी तेल को लाल सागर के तट तक पहुंचाने के लिए अहम है और होर्मुज जलडमरूमध्य के विकल्प के तौर पर काम करती है।

ऐसे में अगर बाब-अल-मंदेब के आसपास समुद्री मार्ग लंबे समय तक असुरक्षित रहता है और खाड़ी क्षेत्र से तेल की वैकल्पिक आपूर्ति भी प्रभावित होती है, तो एशियाई खरीदारों के लिए कच्चे तेल की कीमतों और उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है।

भारत के सामने बढ़ेगी ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। इसलिए पश्चिम एशिया से आने वाले तेल के समुद्री रास्तों में किसी भी बड़े व्यवधान का असर भारतीय रिफाइनरियों, आयात लागत और अंततः पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है।

हालांकि फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत की तेल आपूर्ति बाधित हो जाएगी। लेकिन बाब-अल-मंदेब और होर्मुज—दोनों प्रमुख समुद्री मार्गों पर बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा के जोखिम को जरूर बढ़ा रहा है। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें भी इस तनाव के बीच 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गई हैं।

लाल सागर संकट का असर वैश्विक व्यापार पर भी

बाब-अल-मंदेब पर हूतियों की बढ़ती पकड़ से सिर्फ तेल व्यापार ही नहीं, बल्कि यूरोप-एशिया के बीच कंटेनर और अन्य समुद्री कारोबार पर भी असर पड़ने की आशंका है। इस मार्ग पर लंबे समय तक जोखिम बना रहा तो जहाजों के रूट बदलने से वैश्विक सप्लाई चेन और माल ढुलाई लागत पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

यानी यमन से हजारों किलोमीटर दूर भारत के लिए भी हूतियों की यह बढ़त सिर्फ पश्चिम एशिया का सैन्य घटनाक्रम नहीं है। इसका सीधा संबंध भारत की ऊर्जा सुरक्षा, तेल आयात और समुद्री व्यापार से जुड़ता दिखाई दे रहा है।

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