हलचल… भाजपा में भगदड़?

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भाजपा में भगदड़?

भाजपा के अन्दर इन दिनों कुछ ठीक नहीं चल रहा है। दरअसल भारतीय जनता पार्टी से कार्यकर्ता लगातार इस्तीफा दे रहे हैं। यह इस्तीफा सरकार ने नाखुश होकर नहीं बल्कि क्षेत्रीय नेताओं से खफा होकर दिया जा रहा है। क्षेत्र के नेता आखिर कौन से काम में जुट गए हैं? जिसके कारण भाजपा के कार्यकर्ता इस्तीफा दे रहे हैं। हाल ही में डोंगरगढ़ से 111 भाजपा कार्यकर्ताओं ने एक नेता पर गंभीर आरोप लगाते हुए सामुहिक इस्तीफा दे दिया। वहीं रायगढ़ से युवा आदिवासी चेहरा भाजयुमो के अध्यक्ष रहे रवि भगत ने पार्टी को टाटा बाय-बाय कर दिया। रवि भगत ने इस्तीफा तो दिया ही, इस्तीफे के बाद वह पार्टी के क्षेत्रीय नेताओं के खिलाफ लगातार मोर्चा खोल रहे हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर भाजपा कार्यकर्ताओं में इतना असंतोष क्यों पनप रहा है? क्या क्षेत्रीय नेता और मंत्री कार्यकर्ताओं की सुनना बंद कर दिए हैं? या फिर कार्यकर्ताओं की महात्वाकांक्षा बढ़ गई है? खैर कारण जो भी हो लेकिन पार्टी के अंदर मची इस तरह की भगदड़ ़किसी भी हाल में हितकर नहीं है। इस पर चिंतन और मंथन की जरुरत है।

नेता जी का रियल एस्टेट प्रेम

एक नेता जी का इन दिनों रियल एस्टेट प्रेम जाग उठा है। दरअसल उनका यह प्रेम उनके नब्ज देखने वाले साथी के कारण जागा है। कहा तो यह भी जा रहा है कि इस कारोबार में नब्ज देखने वाले साथी को फ्रंट फुट पर रखा गया है, तो वहीं पीछे से नेता जी के द्वारा फंडिग की जा रही है। चूंकि रियल एस्टेट का प्रेम जागा है, इसलिए इन दिनों जमीनों की खोजबीन और खरीदी भी जोरो से जारी है। हालांकि जब कैश का कलेक्शन ज्यादा मात्रा में होता है, तो उसे जमीन में खपाने से बेहतर और कोई रास्ता नहीं होता। वैसे तो छत्तीसगढ़ में रियल एस्टेट के कई कारोबारी हैं जहां नेता जी आसानी से अपना कैश खपा सकते हैं, लेकिन विश्वास सब पर थोड़ी न किया जा सकता है? इसलिए नब्ज टटोलने वाले साथी को आगे कर दिया गया है।

निशाने पर मुंदड़ा और उनके सहयोगी?

भाजपा नेता सीएसआईडीसी के पूर्व अध्यक्ष छगनलाल मुंदड़ा और उनकी कंपनियां इन दिनों निशाने पर हैं। मुंदड़ा को राडार पर लेने वाले और कोई नहीं बल्कि ज्यादातर भाजपा विधायक ही हैं। बहरहाल यह भाजपा विधायक अचानक से मुंदड़ा, उनके सहयोगी और उनकी कंपनियों को निशाने पर क्यों ले रहे हैं? फिलहाल इस पर अध्ययन जारी है। दरअसल मुंदड़ा और उनके सहयोगियों की एक कंपनी को बस्तर में 50 साल की अवधि हेतु खनिज लौह अयस्क का खनिपट्टा स्वीकृत है। इसको लेकर बीते विधानसभा में भाजपा और कांग्रेस के कई विधायकों ने तीखे सवाल दागे। अनियमितता भी उजागर हुई। लेकिन सवाल यह उठता है कि भाजपा की ही सरकार में भाजपा के विधायकों द्वारा मुंदड़ा को क्यों निशाना बनाया जा रहा है? उनके और उनके सहयोगियों की कंपनियां क्यों निशाने पर हैं? हालांकि यह आबंटन डॉ. रमन सिंह के मुख्यमंत्री रहते हुए वर्ष 2017 में किया गया था।

अपराध समान, न्याय अलग-अलग?

राज्य की अफसरशाही और राजनीतिक घटनाक्रम में बहुत ही विरोधाभास देखने को मिल रहा है। कई बार समान घटनाओं में न्याय भी अलग-अलग दिखाई देता है। दरअसल हम बात कर रहे हैं नेताओं और अफसरों के बीच तनातनी की। सबसे पहले यहां भाजपा के वरिष्ठ आदिवासी नेता पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कवंर और कोरबा के तत्कालीन कलेक्टर अजीत वंसत के बीच ठन गई। ननकीराम कवंर ने कलेक्टर पर कई गंभीर अरोप लगाए। लेकिन कलेक्टर अजीत वसंत ननकीराम कवंर से किसी भी प्रकार समझौता नहीं करना चाहते थे, वहीं ननकीराम भी कलेक्टर को हटाने पर अड़े थे। मामले ने जमकर तूल पकड़ा, ननकीराम कवंर अपनी ही पार्टी और सरकार के खिलाफ धरना देने राजधानी रायपुर पहुंच गए। पानी सिर से उपर निकलने लगा तब सरकार जागी और कलेक्टर को हटा दिया गया। लेकिन अजीत वसंत को कोरबा कलेक्टर से हटाकार सूरजपुर का नया कलेक्टर बना दिया गया। मतलब ननकीराम कवंर की भी बात रख दी गई और अजीत बसंत को कोरबा के समकक्ष जिले में कलेक्टरी दे दी गई। फिर एक मामला बेमेतरा जिले का सामने आया यहां सीएम की गरिमा अनुकूल कार्यक्रम की व्यवस्था न होने पर विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह खुले मंच में भड़क उठे। उसके बाद भी कलेक्टर पर किसी भी प्रकार की कार्रवाई नहीं की गई। वहीं जीपीएम के तत्कालीन कलेक्टर डॉ. संतोष देवांगन और एक मंत्री के बीच विवाद सामने आया। जहां कलेक्टर को तुरंत रवाना कर दिया गया, यहीं नहीं मंत्रालय अटैच कर दिया गया। जबकि कहा जा रहा है कि यहां कलेक्टर डॉ. देवांगन बचावी मुद्रा में थे। खैर यह तीनों घटनाक्रम का जिक्र इसलिए किया गया क्योंकि तीनों घटनाओं का स्वरुप लगभग समान है, लेकिन न्याय अलग-अलग है।

ढ़ोने की परंपरा पर कब लगेगा अंकुश?

राज्य की विष्णु सरकार पर आरोप है कि वह बहुत से अफसरों को ढ़ोने का काम कर रही है। ढ़ोने से आशय है जो बिना रिजल्ट के विभागों में वर्षों से कब्जा जमाए हुए हैं। इस लिस्ट में सबसे ऊपर नाम आता है आईएफएस अफसर विवेक आचार्य का, विवेक आचार्य पर्यटन विभाग के एमडी हैं। लंबा कार्यकाल होने के बावजूद भी उनकी उपलब्धियों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। एक ओर सरकार पर्यटन को उद्योग का दर्जा दे रही है, दूसरी ओर केन्द्र सरकार की विशेष सहायता से नवा रायपुर में तकरीबन 150 करोड़ रुपये की राशि से बनने वाली फिल्म सिटी दो साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी हांफ रही है। केन्द्र सरकार बार-बार रिमांइडर पर रिमांइडर भेज रही है, लेकिन प्रोग्रेस जस के तस है। ढ़ोने की इस परंपरा के कारण छत्तीसगढ़ वासियों का फिल्म सिटी का सपना साकार होने में न जाने कितना वक्त लगेगा?

आईएफएस अफसरों में फेरबदल

31 जुलाई को आईएफएस अफसर अनिल साहू, प्रेम कुमार, आलोक तिवारी, राजेश चंदेले रिटायर हो चुके हैं। वहीं 1995 बैच के आईएफएस अफसर वाइल्ड लाइफ प्रमुख की जिम्मेदारी संभाल रहे ओपी यादव की पदोन्नति के भी आदेश जारी कर दिए गए हैं। इसके साथ ही फील्ड के अफसरों की भी लिस्ट जारी होने के संकेत हैं। इस लिस्ट में कई डीएफओ के प्रभार बदले जा सकते हैं। दरअसल कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय विगत दो-तीन दिनों से दिल्ली प्रवास पर थे, अब वह रायपुर लौट चुके हैं, संभव है उनकी सहमति के बाद जल्द ही आईएफएस अफसरों की ट्रांसफर लिस्ट जारी हो जाए।

बडे आंदोलनों पर फोकस की नसीहत

प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस इन दिनों सरकार को घेरने की रणनीति पर लगातार काम कर रही है। दरअसल बीते 30 जुलाई को राज्य कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं को दिल्ली बुलाया गया था। जहां एआईसीसी के प्रभारी सचिव केसी वेणुगोपाल ने साफ तौर आंदोलनो में और तेजी लाने की बात कही है। वहीं आगामी रणनीति पर भी चर्चा की गई। कहते हैं कि वेणुगोपाल ने साफ कहा है कि बड़े आंदोलनों की रणनीति पर काम किया जाना चाहिए। इसके साथ ही दिल्ली में हुए युवाओं के आंदोलन के बाद सभी नेताओं को सोशल मीडिया में सक्रियता बढ़ाने को भी कहा गया है। दिल्ली में तैयार की गई इस रणनीति के बाद कांग्रेस राज्य में बड़े आंदोलन की तैयारी में जुट गई है।

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